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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 66

From जैनकोष



रक्ते वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न रक्तं मन्यते तथा ।रक्ते स्वदेहेऽऽप्यात्मानं न रक्तं मन्यते बुध:॥66॥

पुन: दृष्टांतपूर्वक आत्मा की विविक्तता उपसंहार – जैसे वस्त्र लाल रंग में रंग लेने से कोई यह नहीं मानता कि मैं लाल हो गया हूं । किसी भी प्रकार का रंगीला कपड़ा पहिन लेने हर पुरुष क्या यह विश्वास करने लगता है कि मैं इस रंग का हूं ? नहीं करता । इसी तरह इस शरीर के भी लाल होने पर या किसी भी तरह के रूप होने पर यह अपने को अर्थात् जीव को लाल नहीं मानता है ।

देह में रूप की उपपत्तिविषयक जिज्ञासा व समाधान – भैया, पुद्गल में रूप हुआ करता है, इस नाते से भी इस शरीर में रूप हुआ करता है, पर साथ ही रूपनामक नामकर्म का उदय होने से भी रूप हुआ करता है । जिस किसी भी प्रकार का रूपनामक नामकर्म का उदय हो और हो गया रूप, पर रूप का आधार जीवन ही है, रूप का आधार पुद्गल ही है, क्योंकि पुद्गल ही रूप होता है । यह एक करणानुयोग विषयक जिज्ञासा हो सकती है कि जब पुद्गल का स्वभाव ही रूप, रस, गंध, स्पर्श वाला होता है तो फिर शरीर के रूप होने के लिए रूप नामक नामकर्म की क्या आवश्यकता है ? शरीर नामक नामकर्म से शरीर मिल गया तो शरीर पुद्गल के नाते से रूप वाला तो हुआ ही करेगा । फिर रूपनामक नामकर्म ने क्या किया ? इसी प्रकार रस, गंध, स्पर्श नामक भी नामकर्म है । उस नामकर्म ने भी क्या किया ? चूंकि शरीर पुद्गल है और पुद्गल में ये चार स्वभाव होते हैं, सो हुआ ही करेंगे । कौन सी विशेषता उन कर्मों से हुई ? इस जिज्ञासा का समाधान यह है कि पुद्गल के कारण रूप रस आदिक होते तो वे सब अटपट जैसे चाहे होते, किंतु भव भव में, रूप आदिक सदृश जाति में प्रतिनियत होता है, इसका कारण यह कर्मोदय है ।

जैसे कई चींटियां हैं । चींटियों में उस तरह का रूप होगा, वह प्रतिनियत होगा । जो सब चींटियों में उस तरह का रूप पाया जाएगा, यह नियम नामकर्म के उदय से होता है । पुद्गल के नाते इस तरह का नियम नहीं आ सकता है । जितने घोड़े हैं, उन घोड़ों के शरीर में उन जैसा रूप, उन जैसा रंग, उन जैसा गंध हुआ करता है । मनुष्यों में मनुष्यों जैसा रूप, रस, गंध, स्पर्श हुआ करता है । ऐसा जो प्रतिनियम है, वह उस नामकर्म के उदय से बनता है ।

आत्मविषयक विविध मान्यताओं की विडंबना का कारण – कैसा ही हो जाए शरीर ? लाल हो गया शरीर तो ज्ञानी अपने को लाल नहीं मान लेता । सांवला हो गया शरीर, किसी भी रंग का मिला शरीर तो ज्ञानी पुरुष अपने को उस रंग वाला नहीं मानता है । अज्ञानी ही ऐसी कल्पना करता है कि मैं गोरा हूं, काला हूं, सांवला हूं, गेहुंवां हूं – ये नाना प्रकार की कल्पनाएँ अज्ञानियों में होती हैं । जो देह और जीव को एकरूप मान रहे हैं, वे याने देह जीव को एक गिने – ऐसे बहिरात्मा पुरुष अपने को रंगीला माना करते हैं । जिसकी मूल में ऐसी व्यामोह बुद्धि है कि अपने आपको अमूर्त चैतन्यस्वरूप न मानकर जिस पर्याय में पहुंचा, उस देह रूप ही अपने को मानने लगता है । उसकी इस मूलभित्ति पर फिर और मिथ्या कल्पनाएँ चलने लगती हैं, यह शरीर सुहावना लगने लगता है और रूप रंग में भी भेद डालने लगता है, यह रूप सुरूप है, यह रूप कुरूप है – ऐसा भेद डालने लगता है । फिर उनमें रागद्वेष की प्रवृत्ति होने लगती है । इन सब विडंबनाओं का मूल कारण देह में और जीव में अभेदाभ्यास कर लेना है ।

देह की अपवित्रता व वीभत्सता – कितना अपवित्र है यह शरीर ? हम आपके भीतर से लेकर बाहर तक मल ही मल भरा है । रोम, चमड़ी, मज्जा, मांस, हड्डी सब अंदर से लेकर बाहर तक सब मल का पुतला है और यह शरीर घिनावना मल केवल एक पतली चादर से मढ़ा हुआ है । कितना असार यह देह है, पर पर्याय व्यामोही इस देह के रूपादिक पर मुग्ध होकर इन सब तथ्यों को भूल जाता है । व्यामोही की बात उस व्यामोही में ही है ।

कौन सा अंतर ऐसा आ जाता है ? मैं लाल हूं, सफेद हूं, सांवला हूं – यह अंतर पड़ा हुआ है । अरे यह सारा देह असार है, घिनावना है, अपवित्र है । जिसके मन में विषयकषायों का चोर पड़ा हुआ है, वह सुहावने और असुहावने की छटनी कर लेता है । इस घिनावने शरीर में पतले चाम की चादर मढ़ी हुई है । जरा इसके अंदर के नक्शे को देखो तो क्या ये सूरतें उस रूप में नजर आयेंगी, जैसी कि मरघटों में खाली खोपड़ियां होती हैं ? वे कितनी भयंकर दिखती हैं । कैसे आंख के गड्ढे, चपटी नाक बनी है, कैसे दांत निकले हैं । ऐसी खोपड़ी तो सभी की है । इस पर पतले चाम की चादर मढ़ी है । इस ओर अज्ञानी की दृष्टि नहीं पहुंचती है ।

अमूर्त आत्मा में व्यर्थ की विराधना – भैया ! इतना ही हो जाए कि अपने विषयसाधनों के लिए कुछ सुहा गया, तब भी कुछ गनीमत हो, किंतु यह तो इन सब जीवों में अपने रिश्ते और परिजन संबंधी भाव बनाता है कि ये सब मेरे हैं । अरे शरीर तक तो मेरा है नहीं और श्रद्धा ऐसी बना ली है कि ये सब मेरे हैं । जैसे रंगे हुए वस्त्र से भिन्न ये पुरुष है – ऐसे ही रंगे हुए देह से भिन्न यह आत्मा है । देह के रंग की तो बात क्या कहें ? वह तो भिन्न है ही, पर भिन्न विभिन्न कषायों के भेद का निमित्त पाकर जो आत्मा में राग रंग चढ़ा हुआ है, रागद्वेष विभाव बने हुए हैं, उससे भी यह आत्मा न्यारा है । यह तो मात्र चिदानंदस्वरूप ज्ञानप्रकाशमात्र अकाशवत् निर्लेप अमूर्त भावात्मक है, जो कभी भेदा भी नहीं जा सकता – ऐसा यह अमूर्ततत्त्व ज्ञानमात्र आत्मा है ।

अंतस्तत्त्व का प्रसाद – बड़े महायोगीश्र्वर इस ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व की दृष्टि रखा करते हैं । इसी से वे निर्जन जंगल, सघन वन के स्थान में भी अकेले रहकर सदा प्रसन्न रहा करते हैं। वास्तविक प्रसन्नता तो अपने आपके स्वरूप के मिलन में है । यह मायामय बाहरी मिलन वास्तविक प्रसन्नता उत्पन्न नहीं कर पाता है । यह मेरा रक्षक परमपिता पारमेश्वर्य संपन्न आत्मतत्त्व इस अपने आपका भला करने के लिए अनादिकाल से शाश्वत उद्यत है । लेकिन यह ही मैं उपयोग, मोह, ममता से मलिन हो इसकी ओर दृष्टि भी नहीं करता हूं । कभी यह उपयोग केवल दृष्टिभर तो कर ले, फिर तो प्रवाह की तरह बड़ी घन धाराओं में यह आनंद परिणत होगा । इसके समस्त संकट टल जायेंगे ।

सावधान ! – वाह रे मोह की लीला कि जिससे विवश होकर ये जीव जो शाश्वत सहजआनंदस्वरूप है, आनंद देने वाला है, उस ओर तो दृष्टि भी नहीं करते और जिनका संगसमागम मिलना केवल आकुलता को उत्पन्न करने वाला है, उनकी ओर ये अपना उपयोग देते हैं । इस जीव योनी में, इन जीव कुलों में एक मनुष्यभव ही ऐसा उत्कृष्ट भव है कि जहां श्रेष्ठ मन मिला है, कल्याण का उपाय कर सकते हैं । वहां भी यह जीव अपने को थका ले, विषयकषायों से मलिन कर ले तो फिर बतलावो कि किस काल में, किस भव में सुधरने का अवसर आयेगा और करना भी कुछ अटपट काम नहीं है, सीधा काम करना है । जो जैसा है उसको वैसा जानना भर है । इस यथार्थ ज्ञानकला पर हम आपका भविष्य निर्भर है । पर इतना ही न किया जाय तो फिर दूसरा मददगार कौन हो जायेगा ?

अर्ंतज्ञानप्रकाश – शरीर भी मेरा नहीं है, तो ऐसे ही समझ लो कि शरीर से भी मैं जुदा हूं । जब घर संपदा रूप भी मैं नहीं हूं, तो फिर ऐसा समझलो कि मैं इन सबसे भी विविक्त हूं । जो आनंद सर्वसे विविक्त होने में है वह आनंद किसी पर के ग्रहण में नहीं है । वह तो मोह का अंधेरा है और अंतर में यह आकिंचन्य भाव के ज्ञान का प्रकाश है । इस आनंद को आत्मा ही उत्पन्न किया करता है, किसी परवस्तु के कारण आनंद नहीं आता है । यहां बड़ा जाल है, गोरखधंधा है, ज्वारियों का फड़ है । जैसे ज्वारीयों के स्थल पर बैठा हुआ पुरुष हारे तो नहीं उठ सकता, जीते तो नहीं उठ सकता, ऐसे ही इस मायामयी दुनिया में पुण्य का फल पाये तो जीते यहां से नहीं हट सकता है । इसी तरह पाप का फल पाये, हारे तो यहां से उठ नहीं सकता । इसी मोह ममता में ही रहकर सड़कर इसे जीवन समाप्त करना पड़ता है। देखो देह से भी न्यारा अपने को तको । कैसी भी देह की अवस्था हो, फिर भी मैं देहरूप नहीं हूं – ऐसा अनुभव करे तो अंतर में ज्ञानप्रकाश फैलकर सहज शुद्ध आनंद को उत्पन्न करेगा ।


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