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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 89

From जैनकोष



जातिलिंगविकल्येन येषाँ च समयाग्रह: ।तेऽपि न प्राप्नुवंत्येव परमं पदमात्मन: ॥89॥

देहाग्रह के लिये आगमाग्रह रखनेवालों के भी मुक्ति का अभाव – जिन जीवों के जाति और भेष के विकल्प के माध्यम से आगम का आग्रह हो गया है वे पुरुष भी आत्मा के परम पद को प्राप्त नहीं कर सकते हैं । आगम में लिखा है कि नग्न भेष से ही मुक्ति होती है, इसीलिए हमने नग्न भेष धारण किया है । इस नग्न भेष से मुक्ति होगी ऐसा जिसका आगम में शपथ खाकर आग्रह है तो, और आगम की शपथ न लेकर भी आग्रह है । यद्यपि शास्त्रों में लिखा है वह ठीक है, नग्न भेष धारण किये बिना वैसी निर्मलता नहीं जगती है । उससे मुक्ति होती है किंतु इस आग्रह में तो उस तत्त्व के लिये थोड़ा भी नहीं विचारा है ऐसा, किंतु अपनी हठ को मजबूत बनाने के लिये शास्त्र की आड़ ली है और वह अपने विकल्पों का आग्रह दृढ़ कर रहा है । इस कारण वहाँ भी मोह है, अथवा किसी भी जाति का, किसी भी भेष का संस्कार रखकर और ऐसा भाव रखकर कि हम इस धर्म के मानने वाले हैं, हमको तो मुक्ति होगी । यह सब आग्रह अज्ञान की प्रेरणा का है ।जैन मजहब के आग्रह से भी असिद्धि – हम जैन हैं, जैन धर्म से ही मुक्ति है ऐसा जिनके आग्रह है उनके भी अभी बाह्य में ही बुद्धि अटकी है । जैन धर्म कहाँ है ? शास्त्रों में है, कि पोथियों में है, कि मंदिर में है, कि जिस जैन धर्म से मुक्ति कही गयी है । किस जगह अपनी निगाह रखकर कह रहा है यह कि जैन धर्म से ही मुक्ति होती है ? यह बाहर में निगाह रखकर कह रहा है तो अज्ञान है । आत्मा का जो स्वभाव को पहिचानकर ये रागादिक विषय कषाय आदि शत्रु जीते जाते हैं, जो इनपर विजय प्राप्त कर लेता है उसको विजयी कहते हैं, उसको जिन कह लीजिए । ऐसे विजयी पुरुष ने जो मार्ग बताया है उसे जैन मार्ग कहते हैं । इसको सुनकर भी जिनने बाहरी क्रियावों में, विकल्पों में जिन मार्ग खोजने की बुद्धि लगायी है वे अभी बाहर में भटक रहे हैं । वह जैन धर्म, वह जैन मार्ग अन्यत्र नहीं है । मेरा जैन मार्ग मेरे स्वरूप में है और जिस स्वरूप से है वह स्वरूप मोक्ष का मार्ग है ।धर्म के नाते के आग्रह में भी मुक्ति का अभाव – धर्म का नामकरण करने से महत्त्व घट जाता है मुक्ति का कारण धर्म है उस धर्म का कुछ नाम तो बना दीजिए, बस पक्ष हो जायगा । जैन धर्म कोई मजहब है क्या ? जैसे अन्य जातियाँ, अन्य मजहब अन्य धर्म हैं इस तरह कोई जैन धर्म है क्या ? हाँ अब हो गया एक जैन धर्म । जैसे और धर्म हैं वैसे ही अब जैन धर्म हो गया है । कब हो गया ? जब हम उसके नाम के पक्ष में पड़ गये । नहीं तो जो आत्मा का स्वभाव है, आत्मा का तत्त्व है, सहज भाव है उसका आलंबन है वह धर्म है, पर करें क्या, व्यवहार में कुछ नाम धरना ही पड़ता है । रख लीजिए नाम, पर उस नाम में जो आग्रह रखता है वह अज्ञानी है उसको मुक्ति नहीं है और जिसका नाम रखा गया है, जो उसको तकता है वह ज्ञानी है । जैसे बैंकों में रुपया लोग जमा करते हैं तो खजांची व्यक्ति को कुछ नहीं देखता है वह तो नाम के अक्षरों को देखता है, अक्षर मिल गए तो ठीक है । कोई लोग ऐसे भी होते हैं जो तीन चार तरह से दस्तखत किया करते हैं । तो दस्तखत यदि न मिलेंगे तो रुपये भी न मिलेंगे । वह व्यक्ति को नहीं देखता है, वह तो अक्षरों को देखेगा । उसे तो नाम का आग्रह है, व्यक्ति का आग्रह नहीं है । भले ही ऐसा मेल है कि वैसा ही नाम, वैसे ही दस्तखत वहीं का वहीं कर पाता है, पर उसे व्यक्ति से प्रयोजन नहीं है; नाम से प्रयोजन है । यों ही व्यवहारी जीव ने नाम से प्रयोजन रखा है, जिसके लिए नाम रखा गया है उस पर इस व्यामोही की दृष्टि नहीं है ।

देहाश्रित धर्म के आग्रह में मुक्ति का अभाव – धर्म तो वह है कि कोई भी आत्मा उसकी निगाह कर ले तो नियम से संतोष, तृप्ति पायगा । अपना यह दुर्लभ मानवजीवन सफल करेगा; पर ऐसे धर्म की दृष्टि बिरले भाग को प्राप्त होती है । जैसे कोई अपने आपमें यह श्रद्धा रखे कि मैं वैष्णव हूँ, हिंदू हूँ, ईसाई हूँ, मुसलमान हूँ, किसी प्रकार की आत्मीयता रखे, मायारूप में आग्रह करे तो उसे तत्त्व-मर्म नहीं दिख सकता । यों ही मैं जैन हूँ यों प्रतीति में रहे तो उसे तत्त्व-मर्म के दर्शन नहीं हो सकते क्योंकि इसने उस नाम के माध्यम से अपने स्वभाव को तिरोहित कर दिया है और उस नाम का कुछ आकार-प्रकार सा जानकर बाह्य की और दृष्टि लगा ली है । मैं कुछ नहीं हूँ; जितने भी व्यवहार के रूपक हैं उन सबका निषेध कर दो । अरे ! जब मैं मनुष्य ही नहीं हूँ तो मनुष्य-देह के नाते से जाति, भेष, मजहब, गोष्ठी, वातावरण ये सब भी क्या मेरे हैं ? मैं तो एक जाननहार पदार्थ हूँ, ऐसा भावात्मक जिसको दर्शन है उसे है सत्य का आग्रह । जो लोग जाति का नाम रखकर और प्रमाण देकर कि देखो ना शास्त्र में लिखा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ऐसी उच्च जातियों को मोक्ष होता है, लिखा है ना ठीक है, मैं उच्च जाति का हूँ, मुझे मोक्ष होगा, ऐसा नाम रखकर गर्व करते हैं उन्हें मुक्ति कैसे होगी । अरे ! इस दृष्टि ने तो तुझे संसार में भटका रखा है । इन विकल्पों को न करके विधिपूर्वक अपने मोक्षमार्ग की धुन में लगे रहें तो सफलता मिलेगी ।अज्ञानी का देहाग्रह के लिये शास्त्र का दुरुपयोग – भैया ! यह व्यामोही धर्म के नाम पर करता भी काम है और करके नहीं जानता है तो व्यर्थ का श्रम सहा । जिनका ऐसा आग्रह है कि अमुक जातिवाले, अमुक भेष धारण करें तब ही मुक्ति की प्राप्ति होती है ऐसा शास्त्रों में भी लिखा है । ऐसा शास्त्रों का भी आग्रह करे तो अभी वह नाम तो धर्म रख रहा है पर बाह्य तत्त्वों की ओर विकल्प में फँसा हुआ है, वह भी मुक्ति को प्राप्त नहीं हो सकता है, क्योंकि जाति और लिंग दोनों ही देह के है आश्रित है, यह देह है ना, तब तो जाति का नाम पड़ा । यह देह है ना तब तो कुछ भेष का नाम पड़ा । और देह के आश्रित जाति, लिंग का आग्रह किया और उसके ही समर्थन का लक्ष्य रखकर शास्त्र का नाम लिया, ऐसी स्थिति में उसने विकल्पों का ही आग्रह किया । वह इस संसार कैसे छूट सकता है ।धर्म का स्वयं प्रकाश – कोई पुरुष कुछ प्रतीति न करे यों कि मैं अमुक वर्ण का हूँ, अमुक मजहब का हूँ, अमुक धर्म का माननेवाला हूँ, अमुक पोजीशन का हूँ, इस देह मात्र का भी विकल्प न करके केवल एक ज्ञानप्रकाशमात्र अपने आपको निहारता जाय तो उसे स्वयं ही निरुपम अनुभव होगा जो वास्तविक आनंद को लिए हुये है । उस अनुभव के बाद उसे स्वयं खबर हो जायगी कि धर्म कहाँ है । इस तरह की ही ज्ञाता-दृष्टारूप परिणति करना सो धर्म है ।व्यामोह महासंकट – भैया ! कितना बड़ा संकट इस जीव पर छाया है कि है तो यह स्वयं सहज ज्ञानानंद स्वरूप समस्त परपदार्थों से न्यारा, अपने स्वरूपस्तर मात्र, किंतु मान रखा है इसने अपना यह सब वैभव और ये सब कुटुंब और ये मित्र-मंडल कि ये ही मेरे सब कुछ हैं । ऐसी जो इसमें विकल्प-तरंग उठी है यह विकल्प एक बड़ा बोझ है और बड़ी गंदगी है । इसने ही इस जीव को भटका रखा है । यथार्थ श्रद्धान नहीं हो पाता इसी कारण किसी भी क्षण वास्तविक शांति का अनुभव नहीं हो पाता । विषयों के भी साधन मिले तो ये मोही उन साधनों में मौज मानते तो हैं, मगर अंतर में पीड़ित रहा करते हैं । आकुलताओं से भरा हुआ वह मौज है । नाम ही उसका मौज है । मौज में क्या अर्थ भरा है, मो और ओज मिलावो तो मौज बन जाता है जहाँ ओज नहीं रहता है उसे कहते हैं मौज । आत्मा का ओज, आत्मा का बल, ज्ञान, ऐश्वर्य, कांति, आत्मा के ज्ञान, चमक ये सब जहाँ नहीं रहते हैं उसका नाम है मौज ।

मौज उपनाम बरबादी – जहाँ यह जीव मौज समझता है वह इसकी बरबादी है । जितना दुःख में यह जीव साहसी बन सकता है उतना यह वैषयिक सुख में साहसी नहीं बन सकता है । जितनी वीरता, गंभीरता, उदारता, दया दुःख में हुआ करती है उतनी वैषयिक सुख में यह जीव कुछ नहीं कर सकता है । कितनी ही दृष्टियों से देखो तो यह सांसारिक सुख गया बीता है । वस्तुत: सांसारिक सुख और दुःख दोनों में ही समान आकुलताएँ हैं; और इनमें अज्ञानता पड़ी हुई हैं । क्या करे, जब कुबुद्धि आती है, मति उल्टी हो जाती है तो अपनी ही करतूत से अपनी ही बरबादी करता है और खुश होता हुआ अपनी बरबादी करता रहता है ।विविक्तता की प्रतीति में मुक्ति की दिशा – इस देह के विकल्प में, जाति-लिंग के विकल्प में और बाहरी रूप से धर्म-मजहब के आग्रह में भी मुक्ति का मार्ग नहीं है । मुक्ति का मार्ग उसे ही मिलता है जो अपने को इस दुनिया के लिये मरा हुआ सा समझ ले । मुझे दुनिया से कुछ न चाहिए । मैं मैं हूँ, मेरा क्या दुनिया से वास्ता है । अन्य पदार्थ इस मुझमें क्या कर सकते हैं । जब तक इतना विविक्त न हो जाय, अपने को अकेला न अनुभव करले इसको मोक्ष मार्ग नहीं मिल सकता है । अंत में इस जीव को अपना एकत्व दर्शन ही इसका रक्षक है, जितना चाहे भटक लीजिए, जिस किसी भी दिन शांति का रास्ता मिलेगा उस सब भटकने का त्याग करके ही मिलेगा ।मोहविष का विषय – अहो ! जब तक मोह का उदय है तब तक यह जीव अपने मोह का विषय तो बदलता रहता है किंतु मोह-विष को छोड़ नहीं सकता है । जब छोटा बालक है तो उसके मोह का विषय और कुछ ढंग का है, जब यह कुछ बड़ा तो उसके मोह का विषय फिर स्त्री आदिक बन जाते हैं, जब कुछ और बड़ा हुआ तो मोह का विषय पुत्र, संपत्ति, लोक, इज्जत आदिक बन जाते हैं, कदाचित् यह धर्म का पथ भी ग्रहण करे, व्रती बने, उदासीन श्रावक बने, साधु बने तो यदि ऐसी अज्ञान अवस्था है तो मोह तो वहाँ होगा ही । अब यह मोह का विषय कुछ और बना लेता है । मैं सबसे अच्छा काम कर रहा हूँ, मैं व्रती हूँ, इन सबसे न बने ऐसा मैं श्रेष्ठ कार्य कर रहा हूँ । ऐसी भावना रख रहा है, उसके बाह्य की ही वृत्ति है, अपने को उसने किसी अन्य पयार्यरूप मान लिया ।अज्ञान प्रभाव की समानता – भैया ! लोकोक्ति में कहते हैं ना कि ‘जैसे नागनाथ वैसे साँपनाथ ।' अथवा ‘जैसे उदई वैसे भान, न इनके चुटई न उनके कान ।' चाहे यह घर में रहता हो चाहे घर छोड़कर नग्न साधुभेष रख लिया हो जब तक अंतरंग से मोहविष दूर नहीं होता, इस पर्याय से भी विरक्त केवल ज्ञानप्रकाशमात्र अपने प्रभु का दर्शन नहीं होता तब तक दोनों ही अज्ञानी हैं । घर में रह रहा है वह और घर छोड़ कर बड़ी-बड़ी कठिन तपस्या कर कष्ट सह रहा है वह । अंतर में अज्ञान दोनों जगह है, जहाँ देह का हठ है, देह के आश्रित होने वाले कार्य का हठ है, देहाश्रित विभावों का हठ है वहाँ तो अज्ञान ही है ।

क्रोधादिक से अवनति का अनुमान – भैया ! बतावो तो जरा, भला जिसने सर्व पदार्थों से विविक्त चैतन्यमात्र निजतत्त्व का दर्शन किया है उसे क्यों क्रोध आना चाहिये ? है उदय, कषाय की परिणतियाँ होती हैं पर जरा-जरासी बातों पर क्रोध आने लगना, क्रोध बना रहना, रंच-रंच बात पर विकट गुस्सा कर लेना, यह तो कुछ मात्र चारित्रमोह की परिस्थितिवाली बात तो नहीं लगती । क्यों होता है इतना क्रोध साफ उत्तर है – अज्ञान होने से । जब कषायरहित शुद्ध ज्ञानमात्र निजतत्त्व को ही देखा हो तो इस मायामयी दुनिया में मेरा अपमान हुआ, ये लोग क्या समझें, ऐसी दुर्बुद्धि क्यों होती है ? नहीं होना चाहिए ना, पर होती है । तो जैसे गृहस्थ अज्ञानी हैं वैसे ही भेष रख कर भी यह अज्ञानी बना हुआ है । कोई पुरुष धर्म में, त्याग में ऊँचा बढ़ता है तो उसके मान कषाय बढ़ती है या उतना अधिक नम्र हो जाता है । जो धर्म मार्ग में जितना ऊँचा बढ़ता है वह उतना अधिक नम्र हो जायगा या उतना अधिक मान-कषायवाला हो जायगा ? नम्र होना चाहिये । मार्दव धर्म आना चाहिये । किंतु ज्यों-ज्यों धर्म में ऊँचे बढ़े त्यों-त्यों ऐसी बुद्धि बना लेते हैं कि मैं इतने ऊँचे स्तर का त्यागी हो गया हूँ और ये श्रावकजन हैं । इनमें मुझे इस तरह की बड़ी पोजीशन से रहना चाहिये । अगर कुछ मान कषाय बढ़ती है तो यह धर्म क्या मान बुद्धि का कारण है या मार्दव बुद्धि का कारण है ॽ होती है कुछ मान की बृद्धि तो स्पष्ट समझ लीजिए ना कि जो अज्ञान गृह, स्वजनों में है वही अज्ञान यह भेष रखकर भी बना हुआ है । यों ही बहुत सी बातें हैं ।

सबके लिए शांति का एक उपाय – जो लोग धर्म का, लिंग का, भेष का, मजहब का, इनका आग्रह करके अपने आपको तृप्त, तुष्ट, कृतकृत्य मान लेते हैं वे आग्रही पुरुष हैं । इन विकल्पों से भी मुक्ति नहीं होती है । ऐसे विकल्प करने वाले लोग आत्मा के परमपद को प्राप्त नहीं कर सकते । कोई भी हो, गृहस्थ हो या साधु हो, शांति मिलने का ढंग सबको एकसा बताया है । विकल्प छोड़कर निर्विकल्प अंतस्तत्त्व के निकट पहुँचीये, शांति मिलेगी । सर्व उपाय करके यही शुद्ध भाव प्राप्त करने योग्य है ।


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