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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 85

From जैनकोष



यदंतर्जल्पसंपृक्तमुत्प्रेक्षाजालआत्मन: ।मूलं दु:खस्य तन्नाशे शिष्टमिष्टं परं पदम् ॥85॥

परमपद की प्राप्ति के उपाय के प्रसंग में – पूर्व श्लोक में यह कहा था कि मोक्षार्थी पुरुष को सबसे पहिले अव्रतों का त्याग करना चाहिये और व्रतों को ग्रहण करके उसमें निपुण होना चाहिए । पश्चात् परम पद को प्राप्त करके व्रतों को भी छोड़ देना चाहिए । परम पद की प्राप्ति होने पर व्रत भी छूट जाया करते हैं । जैसे कोई कहे कि ऊपर जाने के लिए निचले स्थान को छोड़ना चाहिए और सीढ़ियों को ग्रहण करना चाहिए और ऊपरी मंजिल पर पहुँचकर सीढ़ियों को भी छोड़ देना चाहिए । तो सीढ़ियों को क्या छोड़ना चाहिए ? ऊपर पहुँचने पर सीढ़ियाँ तो अपने आप छूट ही गयीं । ऐसे ही जब वीतराग निर्विकल्प आत्मस्थिति होती है तो वहाँ व्रतों का परित्याग हो ही जाता है । जिस परमपद की प्राप्ति होने पर व्रतों का भी त्याग होता है, वह परमपद किस प्रकार प्राप्त होता है इस ही विषय में अब इस श्लोक में मूल तथ्य कहा जा रहा है जिस उपाय के बिना शांति संभव ही नहीं है ।

क्लेशों का मूल कल्पना-जाल – अंतरंग में वचनालाप के लिए हुए जो अनेक प्रकार की कल्पनाओं का समूह है वही तो आत्मा के दु;खों का मूल है । उसका नाश होने पर अर्थात् कल्पनाजाल के दूर होने पर यह इष्ट परम पद स्वयमेव प्राप्त होता है । जीव को क्लेश केवल कल्पना का है । बाह्य पदार्थ कहीं कैसे ही परिणमें, कोई कुछ कहा करे, अपने में कल्पना दुःख के योग्य न हो तो दुःख नहीं हो सकता है । कोई पुरुष गाली दे रहा है और कुछ ऐसे शब्दों से दे रहा है कि अर्थ यह लगाया जा सकता है कि मुझे कह रहा है तो लो, इतनी कल्पना होते ही दुःख हो गया । एक शास्त्रसभा की बात है – कोई पंडित जी शास्त्र पढ़ रहे थे, शास्त्र समाप्त हो गया तो शास्त्र समाप्ति के बाद कोई भजन भी बोला जाता है तो एक श्रोता ने भजन बोला जिसकी टेक थी – देखे हैं बहुतेरे पंडित...... आदि । कुछ ऐसा ही था कि ऊपर से वैराग्य की बातें बोलते हैं और भीतर में कषायों की छुरी चलती है । वह भजन ही था । उस श्रोता ने पंडितजी को लक्ष्य करके भजन नहीं बोला था, अब पंडितजी दुःखी हो रहे हैं । शास्त्रसभा ज्यों ही समाप्त हुई, शास्त्र विराजमान कर दिया गया, लोग जाने लगे तो पंडितजी ने उसे पकड़ कर तीन-चार तमाचे लगाये कि मैं ही मिला था तुम्हें यह भजन बोलने के लिए ।कल्पना की बाहर उद्भूति – भैया ! दशलाक्षणी के दिनों में हरी नहीं खाया करते हैं, बच्चे भी नहीं खाते हैं, ऐसा रिवाज बुंदेलखंड में अब भी है । कोई बालक छोटे भी हों तो दशलाक्षणी के दिनों में हरी नहीं खाते हैं । किसी की इच्छा हो तो चोरी से खा लेते हैं । अब बच्चे ही तो ठहरे । जहाँ दश-पाँच बच्चे बैठे हैं तो उनमें एक दो ऐसे भी निकलते हैं जो छुपकरके हरी खा लेते हैं । बैठे हों और अचानक ही कह दे कोई ऐसा कुछ व्यापक इशारा करके कि उन सभी बच्चों में हर बच्चा यही समझे मेरी ओर इशारा करके कह रहा है, कह दे कोई कि देखो मुंह में क्या बीजसा लगा है, तो जिस बच्चे ने कुछ ककड़ी आदि कोई भी हरी खायी होगी वह झट देखने लगेगा कि कहाँ लगा है । लो पता पड़ गया । अरे ! कहने वाले ने कहा उससे क्लेश नहीं हुआ किंतु भीतर में जो अपनी कल्पना बनायी उससे क्लेश हुआ । अभी किसी बच्चे ने कुछ चुराया हो और सब बच्चे बैठे हों और कोई कहे कि देखो बच्चों ! सही-सही बतलाओ किसने चोरी की, बता दोगे तो माफ कर दिया जायगा । अच्छा, नहीं बतलाते तो देखो अभी हम मंत्र पढ़ते हैं और मंत्र पढ़ने के बाद ज्यों ही मंत्र पूरा पढ़ा जायगा और हमारा हाथ ऊँचे को उठेगा त्यों ही चोरी करने वाले की चोटी खड़ी हो जायगी । जहाँ वह झूठ-मूठ का मंत्र पढ़कर अपना हाथ उठायगा कि तहाँ ही चोरी करने वाला बालक अपनी चोटी को देखने की कोशिश करेगा, कहीं खड़ी तो नहीं हो गयी है चोटी । तो भीतर में कल्पना पैदा होती है इससे ये सारी विडंबनाएँ बनती हैं ।व्यर्थ का दुःख – भैया ! वस्तुत: सोचो, दुःख किसको है बतावो ? और दुःख सबको है । दुःख नाम की बात नहीं है, पर हैं सभी दुःखी । ऐसा नहीं हुआ, यों हो गया । घर में धन बहुत था, थोड़ा निकल गया तो क्या हो गया तुम्हारा ? अथवा संयोग―वियोग तो दुनिया में लगे ही रहते हैं । कोई इष्ट का वियोग हो गया तो यह तो संसार की पद्धति है, तुम्हारा क्या हो गया ? तुम तो देह से भी न्यारे केवल अपने स्वरूपमात्र हो । तुम्हारे स्वरूप में से कौन-सी बात की कमी हो गयी ? क्यों कल्पना बना रहे हो व्यर्थ की कल्पनाएँ तो देखो, इस मोही, मलिन, पापी जीवलोक में मनुष्य-समूहों में कैसी यह अपनी इच्छा रखता है कि मैं इनमें कुछ बड़ा कहलाऊँ । अरे ! जिनमें बड़ा कहलाना चाहते हो ये कोई न रहेंगे कुछ वर्षों बाद, अथवा किसी ने बड़प्पन का वचन कह भी दिया कुछ तो उन्होंने अपने स्वार्थवश ही कहा है । किसी का कोई जीव कुछ लगता नहीं है । सबको अपने-अपने प्रयोजन की पड़ी है, कषाय-वेदना की शांति की पड़ी है, ऐसी सब जीव चेष्टाएँ करते हैं । यह जीव व्यर्थ ही अपनी कल्पनाएँ बढ़ाकर क्लेश भोग रहा है । परमपद कैसे मिले ? व्यर्थ की बात, गंदी बात, नीची बात, स्वरूपविरूद्ध बात तो यह जीव कर रहा है और परमपद के स्वप्न देखना चाहे तो यह कैसे हो सकता है ।

दृष्टिकला की जिम्मेदारी – भैया ! दो तरह के सुख हैं – एक शुद्धचित्त चमत्कारमात्र आत्मतत्त्व के अवलंबन से उत्पन्न स्वकीय आत्मीय सुख और एक मोहियों में होनेवाला कल्पित विषयों का सुख । अब देखिए दृष्टि द्वारा दोनों ही सुख मिल सकते हैं, चाहे आत्मीय सुख पा लो और चाहे वैषयिक सुख पा लो, दोनों में ही प्रताप अपनी दृष्टि का है । करना और कुछ नहीं है, केवल भीतर का भाव ही बनाना है । शुद्ध स्वरूप की दृष्टि का भाव बने तो आत्मीय आनंद मिलेगा और बर्हिमुख दृष्टि करके विषयों से बड़ा बड़प्पन है, सुख है ऐसे भाव बनाएँ तो वहाँ कल्पित मौज है । उस वैषयिक सुख के समय भी विह्वलता है, उससे पहिले भी विह्वलता है भोगने के बाद भी विह्वलता रहती है । परंतु, आत्मीय आनंद पाने से पहिले भी समता और शांति रहती, आत्मीय आनंद भोगने के समय भी समता और शांति रहती, और आत्मीय आनंद अनुभव करने के बाद भी शांति और संतोष रहता । ये दोनों ही बातें केवल दृष्टि से मिल जाया करती हैं, अब किस ओर दृष्टि करना चाहिए यह हम और आपका निर्णय जैसा हो वैसा है, पर सुविधा सब है ।

दृष्टिकला की जिम्मेदारी का एक दृष्टांत – जैसे किसी पुरुष के आगे एक ओर तो खल का टुकड़ा रख दिया जाय और एक ओर रत्न रख दिया जाय फिर उस से कहें कि देखो भाई ! तू जो मांगेगा, जो चाहेगा वही मिल जायगा । अब वह अगर खली का टुकड़ा चाहे तो उसे कोई विवेकी कहेगा ॽ इसी प्रकार जब केवल दृष्टि-भर देने से आत्मीय आनंद मिल सकता है और वैषयिक सुख भी मिल सकता है जो कि दुःखस्वरूप है, तो अब यह दृष्टि करे उन वैषयिक सुखों कि तो इसे विवेक तो नहीं कहा जा सकता है । दृष्टि करे तो उस आनंदनिधि निर्विकल्प आत्मस्वरूप की जिसके प्रताप से शाश्वत आनंद प्राप्त होता है ।जीव की विमूढ़ दशा – यहाँ तो जीव की ऐसी दशा है कि दुःखी होता जाता है जिसके कारण, उसी से राग करता जाता । यह हालत है मोह में कि जिसके कारण दर दरपर क्लेश भोगना पड़ता है उसी को ही यह मोही अपनाता जाता है, राग करता जाता है जैसे घर के बूढ़े बाबा को छोटे-छोटे नाती-पोते पीटते जाते हैं, सिर पर भी चढ़ते जाते हैं, वह दुःखी भी हो जाता है फिर भी उन पोतों से राग ही करता जाता है । जैसे जिस मिर्च के खाने से सी-सी करते जाते हैं, आँसू भी गिरते जाते हैं, कौर भी मुश्किल से गुटका जाता है, फिर भी लाल मिर्च और चाहिए और चाहिए मांगते जाते हैं । ऐसे ही मोही मोह कर करके दुःखी होते हैं । इस मोह में कुछ दूसरा उपाय सूझता ही नहीं है सो उसी मोह की चीज को ही अपनाते रहते हैं । जहाँ ऐसी विरुद्ध कल्पना जगती है वहाँ परम पद कैसे प्राप्त हो सकता है ।तृष्णा की चोट – यह जीव शुद्ध चिदानंदस्वरूप आत्मतत्त्व को भूला हुआ है । यह आत्मतत्त्व इंद्रियके गोचर नहीं होते । यह मोही प्राणी इंद्रिय से परे अतींद्रिय निर्विकल्प सहज तत्त्व भी कुछ है, इसकी श्रद्धा इसको नहीं है । सो यह व्यामोही जीव आत्मस्वरूप को भूलकर बाह्य विषयों में उलझ रहा है । कैसी उल्झन लगी है, लाखों का धन है और एक हजार रुपया ही कम हो गया, गिर गए या दे दिया या कोई छुड़ा ले गया, कितना कष्ट अनुभव करता है । जब बहुत छोटी स्थिति थी, हजार दो हजार की ही संपत्ति पास में थी तब इतने कष्ट का अनुभव न करता था । आज तो उससे 100 गुणी संपत्ति है किंतु करे क्या ? वर्तमान संपदापर संतोष कैसे आये, क्योंकि जो नहीं मिला हुआ है और जिसकी आशा लगाए हुए हैं उसकी अप्राप्ति का तो दुःख मचा हुआ है । ऐसी तृष्णा के वश होकर यह जीव बची हुई संपदा का भी सुख नहीं लूट सकता है । इन सब दुखों का मूल कारण ये अंतरंग के संकल्प-विकल्प-जाल हैं । तृष्णा बूढ़ी नहीं होती है, खुद बूढ़े हो जाते हैं । तृष्णा नहीं मरती, खुद मर जाते हैं । कैसा है यह तृष्णा का रोग जो इस चिदानंदस्वरूप, अमूर्त, निर्लेप, ज्ञानप्रकाश, सर्वश्रेष्ठ आत्मा पर लदा हुआ है ।अज्ञानी का हल्ला – पयार्यमुग्ध जीव इन चमड़े की आँखो से बाहर जो कुछ देखता है उसे सत्य समझता है । अरे ! जितना जो कुछ आँखों से दिखता है वह सब झूठ है, तू सच बताता है । क्या दिखता है ? यह आकार । ये मिट जाने वाली चीजें हैं, ये परमार्थ नहीं हैं । क्या दिखता है आँखों से ? रूपरंग । ये सब मिट जाने वाली पयार्य हैं, स्वतंत्र चीज नहीं हैं । और आंखों दिखे की बात क्या, इन पंचेंद्रिय से और संकल्प करनेवाले मन से जितना जो कुछ जाना जाता है वह सबका सब माया है । भगवान भी इस तरह नहीं जानता जिस तरह हम आप जाना करते हैं । भगवान यह नहीं जानता कि यह अमुकप्रसाद का मकान है क्योंकि यदि भगवान ऐसा जान जाय तो फिर अमुकचंद का मकान, वह बिल्कुल पक्का हो गया, अब मिटे कैसे ? भगवान ने जान लिया यहाँ सरकार में की हुई रजिस्ट्री हो जायगी, पर भगवान का ज्ञान तो फेल नहीं होता पक्की रजिस्ट्री हो गयी यदि भगवान जान जाय कि यह अमुक का मकान है । भगवान नहीं जानता है यों, पर यह मोही जीव जानता है कि यह मेरा मकान है, यह इनका मकान है, यह भगवान से भी बढ़कर ज्ञानी बनना चाहता है । जो भी बड़ा बनने का यत्न करता है वह धोखा खाता है । भगवान सब पदार्थों को जानता है । जैसा है तैसा जानता है, तो वह असत् को कैसे जान जाय ? असल में हम आपको परस्वामित्वविषयक यह ज्ञान नहीं है, सब अज्ञान है । भगवान के अज्ञान नहीं है । अज्ञान तो मोहियों में है ।कल्पना में बैचेनी – अज्ञानी प्राणी कितनी कल्पनाएँ बनाता है, जिनका पार नहीं । कोई खुशी का समाचार मिल जाय तो उसकी कल्पना में रातभर यह नींद नहीं लेता । कितनी कल्पनावों की दौड़ लग गयी; कितना यह अच्छा हुआ । कोई बड़ी वेदना का समाचार मिल जाय तो यह कल्पनाएँ करके रात-दिन नींद न लेगा; कष्ट का अनुभव करेगा । है कुछ नहीं; पर इसने अपनी कल्पना में सारे विश्व को अपनाया है या अपनाना चाहता है । भैया ! कल्पना-जाल मिटे बिना वीतराग परमपद की प्राप्ति हो नहीं सकती । यह मोही प्राणी मन ही मन में कुछ गुनगुनाता रहता है, जैसे कहते हैं ना कि हवा से बातें करता है । जब तक यह कल्पनावों में ग्रस्त है तब तक इसे सत्य, शांति का पद प्राप्त नहीं हो सकता ।कल्पनाजाल मिटने का उपाय – यह कल्पनाजाल कैसे छूटेगा, इसका उपाय यह है कि सर्व कल्पनाओं से रहित ज्ञानमात्र मुझ आत्मा का स्वरूप है, इसे श्रद्धा में लाये तो कल्पना दूर हो सकती है । सब उपदेशों का निचोड़ इतना है । जब तक कल्पना-तरंग उठती रहेगी तब तक शांति नहीं मिलेगी । और कल्पना-तरंगों का उठना तब ही बंद होगा जब अपना ऐसा स्वरूप विदित हो कि कल्पनाजालों से रहित केवल शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ । जब यह ऐसा ही उपयोग बनाता है अर्थात् उपयोग में केवल जानन, ज्ञानप्रकाश ही रहे, रागद्वेष की तरंग न रहे तब इस जीव को वह परम पद मिलता है जिस परम पद से सर्व प्रकार के कष्ट नष्ट हो जाते हैं । उसके लिए केवल एक ही ध्यान रखना है कि मैं अपने आपको ऐसा अनुभवूँ कि मैं देह से भी न्यारा, रागादिक से भी न्यारा केवल चैतन्यप्रकाशमात्र हूँ । ऐसी शुद्ध दृष्टि बनाना है, फिर इस दृष्टि से परमार्थ आत्मीय आनंद अवश्य प्रकट होगा ।


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