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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 5

From जैनकोष



बहिरात्मा शरीरादौ जातात्मभ्रांतिरांतर:।चित्तदोषात्मविभ्रांति: परमात्माऽतिनिर्मल:।।5।। त्रिविध आत्मावों में से बहिरात्मा लक्षण―इस छंद में बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा का स्वरूप कहा गया है। जो शरीरादि में अपना आत्मा माने उसे बहिरात्मा कहते हैं। आदि शब्द से मन और वचन ग्रहण करना है अर्थात् तन मन और वचन में जो यह मैं आत्मा हूँ ऐसा माने उसे बहिरात्मा कहते हैं। धन वगैरह की इसमें चर्चा नहीं है क्योंकि वह तो प्रकट भिन्न है। उसके साथ आत्मा का कोई संबंध नहीं है। आत्मा का संबंध तन, मन और वचन से है इसलिए धन में आत्मा मानना ऐसी बात यहाँ नहीं कही जा रही है। जो धन को ही आत्मा माने उसकी तो चर्चा करनी ही न चाहिए। वह तो अति व्यामोही पुरूष हैं।

देहात्मबुद्धिता―शरीर है, सो आहारवर्गणा जाति के पुद्​गल स्कंधों का पिंड है, किंतु यह आत्मा चेतन है और ये सर्वस्कंध अचेतन हैं। इन सर्वस्कंधों की और आत्मा की जाति ही नहीं मिलती है और फिर भी शरीर को आत्मा माने सो वह बहिरात्मा पुरूष है। मन भी एक शरीर का अंग है अथवा शरीर के अवयवरूप मन को निमित्त करके जो विचार, कल्पनाएं बनती हैं वे मन कहलाती हैं और जो विचार कल्पनाओं को आत्मा न माने वह है ज्ञानी और उन्हें ही जो आत्मा मानता है वह बहिरात्मा। वचन इस आत्मा की इच्छा और प्रयत्न के कारण जो शरीर के अंगों में परिस्पंद होता है उसका निमित्त पाकर भाषावर्गणा जाति के स्कंध जो वचनरूप परिणमते हैं उन्हें वचन कहते हैं। इन वचनों में यह मैं हूँ या मैं बोलता हूँ, मैं ऐसा कहूँगा इत्यादि प्रकार से वचनों में आत्मीय का संबंध करना यह भी बहिरात्मापन है। तन, मन और वचन ये तीन प्रकट अचेतन हैं अथवा भाव मन भी आत्मस्वभाव न होने से जीव नहीं माना गया। उन सबमें आत्मापन का भ्रम करना सो बहिरात्मापन है।

अंतरात्मा का स्वरूप―अंतरात्मा का लक्ष्य किया गया है कि चित्त, दोष तथा आत्मा इन तीनों में जब किसी के भ्रम नहीं रहता है उसे अंतरात्मा कहते हैं अर्थात् चित्त को चित्तरूप से ही मानें, दोषों को दोषरूप से ही मानें और आत्मा को आत्मारूप से ही मानें ऐसी जहाँ यथार्थ दृष्टि होती है उसे कहते हैं अंतरात्मा। चित्त का अर्थ है कल्पना, विचार अथवा क्षायोपशमिक ज्ञान। बहिरात्मा जीव क्षायोपशमिक ज्ञान को आत्मसर्वस्व मान लेता है। जैसे यहाँ जानन इसी तरह बना हुआ है बस यह मात्र मैं हूँ ऐसी प्रतीति का नाम चित्त में भ्रम पैदा करना कहलाता है। नहीं तो चित्त को चित्तरूप मानता था। यह खंडज्ञान है, क्षायोपशमिक ज्ञान है। अमुक-अमुक ज्ञानावरण के क्षयोपशम के कारण उत्पन्न हुआ है। यह मैं नहीं हूँ। हां मेरे उपादान से प्रकट हुआ है। यों उस चित्त से अपने आत्मस्वरूप को जो न्यारा समझे उसे अंतरात्मा कहते हैं। चित्तदोषात्मविभ्रांतिता―जब चित्त से ही अपने को जुदा समझ लिया हो तो दोषों से अपने आपका तो जुदा समझना प्राथमिक ही बात है। रागद्वेष आदिक विभाव जो कर्मों के उदय का निमित्त पाकर हुए हैं उन विभावों में यह मैं आत्मा हूँ ऐसी स्वीकारता करना सो बहिरात्मापन है और यह दोष दोष है, रागादिक विभाव औदयिकभाव हैं, उन औदयिक भावों से विविक्त ज्ञानमात्र अपने आपका प्रत्यय करना सो अंतरात्मापन है। चित्त और दोषों ये दोनों ही आत्मतत्त्व नहीं होते हैं। मैं परम पारिणामिक भावस्वरूप एक ज्ञानानंद चैतन्यतत्त्व हूँ। अब आत्मा को भी आत्मारूप से मानना यह अंतरात्मा के लक्षण में तीसरी बात कही गयी है। कितने ही जीव पर को आत्मा मानते हैं, कितने ही जीव आत्मा को पररूप मानते हैं। सारा विश्व एक मैं हूँ ऐसी जिसकी प्रतीति रहती है, कल्पना होती है उन्होंने समस्त पर को आत्मा मान लिया है अथवा सर्व चीजें प्रतिभासमात्र हैं, जिसे ज्ञानाद्वैत कहते हैं। सब कुछ ज्ञानमात्र है, ज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है, ऐसी कल्पना में उसने अपने को सर्वरूप मान लिया। इन दोनों ही कल्पनाओं में आत्मा को आत्मारूप से स्वीकार नहीं किया गया है। तो जिनके चित्त से, दोष से और आत्मा से भ्रांति मिट गयी है, उन्हें उस ही रूप समझते हैं उन्हें कहते हैं अंतरात्मा। परमात्मतत्व―परमात्मा उसे कहते हैं जो अत्यंत निर्मल आत्मा हो। परमात्मा शब्द में तीन शब्द हैं पर, मा, आत्मा। पर में पर मा इन दो शब्दों का समास है, उत्कृष्ट लक्ष्मी जहाँ हो उसे परम कहते हैं। लक्ष्मी का अर्थ है ज्ञान। लक्ष्मी, लक्ष्म, लक्षण ये सब एकार्थक हैं। लक्ष्म शब्द नपुंसकलिंग है और लक्ष्मी शब्द स्त्रीलिंग है। पर एक ही शब्द है। लक्ष्म का अर्थ है लक्षण। आत्मा का लक्षण है ज्ञान और उस ज्ञान का ही नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी की आकांक्षा करने वाला तो चैतन्यतत्त्व ही होता है। अचेतन में आकांक्षा नहीं होती और उन चेतनों का लक्षण है ज्ञान। इसलिए ज्ञान का ही नाम लक्ष्मी है। देखो तो गजब, लक्ष्मी के ज्ञान बिना लक्ष्मी लक्ष्मी को चाह रही है। लक्ष्मी नामक कोई देवी हो, जो धन बिखेरती हो ऐसा कुछ नहीं है। ज्ञान का ही नाम लक्ष्मी है। ज्ञान ही अर्थोपार्जन कराने वाला है। इससे इस ज्ञानलक्ष्मी को ही पहिले काल में लक्ष्मी कहा जाता था और लक्ष्मी के पूजने का अर्थ है ज्ञान की पूजा। दीपावली निर्वाणपूजा व ज्ञानपूजा का प्रतीक―दीवाली के समय प्रात:काल तो निर्वाणपूजा होती है और सायंकाल को लक्ष्मीपूजन होती है। हुआ क्या था कि कार्तिक बदी अमावस्या के प्रात:काल वीर का निर्वाण हुआ था और अमावस्या को ही सायंकाल गौतमगणधर को केवलज्ञान हुआ था। सो प्रात: दीपमालिका मनाते हैं वह है निर्वाण की और सायंकाल जो दीपमालिका मनाते हैं वह है ज्ञानपूजा। उपादेयभूत ज्ञानलक्ष्मी थी पर जो उत्कृष्ट उपादेयभूत है वह कहलाती है लक्ष्मी। ऐसा तो ध्यान में रहा, पर मोही जीवों को उत्कृष्ट और उपादेय धन जंचा, सो उसका नाम लक्ष्मी लिया जाने लगा और वैभव धन तो नानारूपों में है। सोना, चाँदी, रूपया, नोट, अनाज, घर अनेक रूपों में धन है, तो फिर पूजे किसे किसे ? तो सब वैभवों की प्रतिनिधिरूप एक लक्ष्मी नाम की देवता की कल्पना की। जिसके चार हाथ हों, दो हाथी अगल बगल माला लिए खड़े हों और हाथों से रूपये गिराते जा रहे हों, इस तरह से आकाररूप वाली लक्ष्मी देवीकी पूजा करने लगे। वास्तव में लक्ष्मी नाम है ज्ञान का। उत्कृष्ट मां अर्थात् लक्ष्मी। याने ज्ञानलक्ष्मी जहाँ हो उसे परम कहते हैं और इन दोनों शब्दों के साथ कर्मधारय समास है। परम जो आत्मा है उसे परमात्मा कहते हैं।

निर्मल आत्मत्व की प्राप्ति का उपाय―यह परमात्मा अत्यंत निर्मल है; द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म से रहित है। पर जैसे कि पूर्व श्लोक में बताया है कि बहिरात्मापन छोड़ना चाहिए। परमात्मापन ग्रहण करना चाहिए और इन दोनों के ही त्याग और उपादान करने का उपाय है अंतरात्मा बनना अर्थात् आत्मा का सनातन सत्य जो पारिणामिक स्वरूप है चितस्वभाव वह क्या स्वरूप रखता है ? उस स्वरूप की पहिचान में, उस स्वरूप की दृष्टि में, प्रतीति में अपने आपको लगाना चाहिए। उस स्वरूपदर्शन की सुविधा में यह जान लेना चाहिए कि जानन क्या कहलाता है ? जानन यद्यपि परिणमन है और अपने को समझना है ज्ञानगुण को, ज्ञान शक्ति को, स्वभाव को तथापि उस स्वभाव को परखने के लिए प्रथम ज्ञान परिणमन के स्वरूप को जानो। जाननरूप परिणमन क्या है ? किसका नाम है जानन ? यह जाननस्वरूप शीघ्र ग्रहण में आ सकता है क्योंकि यह साकार है। उस जानन के रूप को समझते हुए में जो ज्ञेयपदार्थ ज्ञान में आ रहे हैं उस ज्ञेय की मुख्यता न करें और उस जानन परिणमन की मुख्यता करें अर्थात् जो बाह्य ज्ञेयपदार्थ आ रहे हैं उनको न छू कर जो ज्ञेयाकार परिणमन रहता है उसको जानें।

मात्रज्ञेयाकार ग्रहण की शक्यता―जैसे दर्पण के सामने कोई चीज रखी है उसका दर्पण में प्रतिबिंब हो गया तो उस काल में हम दर्पण के प्रतिबिंबमात्र को ही देखें ऐसा भी तो कर सकते हैं। बाह्य अथ का कुछ विकल्प न करें, केवल दर्पण में अंत:प्रतिबिंब को देखें। जैसे हम यहाँ बाह्यपदार्थों को न निरखकर केवल द्रव्य के अंत:बिंब को देख सकते हैं, इस ही प्रकार हम बाह्य ज्ञेयतत्त्वों को न निरखकर अपने आत्मप्रदेश में जो ज्ञेयाकार परिणमन हो रहा है, मात्र उस ज्ञेयाकार परिणमन को हम देख सकते हैं और ऐसा देखते हुए जानन का स्वरूप समझ सकते हैं। ज्ञानाकार ग्रहण का यत्न―उस जाननस्वरूप को समझते हुए अब हम उसके स्रोतरूप शक्ति और स्वभाव में उतरें तो पर्यायरूप जानन का परिणमन का विकल्प भी हटकर मात्र जानन स्वभाव पर दृष्टि होगी। इस जानन स्वभाव की प्रतीति, आश्रय, आलंबन शुद्ध जानन परिणमन का कारण होता हैं। अर्थात् शुद्ध केवलज्ञान प्रकट होने का कारण है ज्ञानस्वभाव का आलंबन। इस तरह इस छंद में बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा का लक्षण कहा है। अब परमात्मा का और विशेष वर्णन करने के लिए श्लोक कह रहे हैं।


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