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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 79

From जैनकोष



आत्मानमंतरे दृष्ट्वा दृष्ट्वा देहादिकं बहि: ।

त्योंतरविज्ञानादभ्यासादच्युतो भवेत् ॥79॥

अपने आत्मा में अपने आत्मा को देखकर और बाहर में देहादिक को देखकर उन दोनों में भेदविज्ञान करने से और उस ज्ञान के अभ्यास से यह जीव ऐसी अवस्था को प्राप्त होता है कि जहाँ से फिर यह च्युत नहीं होता ।

व्यामोह के समूल विनाश के उपायक्रमों में प्रथम पर्याय ज्ञानरूप उपाय –इस जीव को अनादि काल से पर्याय का बोध है; पर्याय का पर्यायरूप से बोध नहीं, किंतु पर्याय को आत्मस्वरूप मानने के रूप से बोध है ऐसा इस पर्यायमुग्ध जीव को इस पर्यायव्यामोह के गर्त से बचाने का क्या उपाय है वह उपायक्रम से सुनिये । प्रथम तो उस ही प्रकार के पर्याय का ज्ञान बनने दीजिए जो करणानुयोग में मार्गणावों के स्थान बताये हैं, गति, इंद्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व, संज्ञित्व और आहारक इनका जो भेदविस्तार कहा है वे सब पर्यायें हैं । पर्यायों का खूब ज्ञान कीजिए, पर्यायें अध्रुव होती हैं अर्थात् अनादि अनंत नहीं होती हैं, कभी हुई हैं और कभी मिट जाती हैं ।व्यंजन पर्यायों का परिज्ञान –जैसे नरकगति, यह जीवबद्ध पर्याय है । नरकगति प्रारंभ से ही जीव में नहीं है, और न किसी के अनंत काल तक रहेगी ।यह नरकगति पर्याय है तिर्यंचगति भी प्रारंभ से नहीं है । मनुष्य गति और देव गति भी इसी प्रकार अध्रुव हैं, गतिरहित अवस्था यद्यपि अनंत काल तक रहेगी यानी सिद्ध होने के बाद सिद्ध फिर संसारी नहीं बनता, वह सिद्ध ही रहा करेगा, लेकिन यह गतिरहित अवस्था इस जीव में प्रारंभ से न थी, किसी दिन प्रकट हुर्इ है इस कारण यह भी पर्याय है; गतिरहित शुद्ध व्यंजनपर्याय है, इस कारण इसमें प्रतिसमय नवीन-नवीन अवस्थाओं का बनना नहीं विदित होता है ।गुणपर्यायों का ज्ञान –ज्ञान भी एक गुण है और उसकी पर्याय 8 हैं । मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय, केवल और कुमति, कुश्रुत, कुअवधि । इनमें से कुछ पर्याय तो बहुत जल्दी समझ में आती है कि यह हुयी और मिट गयी । अभी मतिज्ञान हो और थोड़ी देर में मिट जाय, श्रुतज्ञान हो गया, अवधिज्ञान हो गया है और जल्दी बदलकर फिर दूसरे हो जाते हैं । समझ में आता है, पर केवलज्ञान के बारे में यह सोचना जरा कठिन हो जाता है कि केवलज्ञान हुआ और फिर क्या केवलज्ञान मिट गया ? केवलज्ञान होने के बाद फिर वह ज्ञान मिटता नहीं है, लेकिन वह ज्ञानगुण की पर्याय है सूक्ष्म दृष्टि से देखो तो जैसे केवलज्ञान परिणमन से इस समय सारे विश्व को जाना तो इसके बाद दूसरे समय में जो सारे विश्व का जानन हुआ वह दूसरा केवलज्ञान है । ऐसे ही प्रतिसमय नवीन-नवीन केवलज्ञान का उदय हो रहा है, किंतु जानता है वैसा जैसा कि पहिले जानता था ।

दृष्टांत पूर्वक केवलज्ञान की वर्तना का समर्थन –जैसे एक पुरुष सिर पर एक मन का बोझ रखे हुये खड़ा है ज्यों का त्यों, जरा भी नहीं हिलता-डुलता, आध घंटे बराबर खड़ा हुआ है । अब मोटे रूप में तो यों दिखता है कि इस आत्मा ने कोई दूसरा काम नहीं किया, वही काम आध घंटे से ज्यों का त्यों कर रहा है खंभासा खड़ा हुआ । वैसा का वैसा ही वही एक काम है, नया दूसरा काम कुछ नहीं कर रहा, पर उस पुरुष में प्रति सेकेन्ड नया-नया काम हो रहा है, नवीन-नवीन शक्ति खर्च हो रही है, प्रतिसमय ताकत लगाये चला जा रहा है । यदि शक्ति का प्रत्येक क्षण परिणमन हो रहा है तो वहाँ भी नया ही नया काम कर रहा है । चाहे वैसा का वैसा हो किंतु काम तो नया ही नया हो रहा है । ऐसे ही केवलज्ञान नवीन-नवीन प्रकट हो रहा है केवलज्ञान ही ज्ञान । विसदृश ज्ञान नहीं होता है । लेकिन जानना प्रतिसमय नया ही नया हो रहा है, जानना वही है ।

पर्यायों के स्रोतभूत गुण का परिज्ञान –भैया ! पहिले पर्याय का खूब ज्ञान करना चाहिये, फिर यह समझो कि जितनी भी दशायें हैंवे सब दशायें एक शाश्वत गुण की हुआ करती हैं । एक अवस्था से दूसरी अवस्थायें हुई तो वे नाले के किनारे जैसी अलग-अलग नहीं हैं उन दोनों के मध्य में एक तत्त्व है जो पहिले किसी दूसरी अवस्था रूप था, अब किसी दूसरी अवस्था रूप हो गया । जैसे आम में रंग बहुत बदलते हैं । जब बहुत छोटा आम है तब उसमें काला रंग होता है, जब कुछ बड़ा होता है तो नीला रंग हो जाता है और बड़ा हुआ तो हरा रंगहो गया; और बढ़ने पर पीला हो गया, खूब पकने पर लाल हो गया, और जब सड़ने लगता है तब सफेद बन जाता है । आम में सब रंग आ जाते हैं क्रम-क्रम से, पर नीले के बाद हरा रंग आया है तो नीला और हरा दो स्वतंत्र अलग चीजें नहीं हैं । जो रूप नीली अवस्था में था वही रूप अब हरी अवस्था में हो गया । रूप गुण वही हैं ।

गुणों का अभेद एकत्व –गुण एक शक्ति का नाम है जो चिरकाल रहता है, किंतु गुण की जो अवस्था है वह पर्याय है, वह होती है और मिट जाती है, तो पहिले पर्यायों का अध्ययन हुआ फिर यह पर्याय किस गुण-शक्ति की है ऐसी शक्तियों का अध्ययन हुआ, फिर यह जानना चाहिए कि ये सब शक्तियाँ बिखरे हुए तत्त्व नहीं हैं, किंतु वहाँ पदार्थ तो, सत् तो कुछ एक ही है, उस सत्​ की यह विशेषता जानी गयी है । उस सत् में अनंत प्रकार की शक्तियाँ हैं । इस प्रकार के गुण के परिज्ञान के बाद फिर द्रव्य को जानो, इस तरह जैसे अपने द्रव्य गुण पर्याय को जाना, ऐसे ही बाह्य में अन्य पदार्थों के द्रव्य गुण पर्याय को जानो ।

चेतन की विविक्तता –ज्ञान में जितना जो कुछ बनेगा वह सब चैतन्य स्वभाव को व्याप करके बनेगा, कहीं पुद्गल के परिणमनरूप न हो जायगा । पुद्गल भी जो कुछ बनेगा वह पुद्गल के गुणों को न लाँघ कर उन गुणों को ही व्यापकर पर्याय बनेगा । यों यह चेतन चैतन्यात्मकता को व्यापकर ही परिणमता है और येदृश्यमान अचेतन पदार्थ अचेतन स्वरूप को व्यापकर ही अपना परिणमन करते हैं, यह तो है और अचेतन के भेद के भाव की बात । मैं चेतन बाकी समस्त अनंत चेतन के स्वरूप में व्यापकर न परिणमता हुआ उन सबसे विविक्त रहकर केवल चैतन्यस्वरूप को ही व्यापकर परिणमता हूँ ऐसा देहादिक में और आत्मा में स्पष्ट भेद जानो और एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य में अत्यंताभाव है ऐसे ही ज्ञाता बने रहो जिससे आत्मा में विकल्प होने का अवकाश ही न आये। यों भेदविज्ञान के अभ्यास से और पश्चात् अभेदस्वरूप के ज्ञान के अभ्यास से यह जीव संसार पर्याय को छोड़कर मुक्त हो जाता है ।अभ्रांत दशा में शुद्ध विलास –भैया ! जब तक भ्रम रहता है तब तक ज्ञान की गति और किस्म से चलती है । जहाँ भ्रम खतम हुआ तो ज्ञान की गति और किस्म से चलने लगती है । राजवार्तिक में एक दृष्टांत दिया है कि एक पुरुष व्यभिचारी था, किसी अन्य स्त्री का अनुरागी था और पुरुष की माँ, वह भी किसी अन्य पुरुष की अनुरागिणी थी । इसमें भ्रम का उदाहरण दिया जा रहा कि भ्रम में कैसी वृत्ति हो जाती है और सम्यग्ज्ञान का भी उदाहरण दिया जा रहा है कि ज्ञान की झलक आने पर कैसा निर्णय हो जाता है और कैसा खुद का प्रवर्तन होता है । दोनों भिन्न-भिन्न समयों में रात्रि को घर छोड़ कर कहीं जा रहे थे । इधर से वह लड़का जा रहा था । सामने से माँ आ रही थी । रात्रि का समय, अंधेरी रात्रि, मात्र कोई है इतना ही दिखता था । वहाँ पुत्र ने यह समझा कि वह हमारी अनुरागिणी स्त्री है और माँ ने समझा कि यह ही अनुरागी पुरुष है । सो इस भ्रम से उनका चित्त, उनकी वृत्ति में दुर्भाव होने को रहा था । इतने में बिजली चमकी, एक दप भक्कारा-सा हुआ और कुछ दूर से ही दोनों ने दोनों को पहिचान लिया । अब इसके बाद ऐसे शुद्ध ज्ञान का प्रकाश जगा कि वे दोनों पछतावा करके दूर हट गये । भ्रम में भ्रम जैसी प्रवृत्ति होती है और ज्ञान होने पर ज्ञान जैसी प्रवृत्ति ही होनी पड़ती है ।

दृष्टांतपूर्वक अभ्रांत दशा में धीरता का विवरण –भैया ! अब और भी दृष्टांत लो सामने रस्सी पड़ी है उसमें साँप का भ्रम हो गया । अपने इस भ्रम के होने पर उस भ्रमी पुरुष को वैसी ही आकुलता होगी जैसी साँप से भय करने वाले को होती है । कुछ देर बाद लक्षण से पहिचाना, विशेष तेज उजाला किया और जान गया कि यह तो रस्सी ही है, तो रस्सी का ज्ञान करने के बाद फिर देखलो उसके भीतर की ज्ञान-वृत्ति एकदम पलट जाती है, सारी आकुलता दूर हो जाती है । अच्छा, अपनी ही बात देखो, जब सोने में कोई स्वप्न आ रहा हो, शेर आ गया है, मेरे समीप आ रहा है, मुँह बाये चला आ रहा है, अब यह खाने को ही है, ऐसा स्वप्न आ रहा हो तो कितना रंज होता है, और उस समय थोड़ी नींद कम हो जाय, कुछ जगने जैसी हालत हो जाय, कुछ जगतासा है और हिम्मत बनाता है, अरे ! मैं तो कमरे में पड़ा हुआ हूँ, कहाँ है जंगल, कहाँ है शेर ? उसे खुशी हो जाती है । चूंकि भ्रम में दु:खी था, स्वप्न में क्लेश था, इस कारण स्वप्न मिट जाने पर क्लेश मिट गया और उसने बड़ा आनंद माना । ओह ! मैं न था शेर के पास । मैं तो सुरक्षित हूँ । कितने ही दृष्टांत लो, भ्रम की हालत में जो परिणति होती है भ्रम मिट जाने पर, ज्ञानप्रकाश होने पर उसकी चित्तवृत्ति ही पलट जाती है ।

ज्ञानी का अलौकिक आनंद –जब इस जीव ने अपने आत्मा में अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को देखा तो एक अद्भुत अलौकिक आनंद का अनुभवन किया जो न इंद्रिय के अधीन है, न किसी पर के अधीन है । सहज अपने आप में प्रकट हुई वह अनाकुलता है, उस आनंद का अनुभवन कर लेने पर उसकी वृत्ति अब विषयों में नहीं जमती है । जैसे स्वादिष्ट मिठाई के लोभी को स्वादिष्ट मिठाई खा लेने पर उसे रूखी-सूखी दाल-रोटी में रस नहीं मालूम होता है, ऐसे ही निरुपम, सत्य, स्वाधीन आनंद का अनुभव कर लेने वाले ज्ञानी पुरुष को इंद्रिय के विषयों में अनुराग नहीं जगताहै, उसमें आनंद की कल्पना भी नहीं करता । ज्ञानी पुरुष तो लखपति और करोड़पति की हालत पर दया करता है, मन में उनके दया उत्पन्न होती है कि देखो कुछ भी तो तत्त्व नहीं है इन जड़ वैभवों में, कुछ भी तो सार नहीं है, अट्ट-सट्ट यों ही मिल गया । ये बाह्य पदार्थ हैं, निमित्त पुण्य का उदय है, मिल गये हैं लेकिन वह उस समागम में अपनी बुद्धि फँसाकर बड़ा दुःखी है । ज्ञानी जीव बाह्य वैभव में रुचि रखने वाले ज्ञानी पुरुष पर दया करता है । जिसको ज्ञान जग जाता है और शुद्ध स्वाधीन आनंद का अनुभव हो जाता है, उसे फिर बाह्य विषयों में रुचि नहीं होती । उसकी दृष्टि अर्ंतमुख हो जाती है ।

अच्युत आनंदानुभव की विधि में तथ्य परिचय की प्राथमिकता –भैया, आनंद पा लेना आपके अपने हाथ की बात है, पर उस पद्धति से चलें तो आनंद मिले ।यहाँ के मोही, मलिन, अज्ञानी पुरुषों में अपना कुछ सम्मान, यश-कीर्ति चाहने की बात बना लेना, यह तो सरासर विपदा है । स्वप्न के समय में क्या कोई जानता है कि मुझे यह स्वप्न आ रहा है ? वह ता साक्षात् घटना समझता है । ऐसे ही मोह की नींद का यह सब एक स्वप्न है । इस स्वप्न में यह नहीं मालूम पड़ सकता कि यह सरासर मिथ्या है, व्यर्थ है । उसे तो सब कुछ यहाँ तथ्य ही दिख रहा है । इन लोगों ने यदि मेरी बड़ाई कर दी तो मेरा जीवन है नहीं तो मरने की ही हालत समझिये । तो जहाँ ये कोई विषय नहीं हैं, एक आत्मा के द्वारा आत्मस्वभाव ही अनुभूत हो रहा है ऐसे शुद्ध अमृतपान के बाद इस जीव को बाह्य विषयों में रुचि नहीं होती, उसकी परिणति अंतर्मुखी हो जाती है । वह विषयों में न फँसकर आत्मा की आराधना की ओर लगता है, आत्मध्यान को बढ़ाता है और ज्ञानमात्र मैं हूँ ऐसी भावना को दृढ़,अनुभवात्मक करके इसके शुद्ध विकास को पा लेता है । इसके बाद फिर इस उत्तम पद से पतन नहीं होता है । यों यह जीव भी विज्ञान के बल से अच्युत अवस्था को प्राप्त होता है ।


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