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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 40

From जैनकोष



यत्र काये मुने: प्रेम तत: प्रच्याव्य देहिनम्।

बुद्धया तदुत्तमे काये योजयेत्प्रेम नश्यति।।40।।

रागविलय का यत्न- राग और द्वेषभाव में प्रबल है राग। द्वेष का संसार तो शीघ्र मिट सकता है किंतु राग का संस्कार मिटना कठिन है। द्वेष भी राग के कारण हुआ करता है। जिस किसी से राग है उसमें जो बाधक बने उससे द्वेष हो जाता है। तो द्वेष होने में कारण पड़ा किसी विषय का राग होना। तो राग का परित्याग होना बहुत आवश्यक है। कैसे राग मिटे? इस ही विषय में फिर भी यह श्लोक कह रहे हैं। मुनि को जिस शरीर में प्रेम हो रहा हो उससे इस देही को अर्थात् आत्मा को अलग हटाकर बुद्धि के द्वारा उससे भी उत्तम कार्य में लगा देवे तो प्रेम नष्ट हो जाता है।

मोहियों के प्रेम का आश्रय असार शरीर- यह औदारिक शरीर जिसमें अनेक रोग भरे हुए हैं, आयुर्वेद बताता है कि जितने रोम हैं उससे भी कई गुने रोग शरीर में हैं, रोगों से भरा है, घिनावना है, मिटने वाला है। कौनसा इस शरीर में सार है कि उसे आंखों से निरखा करें? कभी-कभी ऐसा भी देखने में आता कि शरीर से बहुत अच्छा तो कपड़ा है। खूब रंगीन, चटकीली रेशमी बनारसी सुंदर साड़ी पहिनकर इस शरीर की शोभा बढ़ाई जाती है। शरीर देखो तो वही है और कहो रूपरंग का भी भद्दा शरीर हो और कपड़े पहिन लिए जायें चमकीले तो वहां अंदाज लगावो कि उस शरीर से भी अच्छा कपड़ा है। शरीर में तो धोखा है, पसीना निकल आये, बदबू करे, पर ये कपड़े तो कोई धोखा नहीं देते। जैसे हैं सो ही हैं।

श्रृंगार का कारण आधार की अशोभनीयता- भैया ! ज्यादा श्रृंगार क्यों किया जाता है, इसलिए कि शरीर सुहावना नहीं है, अच्छा नहीं है और इसको अच्छा बनाना है तो श्रृंगार करें, सजावट करें जिससे शरीर की शोभा और बढ़ जाय। क्योंकि शरीर तो शोभा वाली चीज ही नहीं है और उसकी शोभा बढ़ाना है तो इतने गहने लाद लिये, मानों सिर पर मेंढक बैठा लिया, कान में ततैया तथा नाक में मक्खी बैठा लिया, कितने ही आभूषण पहिनने पड़ते हैं, क्योंकि शरीर में इतनी शोभा ही नहीं है कि बिना इतना श्रृंगार किए भला लगे। जिस अपवित्र शरीर से इसे प्रेम है उस शरीर से उपयोग को हटावे और इससे भी उत्तम जो काय है―क्या है? ज्ञानशरीर आत्मतत्त्व, उसमें उपयोग को लगा दे तो प्रेमपरिणमन नष्ट हो जायेगा।

निजपरिचय बिना हाड़ के ढांचे में रमण- जब तक इस प्राणी को अपने आधारभूत ज्ञानानंदस्वभावी निराकुल शांत निज उपवन में क्रीड़ा करने का अवकाश नहीं मिलता तब तक ही यह जीव हाड़ मांस के पिंड में प्रीति करता है। क्या है? ऊपर चाम की चादर पतलीसी मढ़ी है, मक्खी के पंख बराबर चादर मढ़ी है उससे यह गंदगी ढकी है। यदि यह पतली चमड़ी अलग हो जाय तो कैसा वीभत्सरूप इसका लगे और अब भी देखो तो इस चर्म को तो गौणकर दो और इस सिर में जरा ध्यान देकर देखो है क्या? जैसे मरघट में पड़ी हुई मनुष्य की खोपड़ी हो और इस मनुष्य की खोपड़ी हो तो इन दोनों में अंतर है क्या कुछ? कुछ भी तो अंतर नहीं है। इन दोनों का भीतर से ढांचा देख लो तो वहां फिर रागभाव अथवा खोटा परिणाम न होगा।

असार शरीर के स्नेह की व्यर्थता- यह एक शरीर अजंगम है, यह खुद चल नहीं सकता, यह खुद कोई कार्य नहीं कर सकता। इसमें जीव का संबंध है इसलिए ये सारे नटखट हो रहे हैं। जैसे मोटर जहां खड़ी है सो खड़ी है, ड्राइवर हो तो चले, इसी प्रकार यह जो पौद्गलिक शरीर चला करता है वह इस चेतन जीव के संबंध से चला करता है। यह शरीर स्वयं तो महाभयानक है, इसमें क्या राग करते हो। कोई कहे कि भयानक ही सही, तो क्या हुआ, अपना ही तो शरीर है। अरे भयानक के साथ यह महाअपवित्र भी है। अपवित्र भी है तो रहो, भयानक भी है तो रहो, है तो अपना ही शरीर। कहते हैं कि इन दो के अतिरिक्त यह विनाशीक भी है, नष्ट हो जायेगा। कोई कहे― हो जाय नष्ट― जब नष्ट होगा तब की बात है, पर जब है तब तक तो शरीर का उपयोग उपभोग करो ना खूब। तो कहते हैं कि इन तीन ऐबों के अतिरिक्त चौथा ऐब इसमें यह है कि यह संताप ही पैदा किया करता है। ऐसे इस असार शरीर में स्नेह करना व्यर्थ है।

लोक में गर्व लायक वस्तु का अभाव- जो जन शरीर को नजर में रखकर घमंड बगराते हैं, गर्व करते हैं, आहा मैं कितना सुंदर हूं, कितना पुष्ट हूं, कितना मनोहर हूं, ऐसा जो गर्व किया करते हैं उनकी वह महामूढ़ता है। क्या सुंदरता है? क्या नाक के अंदर नाक नहीं भरी है, मुख के अंदर राल, थूक आदि नहीं भरे हैं? यह सारा अपवित्र शरीर है तिस पर भी गर्व किया जाय तो यह किस बात का गर्व है? शरीर तो गर्व के लायक नहीं है। जब शरीर भी गर्व के लायक नहीं है तो क्या धन वैभव गर्व के लायक है। ओह मेरे पास हजारों लाखों का धन है, इतनी जमीन है, ऐसा ठाठ का मकान है यह भी गर्व के लायक बात नहीं है। ये भी विनाशीक हैं। और परपदार्थ हैं, इनका ध्यान करने से तो आकुलता ही बढ़ती है, शांति नहीं आती है।

धन की व्यर्थ चिंता- जैसे कोई पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लिए हुए हो तो अनेक पक्षियों के द्वारा वह पक्षी सताया जाता है और वह मांस का टुकड़ा छीना लेते हैं। यह तो कांव-कांव करता रह जाता है। यों ही इस धन वैभव का प्रसंग जब तक है तब तक तो उस पर अनेक लोग टूटते हैं, लगावो टैक्स। एक लाख की आमदनी हो तो उसमें शायद 80, 90 हजार टैक्स में चले जाते हैं। अरे तो 10 ही हजार कमाओ ना और कमायी में स्वत: अगर आ जाये लाखों का धन तो आ जाये ना, हमारा उसमें क्या बिगाड़ है? जहां जायेगा उसी का लाभ है, पर हम धन के लिये ही, कमाने के लिये ही आकुलता मचाएँ, चिंताएँ किया करें तो उससे क्या होगा, उसका क्या किया जायेगा? दूसरों को ही दे जायेंगे अथवा स्वयं कहीं न कहीं चला जायेगा।

धन वैभव की उपेक्षा में ही हित- यदि दूसरे को धन दे गये, तब भी चलो कुछ भला है, पर जिसको दे गये, उसका भी तो जुम्मा नहीं है कि उसके पास टिक सकेगा या नहीं। यहां तो जीवनभर हाय हाय करके जोड़ा हुआ धन दिया और जिसे दिया वह निकल गया भाग्यहीन तो वह उस धन को चंद दिनों में ही बरबाद कर देगा। और मानों न भी दे गये किसी को, थोड़ी ही पूंजी उसके पास है और है वह सपूत तो कितना और धन वह कमा लेगा। धन वैभव के संचय के लिये चिंताएँ करना यह विवेक नहीं है। हां उदय की प्रबलता में लाखों आ जाय तो क्या हानि है? आते हैं तो आने दो। धन वैभव की उपेक्षा में ही हित है।

उदारभाव- बुंदेलखंड में एक राजा गुजर गया। रानी उस गद्दी की मालिक हुई। उसका बच्चा केवल 9-10 वर्ष का था, पर उसके उदारता की वृत्ति सहज थी। सैकड़ों हजारों रुपयों का रोज अपने हाथ से वह दान दे डालता था। जो मिले सो दान में दे डाले। एक बार मां ने पूछा कि क्यों बेटा ! यह जो सामने पहाड़ खड़ा हुआ है ना, उतना बड़ा सोने का ढेर, रुपयों का ढेर दे दिया जाये तो वह तुम कितने दिन में दान कर दोगे? तो लड़का बोला कि मां मैं तो एक मिनट में दान कर दूंगा, अब उठाने वाले चाहे कितने ही दिनों में उठावें। हम उसमें कुछ नहीं कर सकते। भाग्य से धन आता है, आने दो, मगर चिंतायें करके धन संचय करना, अनावश्यक धन संचय करना तो अच्छा नहीं है। उदयवश सहज ही आये तो उसका उपयोग और उपभोग करो। जब शरीर भी गर्व लायक नहीं है तो धन वैभव का क्या गर्व करना?

लोकविभूति की मायारूपता- एक सेठ ने बहुत बढ़िया हवेली बनवायी, उसका उद्घाटन कराया। सभा जुड़ी तो लोगों ने सेठजी की प्रशंसा के पुल बाँध दिये। सो सेठजी खड़े होकर कहने लगे (कहा तो मधुर शब्दों में, पर भीतर भरा है घमंड) कि भाईयों ! इस हवेली में यदि कोई नुक्स हो तो कृपा करके बता दो, आप लोगों की इच्छा के अनुसार उस त्रुटि को दूर कर दिया जायेगा। सभी ने कहा कि बहुत अच्छी हवेली है, इसमें कोई भी त्रुटि नहीं है। एक जैन खड़ा होकर बोला कि सेठ जी ! इसमें हमको दो बड़ी गलती नजर आ रही हैं। सेठ बोला इन्जिनियरों ! देखो यह साहब जो गलतियां बतावें, फौरन दूर करो। अच्छा बतावो गलती। जैन कहने लगा कि पहिली गलती तो इसमें यह है कि यह हवेली सदा न रहेगी। ओह यह सुनते ही सेठजी के कान खड़े हो गये कि यह गलती कैसे मिटे?......... खैर ! दूसरी गलती बताना। दूसरी गल्ती यह है कि इस हवेली का बनवाने वाला भी सदा न रहेगा। तो यह भी गलती वह कैसे मिटावे? तो किस बात पर गर्व है? गर्व करने लायक यहां कोई पदार्थ नहीं है। बड़ी नम्रता से रहो, सबको अपने समान स्वरूप वाला निरखो। किसी को तुच्छ न मानो। कुछ भी नहीं अटकी है दूसरों को ओछा मानने से। बल्कि दूसरों को तुच्छ गिनने से पापकर्म का बंध होता है, वह ब्रह्मस्वरूप के दर्शनमात्र से ही दूर हो जाता है।

किस पर गर्व- भैया ! किसी भी बात पर गर्व न होना चाहिये। कुछ ज्ञान मिला तो क्या मिला? केवलज्ञान के सामने सब ज्ञान सूर्य के आगे दीपक बराबर भी नहीं है। किन्हीं लोगों के द्वारा सम्मान, प्रतिष्ठा, इज्जत मिल गई तो क्या मिल गया? सब मायामय पुरुष हैं, उनकी मायामय चेष्टा है, कौनसा तत्त्व मिल गया? अच्छे कुल में पैदा हो गये तो उसका भी क्या घमंड? अरे यह देह ही मेरा नहीं है, बल्कि देह के ही कारण इस संसार में यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। तो फिर इस देह के कुल पर, पैदायश पर, परंपरा पर क्या गर्व करना? मां का घराना अच्छा हुआ, मेरी मां बड़े अच्छे घराने की है, अरे उस घराने पर भी क्या गर्व करना? जो कुल की बात है, वही जाति की बात है। शरीर में बल मिला तो उसका भी क्या गर्व करना? जिसके शरीर में बल ज्यादा हो, वह अपन से बड़ा हो―ऐसा तो कुछ नियम नहीं है। जितना बल भैंसों में है, जो ओं-ओं करता है, उसका बीसवां हिस्सा बल शायद मनुष्य में होगा अर्थात् 20 मनुष्यों के बराबर साधारणतया एक भैंसा होता है। और देखो मनुष्य से ज्यादा बल तो गधे में। तो इस शरीर के बल का क्या गर्व करना। यद्यपि बल भी पुण्य के उदय से होता है। ठीक है, पर यह तो नियम नहीं है कि जहां शरीरबल बढ़ा हुआ है, वहां बड़वारी है। कई महापुरुष महाबली हुए हैं, उनमें ज्ञानविशेष भी था, इससे बल की प्रशंसा है।

ऋद्धि तपस्या का क्या गर्व- ऋद्धि संपत्ति मिल गई तो क्या हुआ, क्या मिल गया है? सब बाह्यपदार्थ हैं। कुछ तपस्या हो गयी, कुछ व्रत हो गया, कुछ धर्म कर्म करते हैं तो प्रथम तो यह भी ठीक निश्चित नहीं है कि धर्म, कर्म, तप और व्रत ढंग से भी हो रहे हैं या अंटसंट। तो क्या उस तपस्या का गर्व करना? अज्ञान में की हुई तपस्या यदि कोई कार्यकारिणी हो तो जंगल में चौमासे में वृक्ष तो खूब पानी सहते हैं, अपने से पानी में खड़ा भी नहीं हुआ जाता है, क्योंकि बरसात की बूंदे बहुत लगती हैं। पेड़ तो चौमासे भर पानी सहें, ठंड में ठंड सहें, गर्मी में गर्मी सहें तो केवल शारीरिक तपस्यामात्र से कोई संकटों से मुक्त हो जाये, यह तो स्वरूप ही नहीं है। मनुष्य को तपस्या लाभदायक है, किंतु तपस्या साक्षात् उतनी लाभदायक है कि विषयकषाय गंदी बातों में चित्त न जाये, पर ब्रह्मस्वरूप में चित् रम जाये, यह तो ज्ञान बिना नहीं हो सकता। इस लोक में गर्व के लायक कोई पदार्थ नहीं है।

परमार्थदृष्टि में विसंवाद का अभाव- जिस शरीर में प्रेम हो उस शरीर में और आत्मा में भेदविज्ञान बनावो। क्यों इस बात को तरसते हो कि दुनिया के लोग मुझे कुछ समझ जाएँ। अरे ! तू है क्या? जो शरीर है, सो तू नहीं है। शरीर तो जला दिया जायेगा। जो तू है अंतरंग में, चैतन्यस्वरूप उसे कोई जानता नहीं है। यदि कोई जान जाये तो वह स्वयं ज्ञाता हो गया। उसके लिये व्यक्तिभेद नहीं रहा। तब किसमें अपना यह पोजीशन रखना है, किनमें अपना नाम रखना है? ओह ! मायाप्रपन्च का बड़ा संकट है। कोई आदमी अकेले में गाली दे दे, दो चार चांटे भी लगा दे तो उतना बुरा महसूस नहीं होता है, जितना किसी दूसरे आदमी के सामने वह गाली दे दे। तब तो यही लगता है कि इसके सामने मेरा अपमान हो गया। अरे ! अपमान भी मायास्वरूप है, अपमान करने वाला भी मायास्वरूप है और अपमान मानने वाला भी मायारूप है। यहां परमार्थ की बात तो कुछ है ही नहीं। झगड़ा किसका?

सूत न कपासा, जुलाहा से लठ्ठमलठ्ठ- एक जुलाहा और एक ग्वाला दोनों मित्र थे। एक गांव में रहते थे। एक बार दोनों एक गांव को जा रहे थे। रास्ते में मिला एक मैदान। जुलाहा बोला कि यह मैदान मुझे मिल जाये तो मैं इसमें कपास बोऊँगा और खूब वस्त्रादिक बुनूंगा। ग्वाला बोला कि यह मैदान हमें मिल जाये तो मैं इसमें भैंसे चराऊँगा। जुलाहा बोला कि तू भैंसे कैसे चरायेगा, मैं कपास बोऊँगा। ग्वाला बोला कि तू इसमें कपास कैसे बोवेगा, मैं भैंस चराऊँगा। जुलाहा ने 10-20 कंकड उठाकर इधर उधर फेंककर कहा कि अच्छा लो, यह मैंने कपास बो दिया, सो ग्वाले ने दो चार बड़े कंकड उठाकर फेंककर कहा कि अच्छा लो वह एक भैंस मेरी चरने गयी। अब उन दोनों में क्रोध बढ़ा, लो दोनों में लड़ाई हो गयी, लठ्ठमलठ्ठा हो गया। अरे न जमीन उसको मिलनी थी, न उसको, मगर यों ही व्यर्थ में लड़ मरे। ऐसे ही इस विश्व में कोई परमार्थ की बात नहीं है। सब मायारूप हैं। असमानजातीय द्रव्यपर्याय बताया है इन सब प्राणियों को अर्थात् जीव और पुद्गल दोनों के संबंध से होने वाला यह माया स्वरूप है। बात भी न कुछ है, पर विसम्वाद, तृष्णा, विडंबनाएँ इन सबका नाच हो रहा है।

भैया ! मनुष्यभव पाने का वास्तविक लाभ यह है कि हम अपने आत्मा के उस सहजस्वरूप को पहिचानें जो आत्मा के सत्त्व के कारण आत्मा में सहज अनादि से है। कौनसा स्वरूप है मेरा? ज्ञान और आनंदस्वरूप। ज्ञान के कोई रंग होता है क्या, ज्ञान में कोई रस होता है क्या? न गंध है, न शब्द है। ज्ञान तो एक जाननभाव है। और वह जाननभाव स्वत: ही आनंदभाव को लिए हुए है। मात्र जानन में किसी प्रकार की आकुलता नहीं है। ऐसा ज्ञानानंदस्वरूप मेरा है। मेरा वैभव ज्ञानशक्ति और आनंदशक्ति है, मेरा घर मेरे आत्मा का ज्ञानतेजमंडल है, अर्थात् आत्मप्रदेश है। मेरा परिवार मेरी अनंत शक्ति है। मैं मेरे से आया हूं, मैं मेरे में जाऊँगा। मेरी वर्तमान दुनिया यह मैं ही हूं। मेरा परलोक यह मैं ही हूं। परलोक भी पहुंच चुका तो वहां पर मैं मैं ही रहूंगा। ऐसे मेरे सर्वस्वसारभूत ज्ञानानंदस्वभावी निज आत्मतत्त्व को यदि न पहिचाना तो मनुष्यभव पाकर क्या किया? विषयों में, वैभव में ही अपना जीवन गुजार दिया तो कुछ न पाया।

विषयभाड़ से बचाव की भावना- लोग एक अहाना कहा करते हैं कि 12 वर्ष दिल्ली रहे और झोंका भाड़। भाई कहां गये थे? दिल्ली। कितने वर्ष रहे? बारह वर्ष। क्या किया? भाड़ झोंका। अरे भाई तुम्हें भाड़ ही झोंकना था तो यहां का गांव क्या खराब था? यहां ही अपने घर में रहकर भाड़ झोंक लेते। इसी प्रकार कहां गये? मनुष्यभव में। कितने वर्ष रहे? लगभग 50 वर्ष। क्या किया? विषयों का भाड़ झोंका। अरे भाई विषयों का भाड़ ही झोंकना था तो यह पशुपर्याय क्या खराब थी? पशुपर्याय में ही रहते। मनुष्यपर्याय में क्यों आये? इतना उत्कृष्ट मनुष्यभव पाकर यदि हमने विषयों में ही सारा जीवन गँवा दिया तो कुछ न किया। बल्कि सारा नुकसान ही रहा। सोच लो। जो बुद्धि बड़ी उम्र होने पर आती है वह बुद्धि यदि जल्दी ही आ जाय तो इस जीव का बहुत भला हो। कुट पिट जाने के बाद जो बुद्धि आती है वह बिना कुटे पिटे में आ जाय तो बड़ी भली बात है। मगर कहां से आये? जब कुट लेते हैं, पिट लेते हैं, बरबाद हो जाते हैं तब समझ में आता है कि ओह ! कहां फँसे रहे, कहां चित्त दिये रहे? आत्मा का सार वहां कहीं न था। सार मिला तो इस आत्मतत्त्व में। पर इस आत्मतत्त्व की सारभूत बात सीखने के लिए श्रम और समय देना होगा।

ज्ञानसाधना का पुरुषार्थ- एक जिज्ञासु पहुंचा साधु के पास। कहा महाराज ! कुछ शिक्षा दीजिए। साधु ने कहा, अच्छा सीखो― परमंब्रह्म, एकोऽहं, एकं ब्रह्म। अच्छा साहब और पढ़ावो। फिर साधु ने वही बोल दिया। और पढ़ावो फिर वही बोल दिया। शिष्य ने कहा― महाराज अब और कुछ पढ़ावो। साधु ने कहा अच्छा, यदि तुम्हें और कुछ सीखना हो तो अमुक गांव के पांडे जी के पास जावो। पांडे जी के पास गया वह शिष्य सीखने। कहा-- महाराज हमें कुछ विद्या सिखावो। पांडे जी ने कहा― अच्छा हम तुम्हें कुछ काम देते हैं सो काम करो और विद्या सीखो। हां हां करेंगे। देखो हमारी गौशाला में जो गोबर होता है सो उसका कंडा थापना, गौशाला साफ करना और फिर विद्या सीखना। अच्छा महाराज। उसने यह काम किया बारह वर्ष तक। बारह वर्ष के बाद कहा, महाराज अब अंतिम सारभूत विद्या सीखा दो। बोला परमब्रह्म, एकोऽहं, एकं ब्रह्म। जिज्ञासु ने कहा, अरे इतनी बात तो हमें 12 वर्ष पहिले साधु जी ने सीखा दी थी। अरे तो और क्या सीखायें? तो क्या महाराज हमने 12 वर्ष मुफ्त ही गोबर उठाने का काम किया? अरे भाई इतनी बात सीखने के लिए 12 वर्ष तक ये सारे काम करने ही चाहियें थे। हम कुछ श्रम न करें, कुछ समय न दें, सत्संग न बढ़ायें और चाहे कि हमारा भला हो जाये तो ऐसा कैसे हो सकता है? आत्महित चाहते हो तो ज्ञानार्जन करो, सत्संग करो, कषाय को पी डालो याने दूर करो, ऐसी ही वृत्ति से हम आप कल्याण के सम्मुख होंगे।


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