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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 83

From जैनकोष



अपुण्यमव्रतै: पुण्यं व्रतैर्मोक्षस्तदव्यय: ।अव्रतानीव मोक्षार्थी व्रतान्यपि ततस्त्यजेत् ॥83॥

पुण्यपाप में अकुलत्व की स्थिति व पुण्यपाप के अभाव में मुक्ति – हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन 5 प्रकार के पापों के परिणाम से पाप का बंध होता है, और अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रहत्याग इन 5 प्रकार के व्रत के भावों से पुण्य का बंध होता है, किंतु मोक्ष नाम है पुण्य और पाप दोनों के विनष्ट होने का । इस कारण मोक्ष का अभिलाषी भव्य आत्मा पाप की तरह, अव्रत की तरह व्रतों को भी छोड़ देते हैं । एक पद में कहा है – " पाप-पुण्य मिल दोय पायन बेड़ी डारी, तन काराग्रह माँहि मोह दियो दुःख भारी" । पाप और पुण्य ये दो बेड़ियाँ हैं । जैसे इस जीव को पाप का उदय परतंत्र कर देता है इसी प्रकार पुण्य का उदय भी जीव को परतंत्र कर सकता है । पाप के उदय में प्रतिकूल घटनाएं आती हैं जिनसे वह दुःखी रहता है । किंतु पुण्य के उदय में मन के अनुकूल घटनाएँ आती हैं जिनसे यह जीव राग किया करता है । वहाँ यह रागी अंतरंग में बड़ी पीड़ा का अनुभव करता है ।राग का विशेष बंधन – भैया ! बंधन तो राग का विकट है । बंधन असल में राग का ही है । द्वेष में तो अलगाव रहता है सुहाता नहीं है, आकर्षण नहीं रहता है, विमुख होना चाहता है किंतु राग में आकर्षण होता है उसकी और लगना चाहता है । तो बंधन तो विकट राग का ही है । ये पाप और पुण्य दोनों बेड़ियाँ हैं और यह शरीर कारागार है । जेलखाने का सींकचा है । जैसे सींकचे में बंद पड़ा हुआ कैदी परतंत्र रहता है इसी तरह शरीर के सींकचे में बंद पड़ा हुआ यह जीव परतंत्र रहता है । कहा तो इस जीव की स्वतंत्र सत्ता सच्चिदानंदस्वरूप है और कहा यह शरीर का विकट बंधन ! यह सब पाप और पुण्य के कारण शरीर का काराग्रह लगा हुआ है । जैसे कैदी को चाहे स्वर्ण की बेड़ी डाल दी जाय, चाहे लोहे की बेड़ी डाल दी जाय, परतंत्रता के कारण तो दोनों ही प्रकार की बेड़ियाँ हैं । इसी प्रकार इस जीव के समीप पुण्य के ठाठ रहें अथवा पाप के उदय की स्थितियाँ रहें, बंधन और आकुलता दोनों में समान है । पाप के उदय वाले निर्धनता से, दरिद्रता से दुःखी रहते हैं और पुण्य के उदय में ये अज्ञानी जीव तृष्णा से और संपदा से अपने को बड़प्पन मानने की वासना से मलिन रहते हैं, संक्लिष्ट रहते हैं । ये दोनों ही इस जीव को संसार के कारण हैं ।मोक्षार्थी की वृत्ति – मोक्ष अव्रत और व्रत दोनों के अभाव से होता है, इस ही कारण मोक्ष का अभिलाषी पुरुष जैसे पाप का परित्याग करता है तो पाप का परित्याग करके व्रतों को ग्रहण करता तो है पर उसके लक्ष्य में पाप-पुण्य रहित, अव्रत व्रत रहित एक शांत निष्कषाय स्थिति रहती है । इस कारण ज्ञानी पुरुष को, मोक्षार्थी भव्य जीव को अव्रतों के त्याग की तरह व्रतों का भी परित्याग करना चाहिए ।कर्ममात्र के संपर्क की हेयता – तीर्थंकर प्रकृति का बंध सम्यग्दृष्टि पुरुष करता है, मिथ्यादृष्टि तो कर नहीं सकता । और, लोग जानते हैं कि तीर्थंकर प्रकृति के उदय में तीर्थंकर बनता है, भगवान सर्वज्ञ बनता है, सभी तीनों लोक के सभी विशिष्ट जीव इंद्र आदि आकर चरणों में नमस्कार करते हैं, बड़ा अभ्युदय होता है किंतु तीर्थंकर प्रकृति के स्थिति बंध वाली पद्धति एक रहस्य प्रकट कर रही है कि तीर्थंकर प्रकृति का अधिक स्थिति में बंध संक्लेश परिणामों में होता है और तीर्थंकर प्रकृति की थोड़ी स्थिति का बंध विशुद्ध परिणामों में होता है । सम्यग्दृष्टि के योग्य जितना अधिक से अधिक संक्लेश परिणाम हो सकता है उस परिणाम में कदाचित् तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया जा रहा हो तो उत्कृष्ट स्थिति का बंध पड़ेगा और विशुद्ध परिणाम में कम स्थिति की तीर्थंकर प्रकृति बंधेगी । सुनने में थोड़ा अटपटा सा लग रहा होगा कि तीर्थंकर जैसी पुण्य-प्रकृति की उत्कृष्ट स्थिति संक्लेश परिणाम वाला ही बाँध सकता है यह क्या बात है ? इसका मर्म यह है कि तीर्थंकर प्रकृति भी पुण्य-प्रकृति है, ठीक है, किंतु कर्ममात्र का बहुत दिनों तक जीव के साथ बना रहना भली बात है क्या ? तीर्थंकर पुण्य-प्रकृति है । किंतु उसकी उत्कृष्ट स्थिति बांधने का अर्थ यह है कि यह जीव कर्मों से लिप्त बहुत काल तक रहेगा क्योंकि स्थिति अधिक बंधी है ना, तो अधिक काल तक संसार में बना रहे ऐसा उपाय संक्लेश परिणाम में होगा या विशुद्ध परिणाम में होगा ?

पुण्य और पाप प्रकृतियों की विघ्नरूपता – भैया ! पुण्य प्रकृति भी इस जीव के हित में विघ्नस्वरूप है, पाप प्रकृति भी विघ्नस्वरूप है । जैसे कारागार में लोहे की बेड़ी और सोने की बेड़ी दोनों एक समान हैं, दोनों ही प्रकार की बेड़ियों का अभाव हो तो आजादी समझी जाती है । इसी प्रकार पुण्य पाप दोनों कर्मों का अभाव हो, अव्रत और व्रत दोनों शुभ अशुभ भावों का अभाव हो तो मुक्ति हो सकती है । वह मोक्ष मार्ग का परिणाम व्रत और तपस्या से भी उत्कृष्ट परिणाम है । शारीरिक तपस्या और समय का पालन इसे भी उत्कृष्ट भाव है सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के अभेदरूप का अनुभव । मोक्षार्थी पुरुष इस ही शुद्धतत्त्व को लक्ष्य में ले रहा है । करना उसे यद्यपि यह पड़ रहा है कि पहिले पापों को छोड़कर पुण्य की बातों का ग्रहण करे । लेकिन वह पुण्य का ग्रहण करके भी पुण्य के छोड़ने के यत्न में रहता है । यों यह जीव पाप, पुण्य दोनों से विविक्त और पुण्य के कारणभूत शुभ अशुभ भावों से विविक्त अंतस्तत्त्व की आराधना करता है और इसके फल में सुख-दुःख दोनों से रहित जो सहज आनंद है उस आनंद को भोगा करता है ।आत्मशिक्षण – भैया ! इस श्लोक में यह शिक्षा भरी हुई है कि पुण्य के फल की वांछा न करो और पुण्य-फल की इच्छा से किसी प्रकार का धर्म कार्य न करो । किंतु, एक शुद्ध सहज आनंद की पूर्ति के लिए अथवा ज्ञाता-दृष्टा इसका स्वभाव है, अंत: सत्य–सत्य बात की जानकारी के लिए जाननहार रहो । धन,संपदा, वैभव इनकी तृष्णा में शाँति नहीं है । और अब तो आज के जमाने में धनिक वर्ग कहाँ सुखी है । कितनी चिंताएँ सिरपर लदी हुई हैं, वे सब धन के संचय के हठ का परिणाम है । मनुष्य जीवन मिला है तो धन जोड़ने के लिए नहीं किंतु सत्य धर्म का दर्शन करके ऐसा फल प्राप्त कर लें कि जो अन्यत्र कहीं न मिल सके इसके लिए मनुष्य जीवन है । और आज का समय देखा जाय तो यह समय धर्म के साधन के लिए भी बहुत प्रेरणा करता है लेकिन व्यामोह ऐसा पड़ा है कि चाहे कितना ही कष्ट हो, कितने ही अत्याचार करने पड़े, ब्लेकमार्केट करना पड़े अथवा अन्य प्रकार के कितने ही अन्याय करने पड़े, पर किसी प्रकार से धन-संपदा अधिक बढ़ जाय, यह तृष्णा रहती है ।राग से सर्वदा अलाभ – अरे भैया ! धन-संपदा बढ़ाकर क्या किया जायगा ? अब तो सरकार को दिया जायगा, यह समय आने वाला है । जब एक नियम बन जाएगा शहरी संपदा का कि कोई मनुष्य इतने से अधिक संपदा नहीं रख सकता है तो उससे अधिक का और क्या किया जायगा ? श्रम किया, विकल्प किया, सारी बातें की, उसका कष्ट ही आपके पास होगा । अथवा रहा भी आये धन पास में तो भी उससे क्या हित है ? चोर सतायेंगे, कुटुंबीजन, रिश्तेदार, पड़ोस के लोग सभी भागी बनेंगे । चैन कहाँ है । अथवा जोड़ते भी जायें तो रागभाव ही तो किया जायगा । राग एक अंधकार है । जहाँ रागभाव बढ़ रहा है वहाँ यह आत्मब्रह्म नहीं सूझता है । जहाँ यह आत्मप्रभु नहीं दिख सकता है वहाँ तो सारी विपत्ति है । यह जगत् एक अंधेर नगरी है । तनिक-सी देर में कुछ से कुछ क्या हो जाय यह कोई निश्चय नहीं कर सकता है । जैसे जमाने में कहीं निरपराध आदमी बड़ी तकलीफ पाये सरकार के चंगुल में फँसकर और कहीं अपराधी पुरुष मौज उड़ाये, कुछ भी नहीं कहा जा सकता है । अब तो यह दुनिया स्पष्ट दिखती है कि अंधेर नगरी है ।अंधेर नगरी का मौज – एक कथानक है कि एक गुरु और शिष्य एक अंधेर नगरी में पहुंचे । शिष्य को भेजा कुछ पैसा देकर कि जावो कुछ अच्छी सामाग्री ले आवो, शिष्य गया । पहिले तो कोयले की जरूरत थी, पूछा कोयला क्या भाव दिया ? कोयला वाला बोला―टके सेर । आटे वाले के यहाँ पहुँचा, पूछा क्या भाव है आटा ? वह भी बोला टके सेर । हलवाई के यहाँ पहुँचा पूछा, ये रसगुल्ले क्या भाव ? वह भी बोला टके सेर । खूब ले आया रसगुल्ले और भर पेट खाया । फिर शिष्य गुरु से कहता है कि महाराज यहाँ 6 महीने तक ठहर जावो तो खूब तगड़े हो जायेंगे, यहाँ हर एक चीज टके सेर है । गुरु ने कहा यहाँ मत ठहरो, यह स्थान ठहरने लायक नहीं है । शिष्य बोला―महाराज एक बार तो कहना मान ही लो, ठहर गये, चार-पाँच माह में शिष्य तो खूब मोटा हो गया ।

अंधेरनगरी का फैसला – अब इसके बाद एक घटना क्या घटती है कि एक बाबू साहब सड़क के एक दूसरे किनारे से जा रहे थे तो 18 फुट दूर सड़क के दूसरे किनारे के एक बनिये के मकान से दो ईंटें खिसक गयी । तो बाबू साहब ने उस घर के मालिक पर न्यायालय में राज्य के पास मुकदमा दायर कर दिया कि उसने ऐसी भींत क्यों बनवाई कि ईंट गिर गयी । मैं यदि इस घर के किनारे से होकर जाता तो ईंट मेरे लगती कि न लगती ? राजा ने सोचा यह ठीक कह रहा है । राजा ने बनिये को बुलाया, पूछा अबे बनिये ! तूने ऐसी कमजोर दीवाल क्यों बनवायी कि उससे ईंट इन बाबूजी के लग जाती तो ? वह बनिया बोला―महाराज ! इसमें मेरा क्या दोष है । इसमें तो मिट्टी गीली करने वाले का कसूर है । उसने पानी ज्यादा डाल दिया । मिट्टी गीली हो गयी, इसी से ईंट खिसक गयी । गिलाव करने वाले को बुलाकर पूछा-तूने मिट्टी में पानी क्यों ज्यादा डाल दिया कि मिट्टी गीली हो गई और दीवाल से ईंट खिसक गई । वह बोला―महाराज ! मेरा क्या कसूर । इसमें तो मसक बनाने वाले का कसूर है, उसने ऐसी बड़ी मसक क्यों बनायी कि पानी ज्यादा गिर गया । मसक बनाने वाले को बुला कर पूछा तो उसने कहा महाराज ! मेरा क्या कसूर, इसमें तो पशु बेचने वाले का सारा कसूर है, वह इतना बड़ा पशु बेचने क्यों आया ? उसे बुलाया क्यों बे तू बड़ा पशु बेचने क्यों लाया यहाँ उसके पास कोई उत्तर नही था । तो राजा ने फैसला दिया कि इस पशु बेचने वाले को फाँसी दी जाय । इस सबकी जड़ यही है ।अंधेरनगरी की विडंबना – फाँसी के तख्ते पर उसे खड़ा कर दिया । तो वह दुबला-पतला आदमी था व फाँसी का फंदा बड़ा था । उसके गले में वह फंदा फिट न बैठे । तो फाँसी देने वाले चांडाल लोग राजा से बोलते हैं कि महाराज ! इसका तो गला इतना पतला है कि फाँसी के फंदे में नहीं आता है । तो राजा कहता है अबे तो किसी मोटे गले वाले को पकड़ लावो । फाँसी का मुहूर्त निकला जा रहा है । चांडाल लोग दौड़े मोटे गले वाले की खोज में । सो मोटे गले वाले वही शिष्य महाराज मिले जिसने 5 महीने तक खूब टका सेर की पकवान मिठाई की चीजें खायी थीं उसको पकड़कर ले जाने लगे तो वह शिष्य पूछता है कि बात क्या है जो पकड़े लिए जाते हो । वे चांडाल लोग बोले – अबे ! बात क्या है, फाँसी देना है, मुहूर्त निकला जा रहा है । तो शिष्य ने कहा―अच्छा, पहिले गुरुजी के पैर तो छू आवें । हाँ, छू आवो । गुरुजी से कहा महाराज ! अब तो हम मरे सारी बात बतायी । गुरु ने बताया कि बचने का एक उपाय है कि फाँसी पर चढ़ने के लिए हम तुम दोनों लड़ें कि पहिले हम चढ़ेंगे । ठीक है । जब यह शिष्य फाँसी पर चढ़ाया जाने लगा यो गुरु उससे झगड़ने लगा पहिले हम चढ़ेंगें फाँसी पर । जब झगड़ासा होता देखा तो राजा ने कहा―साधु महाराज ! तुम क्यों लड़ते हो ? तो वह साधु कहता है―हे राजन् ! तुम चुप बैठो । तुम्हें कुछ पता भी है, यह ऐसा मुहूर्त है कि जो इस समय फाँसी के तख्ते पर चढ़ेगा वह सीधा बैकुंठ जायगा । तो राजा बोला कि अच्छा तुम दोनों न चढ़ो, पहिले हमें चढ़ावो । फिर क्या हुआ हम नहीं जानते ।अंधेर दुनिया से बचने का यत्न -―जैसे अंधेर नगरी का कोई हिसाब-किताब ही नहीं । अपराधी-निरपराधी सब एक समान हैं ऐसे ही इस दुनिया में सब एक समान दुःखी हैं । पुण्य वाला हो तो, पाप वाला हो तो । शांति का उपाय तो सम्यग्ज्ञान है । सही-सही शुद्ध जैसा वस्तु का अपना स्वरूप है उस स्वरूप की पहिचान हो तो शांति हो सकती है अन्यथा शांति है ही नहीं । सोचते रहो हमारे इतने घर है, इतने लड़के हैं, इतनी बहुएँ हैं, इतनी बेटियाँ हैं, सोचते रहो और भीतर में आग जल रही है उसमें जल रहे हैं । संतोष और शांति शुद्ध ज्ञान के बिना कभी हो ही नहीं सकती । मोक्षार्थी पुरुष जैसे अव्रत-परिणामों का त्याग करता है इसी प्रकार व्रत-परिणामों का भी त्याग करता है हाँ इतनी कला अवश्य है कि पहिले पाप को छोड़ेगा, पीछे पुण्य को भी छोड़ेगा । नहीं तो यह बड़ी सरल बात लगती है कि पुण्य को पहिले छोड़ दे, पाप न छूटे न सही, पर यह विधि नहीं है । प्रथम तो पापों का परित्याग हो, पश्चात् पुण्य का परित्याग हो ।ज्ञानी और अज्ञानी के समय का उपयोग – सुख-दुःख दोनों से रहित, पुण्य-पाप दोनों से रहित केवल ज्ञानस्वरूप के अनुभवरूप शुद्ध आनंद का अनुभव ज्ञानी पुरुष ही कर सकता है, अज्ञानी तो मोह के नींद की स्वप्नों में बसा हुआ अमूल्य जीवन गुजार रहा है । जैसे सिर का खुजैला और अंधा किसी नगर में प्रवेश करना चाहे, जिस नगर में मान लो एक ही दरवाजा हो और पूरा कोट घिरा हुआ हो । वह कोट छूकर चल रहा है यह सोचकर कि जहाँ दरवाजा मिलेगा वहाँ से नगर में प्रवेश कर जायगा किंतु जब दरवाजा आता है तो कोट को छोड़कर सिर खुजलाने लगता है, पैर का चलना जारी रखता है, दरवाजा निकल गया । अब कोट पर हाथ धरकर फिर चला ऐसे ही संसार में भ्रमण करते-करते आज यह मनुष्यभव का द्वार मिला है जिससे हम आत्मनगरी में पहुँच सकते हैं, पर यह विषयों का खुजैला इस मनुष्यभव में विषयों की खाज खुजाने लगता है । यों इस जीवन को भी व्यर्थ गवाँ देता है । ज्ञानी पुरुष पापों का तो प्रथम ही परित्याग करता है किंतु व्रत-परिणाम का भी त्याग करके शुद्ध ज्ञानस्वरूप का अनुभव करता है ।


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