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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 93

From जैनकोष



सुप्तोन्मत्ताद्यवस्थैव विभ्रमोऽनात्मदर्शिनां ।विभ्रमोऽक्षीणदोषस्य सर्वावस्थात्मदर्शिन: ॥93॥

अनात्मदर्शी और आत्मदर्शी भ्रमपरिज्ञान का विषय – जो आत्मदर्शी नहीं हैं, अनात्मतत्त्व में ही यह मैं आत्मा हूँ, ऐसा ही जिन्हें परिचय है उनके लिये तो सोते हुए और पागलों जैसी अवस्था ही भ्रमरूप मालूम पड़ती है, किंतु जो आत्मदर्शी पुरुष हैं, जिन्होंने आत्मानुभव कर लिया है ऐसे ज्ञानी पुरुषों को इस बहिरात्मा के मोह से घिरे हुए, दोषों से भरे हुए जीव की सारी ही अवस्थाएँ भ्रमरूप मालूम होती हैं, अज्ञानी जन तो सोते हुए को देखकर यों कहेंगे कि यह बेहोश है या किसी पागल दिमाग वाले को देखकर यह कहेंगे कि यह बेहोश है, किंतु ज्ञानी यहाँ जगते हुए को भी यह कहेगा कि यह बेहोश है ।भ्रमपरिचय – लोग अपने कल्पित स्वार्थ की पूर्ति के लिये कितने मायाचार करते हैं, कितना पागलपन, कितना अन्याय करते हैं, कितना धोखा देते हैं । विश्वासघात करते हैं, और ऐसा करते हुए वे अपने को बड़ा चतुर समझते हैं, मैंने बड़ी चतुराई की जो मैंने इतना दूसरे का लूट लिया । इसे वह चतुराई समझता है और ऐसा जानता है कि मुझ जैसा होशियार, सावधान, होशवाला दूसरा कोई नहीं है । हर ज्ञानी पुरुष उसे बेहोश देख रहा है, यों देख रहा कि इस मूढ़ पुरुष को अपने आपका कुछ होश नहीं है । इस बेहोशी में ही यह अपनी चतुराई खेल रहा है । मूर्ख पुरुष तो केवल सोते हुए में ही बेहोशी देखते हैं या कुछ दिमाग जिसे कहते हैं क्रेक हो गया पागल उसे बेहोश कहते हैं किंतु इस ज्ञानी को तो संसार की सर्व अवस्थाएँ ही बेहोशरूप दिखती हैं । व्यामोही प्राणी बड़ा श्रम कर रहा है, व्यायाम कर रहा है, बड़ी ताकत लगा रहा है, कुटुंबियों के बीच में अपनी बड़ी कीर्ति वर्त रहा है और यों करके मानता है कि मैं बड़ा चतुर हूँ । अरे ! चतुर तो वह है जो आत्मा को समझने का काम कर ले ।चतुराई में ठगाई – भैया ! इन बाहरी पदार्थों को अधिक जोड़ लिया तो इतने से इसका कौन सा पूरा पड़ता है ? जो अभ्यास करता है वह पुरुष भले ही यह समझे कि हम इतने लाभ का काम कर रहे हैं किंतु उससे जो पाप का बंध होता है, अशुभ परिणाम बनता है उसका उदय आने पर भविष्य में वह खतरे में पड़ेगा, दुगर्ति को प्राप्त होगा । दो प्रकार के पुरुष होते हैं – एक ठगने वाले और एक ठगे जाने वाले । नुकसान में कौन रहा ? जरा इसका निर्णय करो । ठगने वाला नुकसान में रहा या जो ठगा गया वह नुकसान में रहा ? लोग तो यों कहेंगे कि जो ठगा गया वह नुकसान में रहा, इतना उसका पैसा कम हो गया और जिसने ठगा है वह लाभ में रहा, किंतु बात है बिल्कुल उल्टी । ठगनेवाला नुकसान में है और जो ठगा गया है वह नुकसान में नहीं है । उस ठगने वाले ने ठगकर कौन सा लाभ पाया ? उसे तो वह लाभ मिलता ही, अच्छे परिणामों से रहता तो वह मिलता, ठगने का काम किया तो भी मिला । जो उसकी कलुषताएँ हुईं, जो आशय में मलिनता हुई, पाप-बंध हुआ, विकार बढ़ा उसके कारण वर्तमान में भी उसकी बुद्धि बिगड़ जाने से किसी प्रकार के नुकसान में वह आ गया और न आ सका मान लो निकट भविष्य में नुकसान में तो बाद में नुकसान आये बिना बचता नहीं है ।परिणाम का परिणाम – कोई पुरुष गुप्त पाप कर रहा हो, उसके किए जाने वाले पाप कार्यों को कोई जान नहीं रहा है लेकिन बाद में वह याद रखता है कि मैंने इतना समय अपने जीवन का व्यर्थ ही बिताया और इस कारण यह फल भोगना पड़ा । बेकार नहीं जाता है अच्छा परिणाम करना और बुरा परिणाम करना । चाहे फल देर में मिले पर अच्छे और बुरे दोनों परिणामों का फल अवश्य मिलता है ।

देर है अंधेर नहीं – एक पुरुष पुत्र रहित था । लोगों ने उसे कुछ भरमा दिया कि तुम किसी दूसरे लड़के की अमुक देवी पर बलि चढ़ा दो तो पुत्र हो जावेगा । उसने ऐसा ही किया और पूर्वकृत भाग्य की बात है कि उसके संतान भी हुई, धन भी बढ़ा, जमींदारी हो गयी, सब कुछ हो गया, लेकिन कुछ ही समय बाद क्रमश: वह सब कुछ मिटने लगा । जमींदारी भी मिटी, महल भी सब बिक गये, और और भी सब कुछ बिक गया, स्त्री तक भी गुजर गयी, अकेला रह गया । उसका दिमाग अब भ्रांत हो गया तो वह जगह-जगह चिल्लाता फिरे―देर है अंधेर नहीं । लोग पागल समझकर उपेक्षा कर जाय, किंतु एक जज ने यह सोचा कि यह एक ही बात कहता है पागल तो नहीं मालूम होता । कोई बात है । उसने उसे कुछ दिन अपने घर रक्खा और धीरे-धीरे से पूछा तो उसने सब वृत्तांत सुनाया । जो पाप किया उसके फल में देर तो है किंतु अंधेर नहीं है कि उसका फल प्राप्त न हो । यों ही जानो कि जो लोग दूसरों पर अन्याय करते हैं फल में उन्हें क्लेश ही मिलता है । भैय ! चतुराई पायी कोई कला पायी चला पाया, विश्वासघात किया तो इन परिणामों के फल में चाहे देर हो जाय पर अंधेर नहीं है ।अज्ञान चेष्टा का प्रत्यय – कोई पुरुष अपयश के काम करे किंतु करे गुप्त ही गुप्त, तो करता रहे गुप्त ही गुप्त पर उसके ऐसे कर्मों का उदय अवश्य आयगा कि अपयश होता ही रहेगा । कोई मनुष्य यश का काम करता है, करता है वह गुप्त होकर । भले ही वह गुप्त ही गुप्त यश का काम करे, न प्रकट होने दे अपने गुण, किंतु ऐसा समय अवश्य आयगा कि उसका यश प्रकट होगा । तो ज्ञानी पुरुष को ये शरीर अवस्थाएँ सब भ्रमरूप मालूम होती हैं । और की तो बात क्या, ज्ञानी पुरुष धर्म के सब काम कर रहा है, पूजा में खड़ा हुआ पूजा कर रहा है, अब जाप में बैठा है, सामायिक कर रहा है; सब कुछ करता है पर चित्त में यह बात बसी हुई है कि यह सब हम अज्ञान में कर रहे हैं । ये मेरी सारी क्रियाएँ अज्ञानमय क्रियाएँ हैं । उसे सम्यक्त्व जगा है तो सम्यक्त्व जगने पर ही तो यों सोच रहा है वह कि ये क्रियाएँ क्या ज्ञानतत्त्व की क्रियाएँ हैं ? ये करनी पड़ती हैं । विषय कषायों का उपद्रव है, कल्पनावों का यत्र-तत्र लगने का उपद्रव है, उनसे कुछ निकास पाने के लिए ये सब क्रियाएँ की तो जा रही हैं, पर ये अज्ञान चेष्टाएँ हो रही हैं ।ज्ञानचेष्टा – भैया ! ज्ञानभरी चेष्टाएँ तो वे हैं जो सब ज्ञानियों के होती हों और ज्ञानियों में जो सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी है सिद्धभगवान्, अरहंतदेव उनकी भी जो चेष्टाएँ होती हों वे हैं ज्ञानमय चेष्टाएँ । ये सब उन्मत्त चेष्टाएँ हैं, कषायों की जितनी भी क्रियाएँ हैं वे सब उन्माद हैं । यों ज्ञानी को सारी अवस्थाएँ भ्रमरूप ही दिख रही हैं, तभी तो धर्मकार्य करते हुए भी ज्ञानी कर तो रहा है हाथ पैर से ये धर्म विषयक क्रियाएँ, किंतु चित्त है उसका एक शुद्धज्ञानप्रकाशमात्र हूँ, मैं इन क्रियावोंवाला नहीं हूँ । उसे ये सारी स्थितियाँ भ्रमरूप दिखती हैं । आप सुन रहे हैं यह भी क्या उन्मत्त चेष्टा नहीं है ? यह पागलों की चेष्टा है । हम बोल रहे हैं यह भी उन्मत्त चेष्टा है । क्या यह सुनते रहना आत्मा का धर्म है ? आत्मा का धर्म शुद्ध ज्ञान का अनुभव करते रहना है । जहाँ कोई विकल्प नहीं, भेद नहीं वह ज्ञानप्रकाश ही आत्मा का धर्म है । क्या इस सुनने में ज्ञान का अनुभव हो रहा है ? भले ही कुछ यह मन में निर्विकल्प तत्त्व की ओर झाँक रहा हो, पर अनुभव तो नहीं है । ऐसा ही बोलने में पदवर्ण सहित बोले जाने में क्या ज्ञान का अनुभव है ? भले ही बोलते समय यह मन उस निर्विकल्प ज्ञानतत्त्व की ओर झाँक रहा हो, पर ज्ञान का अनुभव तो नहीं है । जहाँ ज्ञान का अनुभव नहीं है वे समस्त क्रियाएँ उन्मत्त चेष्टाएँ कही गयी हैं ।

मोही की घातकता – मोह केवल दर्शन का घातक ही नहीं होता है, चारित्र का भी घातक होता है अर्थात् दर्शन को भी घातता है । और चारित्र को भी घातता है जब तक दर्शन और चारित्र का विघात है तब तक यह जीव निर्दोष नहीं है । अपने को सदा ऐसा मानते तो रहना चाहिये कि मैं घर में रहता हूँ तो दुकान करता हूँ; या घर वालों से बड़ी न्याय नीति से बोलता हूँ तो समाज में बड़ी सुंदर चाल चलन से रहता हूँ तो, और की तो कहानी ही क्या कहें, हम अपने लिये काय क्लेश, पूजन, सामायिक, भक्ति, सेवा-सुश्रुषा जितनी भी तन, मन, वचन की चेष्टाएँ करते हैं वे सब हमारी उन्मत्त चेष्टाएँ हैं, यथार्थ काम नहीं हैं, लेकिन बड़े अयथार्थ ज्ञान से बचने के लिए कम अयथार्थ काम किया जाय तो भी लोग भला समझते हैं ।

आंतरिक रुचि – जैसे किसी अपराध में किसी व्यापारी को एक हजार रुपया दंड किया गया हो तो व्यापारी यह कोशिश करता है कि मेरा दंड कम हो जाय, और किन्हीं कोशिश के बाद हजार की जगह पर 50 ही रुपया दंड रह गया तो वह कुछ चैन मानता है, खुश होता है, पर उसको भीतर से पूछो क्या वह 50 रुपये भी देने की रुचि रखता है ? अरे ! वह 50 रुपये भी नहीं देना चाहता, किंतु उस हजार के नुकसान से बचा है, उसके मुकाबले में इसे अच्छा मानता है । इसी तरह अव्रत आदिक अशुभ भावों की अपेक्षा व्रत आदिक शुभ भावों को भला मानता है पर वस्तुत: इन दोनों भावों में यह ज्ञानी पुरुष रुचि नहीं रखता है । वह तो शुद्ध ज्ञान के अनुभव में ही प्रसन्न रहा करता है ।आत्मदर्शियों के भ्रांत दशाओं का अभाव – जो आत्मदर्शी पुरुष हैं उनको सोई हुई अथवा पागलों जैसी अवस्थाएँ भी भ्रमरूप नहीं होती हैं, याने आत्मदर्शी पुरुष ऐसे आत्मज्ञान का अभ्यासी है कि उसका चित्त आत्मरस से भीगा रहता है और वह अपनी स्वरूपप्रतीति से कभी च्युत नहीं होता है । कदाचित् इंद्रिय की शिथिलता आ जाय या रोग आदि की वजह से कभी मूर्छा आ जाय तो भी उसका आत्मसंस्कार नहीं छूटता है । जैसे मरण के समय में यदि बोल थक जाय या बेहोशी हो जाय तो वहाँ मरण बिगड़ जाता है क्या ? मरण का बिगड़ना संस्कार से संबंध रखता है । यदि कोई ज्ञानी पुरुष है, तत्त्वज्ञान का दृढ़तर अभ्यासी है, जिसने आत्मस्वरूप का बार-बार अवलोकन किया है, ज्ञान और वैराग्य जिसका प्रबल है उस पुरुष के कभी रोग में बेहोशी हो जाय तो अंतर में ज्ञानधारा ही चलती है । बेहोशी हो गयी तो लोगों को अब दिखता नहीं है कि यह कार्य कर रहा है, न हाथ चलाता है, न आँख चलाता, न बोलता है, न इशारा कर सकता है, यों ही पड़ा हुआ सोई हुयी जैसी हालत में है । उस समय भीतर में मन कार्य कर रहा है ।

सुप्त अवस्था में मनोवृत्ति – जैसे सोती हुयी हालत में जब स्वप्न न आ रहा हो उस समय क्या मन कुछ काम नहीं करता ? मन भी काम न करे तो पूजा से बढ़िया तो सोना हुआ ये तप, व्रत, संयम पालते हैं उससे बढ़िया सोना हुआ, निद्रा लेना हुआ । लोग तो सोचेंगे कि खूब सोयें, पड़े रहें तो उससे कर्म नहीं बँधेगे, लेकिन ऐसा नहीं है, सोती हुयी अवस्था में जागती हुयी अवस्था से भी अधिक कर्म बँधते हैं । वहाँ भी मन भीतर कार्य करता है । उस सोये हुए पुरुष को ऐसा नहीं मालूम पड़ता कि मैं कुछ सोच रहा हूँ या कुछ कर रहा हूँ । लोग जागने पर इतना तो कह देते हैं कि हम आज बड़े मौज में सोये । अरे ! बड़े मौज में सोने का अनुभव उसको प्रतिसेकेंड रहा आया है ।बेहोशी में अंत: संस्कार – तो जैसे सोयी हुयी हालत में अपने आपको भी अपनी खबर नहीं है तो भी गुप्तरूप से मन कार्य कर रहा है । यों ही रोग की वजह से बेहोशी हो जाय तो भी पुरुष का ज्ञान अंतरंग में काम कर रहा है, उसका आत्मानुभवरूप संस्कार नहीं छूटता । ज्ञानी बेहोश भी हो जाय तो मरण नहीं बिगड़ता और अज्ञानी पुरुष होश में भी मरण करे; जैसे टी.बी. के मरीज बेहोश होकर नहीं मरते हैं, वे बोलते-बोलते मरते हैं । जैसे उनके बोल में ज्यों ही थोड़ी मंदी आयी बस उसके बाद बोलना बंद हुआ कि प्राणांत हो गया । ऐसे भी मरण हुआ करते हैं तों यों मरने से कहीं अज्ञानी को लाभ नहीं हो गया, और बेहोश हो जाने पर भी ज्ञानी पुरुष का कहीं नुकसान नहीं हो गया । ये तो शरीर के धर्म हैं । होश रहे शरीर के तो क्या, बेहोश रहे तो क्या ? जैसा ज्ञानसंस्कार या अज्ञानसंस्कार होगा उसके अनुसार उसे लाभ अलाभ होगा ।बेहोशी की कल्पना का व्यर्थ भय – बहुत से लोग तो दूसरों का मरण देखकर जिस मरण में प्राय: मरने से पहिले बेहोशी हो ही जाती है कोई ही बिरला होश में बोलता हुआ मरता है । किसी को घंटा भर पहिले किसी को 2 घंटा पहिले बेहोशी होती है उसको देखकर देखनेवाले घबरा जाते हैं, हाय ! ऐसी ही हम पर बीतेगी । वे बड़े चिंतित हो जाते हैं । मरण बिगड़ जायगा । अरे ! मरण बिगड़ता है अज्ञान से और सुधरता है ज्ञान से । जिसने अपने जीवनभर ज्ञान की साधना की हो वह पुरुष बेहोश होकर भी अंतरंग में ज्ञानसंस्कार बनाए रहता है ।

अज्ञानी का होश भी बेहोशी – भैया ! जो आत्मदर्शी पुरुष हैं उनको सोई हुई अवस्था में भी भ्रमरूप नहीं है और उनको बेहोशी की अवस्था भ्रमरूप नहीं है, किंतु जो अज्ञानी जीव हैं, बहिरात्मा हैं उनको सोई हुई अवस्था तो भ्रमरूप है ही; बेहोश, उन्मत्त दशा भी भ्रमरूप है किंतु जगती हुई हालत में भी जो कुछ यह करता है वह सब भ्रमरूप है । तथा जो बालपन, जवानी आदिक जितनी भी अवस्थाएँरूप यह अपने को अनुभवता है वह सब भ्रमरूप है । कोई ऐसा सोच रहा हो कि मैं इतने वैभव का धनी हूँ, इतने मकान हैं, ऐसा लेने-देन है, देखा ठीक हिसाब है कि नहीं, गल्ती निकाल दी, यह रोकड़ नहीं मिली, इसमें 2 पैसे का फर्क है, अच्छा फिर देख डालेंगे । हाँ, हुई न बड़ी चतुराई, हुआ न बड़ा होश कि अच्छा हिसाब कर लिया, अच्छी व्यवस्था बनालो । अरे ! नहीं अज्ञानदशा में ये सब, जिन्हें यह होश कहता है, वह सब भ्रम है । एक परमार्थस्वरूप आत्मतत्त्व के दर्शन में भ्रम नहीं है । उसके लिये सारी अवस्थाओं में कोई भ्रम नहीं होता है । अब ज्ञानदृष्टिहीन शास्त्रवेदियों की बात देखिये । लोक में कुछ लोग ऐसा विवेक किया करते हैं कि जिसने अधिक पढ़ लिया वह ज्ञानी पुरुष है; जिसको बहुत सी भाषाएँ याद हैं, जो नीति का, धर्मशास्त्र का बड़ा व्याख्यान देता है, वह ज्ञानी पुरुष है, वह तो मुक्त हो जायगा ऐसी लोगों की धारणा बनी रहती है । उसके संबंध में समाधान देते हुए पूज्यपाद आचार्य कहते हैं –


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