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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधिभक्ति - श्लोक 12

From जैनकोष



कर्माष्टकविनिर्मुक्तं मोक्षलक्ष्मी निकेतनम्।

सम्यक्त्वां दिगुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहम्।।12।।

ज्ञानी ऋषि संतों का परम इष्ट- ज्ञानी पुरूष को केवल समाधिभाव ही इष्ट है।रागद्वेष की तरंग न उठकर केवल जानन देखनहार बने रहना, वीतरागता, समता बनी रहना, यही मात्र उसको प्रिय है।वह जानता है कि अज्ञान में किसी प्रकार की कषाय जगी, किसी वस्तु में राग उठा, किसी वस्तु के प्रति विरोधभाव जगा तो उसमें मेरी ही बरबादी है।इस कारण ज्ञानी पुरूष को केवल समताभाव ही प्रिय है और समता भाव में ही उसका निर्णय है कि मेरा उद्धार कर सकने वाला कोई है तो मेरा समता परिणाम है।समता परिणाम से स्वयं को भी बड़ी शांति मिलती है और वातावरण में आये हुए प्राणियों को भी शांति प्राप्त होती है।रागद्वेष का उतना प्रभाव नहीं जितना कि समता का।समता में एक अलौकिक प्रभाव है।जिस समय श्रैणिक राजा ने एक मुनिराज के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया द्वेषवश, तीन दिन बाद श्रेणिक ने अपनी चेलना रानी से कहा कि हमने तुम्हारे गुरू के गले में मरा हुआ सांप डाला था तो चेलना कहती है तुमने बड़ा पाप का बंध किया।.. अरे-अरे वे तो मुनि किसी समय भी सांप को फेंककर भाग गए होंगे ऐसा श्रेणिक ने कहा।तो चेलना कहती है कि यदि वह वास्तविक जैन गुरु हैं तो उसे उपर्सग जानकर वहीं के वहीं विराजे होंगे, दोनों देखने के लिए चले तो देखा कि गुरु वहीं के वहीं विराजे थे।श्रेणिक के चित्त में एकदम परिवर्तन हुआ और अपने पापकर्म पर बड़ा पछतावा हुआ।श्रेणिक सांप को उठाकर निकालने को था कि चेलना ने उसे रोक दिया।इस तरह न उठाया जायेगा यह सांप, देखो इस सांप पर चींटियां चढ़ी हुई हैं, तो पहिले नीचे शक्कर बिखेर दी, वे सारी चींटियां शक्कर की गंध से नीचे उतर आयी तब सांप को धीरे से उतार दिया।जब मुनिराज ने ध्यान छोड़ा और सामने खड़े हुए उन दोनों को देखा तो कहा- उमयो धर्मबुद्धिरस्तु, तुम दोनों को धर्म बुद्धि हो।तो अब श्रेणिक पर और विकट प्रभाव पडा़ कि देखो- मैं उपद्रव करने वाला और यह चेलना उपसर्ग के दूर करने वाली, फिर भी इन साधु महाराज की दृष्टि हम दोनों पर एक समान है।न इनको चेलना से राग है और न हमसे विरोध।उस समय श्रेणिक का इतना विशुद्ध परिणाम हुआ कि सम्यक्त्व जग गया।संसार के संकट सदा के लिए टाल देने का निर्णय बना लिया।समतापरिणाम में इतना बड़ा प्रभाव है।स्वयं को भी शांति मिलती है, दूसरों को भी।भैया ! यदि कल्याण चाहते हो तो सदा यह प्रयत्न रखना चाहिए कि मेरे कषाय न जगें।कषायें मंद रहें और दृष्टि यह रहे कि यह कषायें ही जीव का अनर्थ करने वाली हैं।यह मोह जीव का अनर्थ करने वाला है।यह मोह भाव विकार है, नष्ट हो जाने वाला है।इससे मुझे प्रीति नहीं करनी चाहिए।

समाधिभक्त द्वारा समाधिमूर्ति का वंदन- समाधि परिणाम का भक्त पुरूष यहाँ समाधि की साक्षात् मूर्ति, समाधि के साक्षात् पुंज सिद्ध भगवान का वंदन नमस्कार कर रहा है।मैं सिद्ध समूह को नमस्कार करता हूं।यहाँ सिद्ध चक्र शब्द दिया है।चक्र मायने समूह है, जैसे सिद्धचक्र विधान, याने सिद्ध के समूह की पूजा।तो मैं सिद्धचक्र को नमस्कार करता हूं।कैसे है वे सिद्ध प्रभु, अष्टकर्मों से रहित।इस जीव के साथ अष्टकर्मों का उपद्रव लगा हुआ है।यहाँ थोड़ा सा साधन पाकर उसमें मौज माना जाता है।बड़ी भारी मूढता है, एक तो यह मौज की चीज नहीं है, और कुछ मौज भी हो कल्पित तो ये दो दिन की बातें हैं और जितने दिन मौज मिला हुआ है उतने दिन भी निरंतर सुख नहीं है।एक दिन में 100 बार अगर सुख होता है तो 100 बार दु:ख भी होता है।चौबीस घंटे में कई बार तो यह जीव कुछ मौज सा मानता है लेकिन उससे अधिक यह दु:ख का भी सामना करता है जहाँ आरंभ और परिग्रह साथ लगे हैं तो वहाँ दु:ख के साधन विशेष हैं, सुख का साधन कम है।यह सब क्यों हुआ? कर्मोंदय से।तो यहाँ की थोड़ी विभूति मौज पाकर हम यह न मानें कि हम कृत्कृत्य हो गए, मुझे सब कुछ मिल गया, अब हमें क्या करना है? हमसे बड़ा कौन है? यह बात बिलकुल भ्रम की है, कुछ नहीं मिला है।जो मिला है वह दु:ख का हेतुभूत है, हमारी बुद्धि को बिगाड़ने का कारण है, इस संपदा से मेरा पूरा न पड़ेगा।मेरा पूरा तो सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र से पड़ेगा।अपने आपके आत्मा के स्वरूप में सत्य श्रद्धा हो, अपने आपके स्वरूप का ज्ञान हो और अपने आपमें रमने का काम हो तो शांति मिलेगी।इस शांति को नष्ट करने का कारण निमित्त है अष्टकर्म।प्रभु अष्टकर्मों से रहित हैं।अत: शांति समाधि के वे घनीभूत पुंज हैं।

कर्मनिष्पत्ति- अष्टकर्म हैं- ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अंतराय।जब यह जीव कषायभाव करता है तो उस ही समय में इस जीव के साथ लगी हुई उम्मीदवार जो कामार्णवर्गणाएं हैं वे तुरंत कामार्णवर्गणा रूप बन जाती हैं।कोई मनुष्य पाप करे और ऐसा विश्वास रखे कि मुझे कोई नहीं देखता, मेरे पाप को कोई नहीं जानता।मैं तो दुनिया के लिए भला ही हूं, लेकिन यह तो देखिये कि जिस समय में कषाय भाव हुआ, पाप परिणाम हुआ उसी काल में कितना खोटा कर्म बँध गया इसे कोई रोक दे तब जानें।तो किसी भी जगह हो, हमें पाप से भय करना चाहिए, किसी के दिल को दु:खाने का मेरा परिणाम भी न हो।किसी को मारा पीटा, उससे पाप बंध हुआ तो मारने पीटने से नहीं हुआ, किंतु मारने पीटने का भाव भी साथ में लगा हुआ है।उस भाव से पाप का बंध हुआ।तो फिर यदि कोई पुरूष मार पीट भी न पाये और मार पीट का भाव बना ले तो उसे पाप का बंध हो जायेगा।इससे भाव ही हमारे खोटे न जगें, ऐसा अपने आपका यत्न रखना चाहिए।किसी की झूठी गवाही दी, झूठ बोला, झूठ कोई बुरा नाम लगा दिया तो वहाँ जो परिणाम बिगाड़ा उस परिणाम से उसके कितना पाप का बंध होता है? उसके उदय में दु:ख कोई दूसरा न भोगेगा यही, तो किसी की झूठी बात कहना, निंदा करना, चुगली करना, अपयश करना आदि ये बहुत खोटे भाव हैं।इनमें जो पापकर्म बँध जाते हैं उनके उदय में बहुत दुर्गति भोगनी पड़ती है और दुर्गति तो वह तत्काल भोग लेता है जिस समय वह झूठ बात कहता है, उसका दिल कमजोर होता है, वह चिंता और शोक से आकुल व्याकुल रहता है।तो ऐसे ही किसी भी ढंग से चोरी करने का परिणाम आया, दूसरे का धन अन्याय करके, दंगा करके हड़प लेवे तो वे सब चोरी के ही भेद हैं।तो चोरी करने का भाव करने मात्र से जो अपने आपमें उम्मीदवार कामार्णवर्गणायें बैठी हैं वे कर्मरूप बन जाती हैं।तो यह भी कितनी कठिन बात है? याने कर्म जो बंधे वे कहीं बाहर से लाने पड़े हों, यह बात नहीं हैं, किंतु जीव के साथ जो कर्म बँधे वे भी रहते हैं और जो कर्म बँधने के उम्मीदवार हैं वे भी अनंत वर्गणायें इस जीव के साथ बनी रहती हैं।जहाँ भी खोटे परिणाम किए वहाँ भी इस जीव को यह कर्म बँध जाते हैं।कुशील परिणाम पुरूष स्त्री को देखकर बुरा भाव मन में लाये अथवा स्त्री किसी पुरूष को देखकर मन में बुरे परिणाम लाये, कामभाव लाये तो उस परिणाम से तत्काल खोटे कर्मों का बँध हो जाता है और उस कर्म के उदय में फिर इस जीव को बड़ी दुर्गति सहनी पड़ती है।इसी तरह परिग्रह पाप है, तृष्णा करना, खूब धन आता है फिर भी उसकी चिंता रखना, इस भाव से विकट पाप का बंध होता है।कोई यह न जाने कि मैं राजा का अपराध नहीं करता, देश का अपराध नहीं करता, किसी प्रकार का दूसरे पर अन्याय नहीं करता, सिर्फ अपना धन बढ़ाने की बात सोच रहा हूं, किसी पर कोई उपद्रव तो नहीं ढा रहा हूं, लेकिन इस परिणाम में भी पाप का बंध है, अज्ञान का पोषण है।जब बाह्य में कुछ भी पदार्थ मेरे नहीं हैं तब इन दृष्यमान् पदार्थों के संचय का भाव बनाये, इसमें तो वह अपने आत्मा को भूल गया, परमात्मस्वरूप को तो भूल गया, उसको शांति कहाँ है? विकट कर्म का बंध है।तो ये ही कर्म बँधे हुए हैं जिनके उदय में जन्म मरण करना पड़ता है, दु:खी रहना पड़ता है।प्रभु ऐसे सब कर्मों से पूर्णतया रहित हैं।ये ही विस्रसोपचय कार्माण द्रव्य जब कषायभाव करने से, मोहभाव रखने से फल देने की प्रकृति बन जाती है, उसके नाम पर कर्म के 8 भेद बताये गए हैं।

ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म- ज्ञानावरण यह जीव के ज्ञान पर आवरण करता है।जीव है ज्ञानस्वरूप।जीव का शुद्ध कार्य है जानना।जैसे अग्नि का स्वरूप है गर्मी, गर्मी मिट जाय तो अग्नि रहेगी क्या कुछ? गर्मी न रही तो आग न रही।तो गर्मी आग का अभिन्न स्वरूप है।उस ज्ञान को जो प्रकट न होने दे ऐसा निमित्तभूत हुआ।जिस कर्म के उदय से ज्ञान प्रकट न हो सके उसको कहते हैं ज्ञानावरण कर्म।इस जीव में जानने का स्वभाव है।इन आँखों वोजक से इन आंखों से जानता हूं ऐसी बात नहीं।हां, थोड़ा निमित्त सहयोगी कारण तो है लेकिन यह आत्मा अपने ज्ञानस्वरूप के द्वारा ही ज्ञान किया करता है।जहां इंद्रिय ज्ञान मिटा, कर्मोंदय मिटा ज्ञानावरण नष्ट हुआ वहां यह कितना जानेगा? उस जानने की कोई हद नहीं रहती।जो भगवान हो गये, वीतराग सर्वज्ञदेव हो गए उनका ज्ञान अपने आप इतना विशाल हो जाता कि तीन लोक तीन काल में जो कुछ भी है, भूत में जो कुछ हुआ, भविष्य में जो कुछ होगा, समस्त पदार्थ उनके ज्ञान में स्पष्ट झलकते हैं।तो ऐसे असीम, ऐसे महान् ज्ञान को भी जो कर्म आवरण किए हुए हैं, वे कर्म हम पर लदे हुए हैं, तो हम आप पर यह कितनी बड़ी भारी विपत्ति है? दर्शनावरण के उदय से आत्मा में दर्शनगुण प्रकट नहीं होता।दर्शन के मायने यह है कि जैसा आत्मा का सही स्वरूप है उस स्वरूप के रूप में एक सामान्य झलक आ जाना।तो उस दर्शन को जो कर्म ढांके है, जिस कर्म के उदय से दर्शन प्रकट नहीं हो पाता, ऐसे जो दर्शनावरण कर्म हम आप पर लदे हैं यह हम आप पर विपत्ति है।

वेदनीय कर्म- वेदनीय कर्म के उदय से सुख और दु:ख पैदा होते हैं, संसार में जो ये विषयों के सुख हैं ये वेदनीय कर्म के उदय से हुए, तो कर्म के उदय में जो बात हुई वह भली हो ही नहीं सकती।तो यह इंद्रियजंय सुख दु:ख रूप है, आत्मा को शांति के कारणरूप नहीं है।इन सुखों में कितना अनर्थय है? इंद्रिय सुखों के साथ आप बारीकी से विवेक के साथ निर्णय करें।निरंतर दु:ख लगे हुए हैं, झंझट तो निरंतर साथ हैं।इन इंद्रिय सुखों में एक क्षण को भी क्षोभ न रहे ऐसी स्थिति नहीं है।खूब परख कर लो।भोजन करते समय जो आनंद लूटा जा रहा है, जिसमें बड़ा मौज माना जा रहा है उसमें भी देख लो, इसके भीतर में क्षोभ पड़ा हुआ है कि नहीं? उसी क्षोभ के कारण हाथ चलता है।जल्दी–जल्दी सुख चलता है।कौर पूरी तरह चबा भी नहीं पाते हैं कि उसे गुटकने की पड़ जाती है।कहाँ-कहाँ निगाह रहती है? जो सामान बन रहा है उस सामान को देखकर अच्छा भोजन बन रहा है? यों न जाने कितने क्षोभ मचाये जा रहे हैं? स्पर्शनइंद्रिय के विषय सुखों की बात देखो उसमें भी निरंतर क्षोभ बना रहता है।कोई रूप देख रहे हों जो बड़ा सुहावना लग रहा हो, तो उस रूप के देखने के काल में भी चैन नहीं, क्षोभ पड़़ा हुआ है। राग भरे शब्द सुनते हुए में भी सुनने वालो को चैन नहीं पड़ती, उसमें भी क्षोभ बना रहता है।प्रतिष्ठा, नामवरी कीर्ति फैलने की बात, इनमें भी निरंतर क्षोभ चलते रहते हैं।तो संसार के सारे सुख क्षोभ से भरे हुए हैं।लोग तो यों कहते हैं कि थोड़े समय को सुख होता है, बाद में बहुत दु:ख होता है, लेकिन बात यह है कि थोड़े समय को भी सुख नहीं मिलता है, उस सुख के साथ क्षोभ लगा हुआ है।तो वेदनीय कर्म के उदय से जो सुख होता है सो भी आकुलता है और जो दु:ख होता है सो भी आकुलता है।तो ऐसी आकुलता का कारणभूत जो वेदनीय कर्म है वह हम पर विपत्ति है।

मोहनीय कर्म की विडंबना- मोहनीय कर्म यह जीव अपने सही स्वरूप में न रह सके, अपने यथार्थ स्वरूप का भान न कर सके और सुख में मस्त रहा करे, इन सबका कारण यह मोहनीय कर्म है।मोह के उदय में जीव की बुद्धि उलट जाती है और इसे खोटा पथ सुखदायी मालूम होता है।यह बैचेन रहा करता है।तो मोहनीय कर्म हम आप पर लदे हुए हैं, यह हम आप पर बड़ी विपत्ति है।जैसे लड़ने वाली सारी सेना की जान राजा है, राजा के बल पर ही सेना अपना बल दिखाया करती है।इसी प्रकार 8 कर्मों का राजा मोहनीय कर्म है।मोहनीय कर्म के बल पर ही ये 7 कर्म अपना नाच नचा पाते हैं।जब मोहभाव है तब सब प्रकार के संकट इस जीव पर आ गए।जब मोह नहीं रहता तो ये कर्म भी बिदा होने लगते हैं।इन कर्मों में भी दम नहीं रहती और यह संकट भी दूर होने लगते हैं।इसी कारण आप जानते होंगे कि इन 8 कर्मों में सबसे पहिले मोहनीय कर्म नष्ट होता है तब बाद में 7 कर्म नष्ट होते हैं और मोहनीय कर्म के भी दो भेद है- दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय।जो आत्मा का श्रद्धान बिगाड़ दे उसका नाम है दर्शनमोहनीय और जो आत्मा को आत्मा में न समाने दे, न ठहरने दे, चारित्र को बिगाड़ दे उसे कहते हैं चारित्रमोहनीय।इन दो कर्मों में दर्शन मोहनीय, चारित्र मोहनीय इन दो में प्रबल है, भयंकर है दर्शनमोहनीय, जो श्रद्धा को ही बिगाड़ दे।जहां उल्टी बात मन में हो वहां फिर वह सीधा काम कर ही न सकेगा।देह को ‘यह मैं हूं’ इस प्रकार मानना यह दर्शन मोहनीय का काम है।जब इस जीव ने शरीर को आत्मा मान लिया तब यह कोई सा भी काम सीधा नहीं कर सकता जो भी काम करेगा सब उल्टा।जो भी व्यवस्था बनायेगा वह सारी उल्टी-उल्टी बनायेगा, जिससे जीव की बरबादी है।जन्म मरण की परंपरा बढ़े, ऐसा ही काम करेगा दर्शनमोह के उदय में।

दृष्टांतपूर्वक दर्शनमोहनीय की विडंबना का प्रदर्शन- एक बुढ़िया के दो बालक थे, तो एक बालक को मोतियाबिंद हो जाने से या फूली पड़ जाने से बहुत कम दिखता था और एक लड़के को दिखता तो बहुत तेज था पर पीलिया का रोग हो जाने से सब कुछ पीला दिखता था।अब वह बुढ़िया मां अपने दोनों बेटों का इलाज कराने के लिए वैद्य के पास गई।वैद्य ने उन दोनों बालकों के नेत्र देखकर कहा- मां हम तुम्हारे दोनों बेटों की दवा करेंगे, इन दोनों बालकों के नेत्र ठीक हो जायेंगे।अच्छा ठीक है।वैद्य ने कहा- देखो, यह सफेद मोतीभस्म है, इस दवा को चाँदी के गिलास में गाय के दूध में मिश्री में मिलाकर इन दोनों बालकों को पिला देना।थोड़े ही दिनों में तुम्हारे इन दोनों बालकों का नेत्र रोग दूर हो जायेगा।बुढ़िया दवा लेकर घर आयी।घर पर जब दवा देने लगी तो जिस बालक को कम दिखता थाउसने उस दवा को पी लियाऔर जिसे उल्टा दिखता था अर्थात् जिसे पीलिया का रोग था उसने देखा कि मां पीला गिलास लायी, उस पीले गिलास को देखकर मां से बड़ा द्वेष जगा, सोचा कि वैद्य ने तो चांदी के गिलास में दवा देने को कहा था, पर यह तो हमें पीतल के गिलास में दवा दे रही है।जब उस गिलास में उस बुढ़िया ने दूध डाला तो उस बालक को और भी उस मां से द्वेष जग गया।सोचा ओह ! वैद्य ने तो दूध में इस दवा को देने के लिए कहा था, पर यह तो गाय भैंस के मूत्र में दवा दे रही है।जब बुढ़िया ने मिश्री मिलाया तो उस बालक को अपनी मां से और भी अधिक द्वेष जग गया।सोचा ओह ! वैद्य ने तो मिश्री मिलाने को कहा था, पर यह तो विष डाल रही है।यों वह बालक उस अपनी मां पर जलकर आग बबूला हो गया।उसने दवा से भरे गिलास को फेंक दिया।दवा न पी।तो अब देखो- जिसे कम दिखता था वह तो दवा पी गया और उसके नेत्रों का दु:ख दूर हो गया, पर जिस बालक को पीला (उल्टा) दिखता था, जिसे मीलों दूर तक दिखता था, उसने दवा न पी, जिससे उसका नेत्र रोग दूर न हो सका।तो इसी तरह कोई ज्ञान में विद्या में बहुत बढ़ जाय, जो लौकिक विद्यायें होती हैं उनमें प्रवीण हो जाय।लेकिन निज का और पर का यथार्थ ज्ञान नहीं है, आत्मा के सत्यस्वरूप का बोध नहीं है तो उस जीव का उद्धार नहीं हो सकता।वह सत्य शांति नहीं प्राप्त कर सकता, आकुलताओं से परे नहीं हो सकता।उसके जन्म मरण नहीं टल सकते।इस कारण बड़े धैर्य की पद्धति से गुप्त ही गुप्त पढ़ लिख कर स्वाध्याय करके अपने आपका सच्चा ज्ञान जगाना चाहिए।अपने आत्मा की झलक अपने को हो जाय तो उससे आत्मा का भला हो सकता है।जो हमें सत्यपथ की श्रद्धा ही न करने दे ऐसा कर्म है दर्शन मोहनीय कर्म।यह निर्णय रखिये कि मुझ पर बड़ी आपत्ति छाई है, उसे दूर करेंगे तब शांति मिलेगी।कर्मों के मेटे बिना शांति न मिलेगी।यहां के दो दिन के मौज क्षणभंगूर, फिर भी पर, उनसे हम क्या मौज मानें? अपने आपके दर्शन करें और सदा के लिए संसार के संकटों को दूर कर दें, ऐसा अपने आपका निर्णय होना चाहिए।

वर्तमान संगम की विडंबना- हम आप जितने भी लोग हैं, यह सब जो कुछ दिख रहा है और जिस संपर्क में बात बन रही है वह सब क्या है? 3 चीजों का पिंड है यों समझिये जीव, कर्म और शरीर यहां।कोई खालिस जीव नहीं नजर आता है।स्वरूप खालिस है मगर जो बीत रही है उस बात पर दृष्टि दें तो खालिस कोई चीज नहीं है।खाली कर्म भी नहीं है, खाली देह भी नहीं है।ये तीन शामिल भये हैं उससे चलना फिरना बोलना समझना ये सारी चकाचौंध इन तीन के मेल में हैं और इन तीन के मेल में क्या दशा बन रही है सो परख लीजिए।आज हम मनुष्य हुए हैं, किसी दिन से हुए हैं और किसी दिन तक रहेंगे, इससे पहिले क्या हुए थे, इसके आगे क्या होंगे? सो ये सब जो कीड़ा मकोड़ा पशु पक्षी आदि दिख रहे हैं ये सब उसके प्रतीक है।सो मैं कुछ था और न संभाले तो मैं ऐसा ही कुछ होऊँगा।जरा कुछ ध्यान तो करना चाहिए कि काल हैं अनंत।अनंत काल व्यतीत हो गया, अनंत काल आगे और पड़ा है।इसे रहना कब तक पड़ेगा? अनंतकाल तक।हम हैं, हमारा कभी नाश नहीं हो सकता।हम पर्यायें बदलते जायेंगे या शुद्ध हो जायेंगे तो सिद्ध बनेंगे, पर हम कभी मिट नहीं सकते।अनंतकाल तक रहेंगे।उस अनंतकाल के सामने ये जीवन के 100-50 वर्ष कुछ गिनती भी रखते हैं क्या? अरे यह इतना सा समय कुछ भी तो मूल्य नहीं रखता।फिर इतने से समय में हम आप व्यर्थ ही अपना स्वच्छंद प्रवर्तन करते हैं। व्यर्थ ही रागद्वेष मोहादि विकार भाव बनाते हैं।इनके फल में जन्म मरण की परंपरा ही बढ़ती रहेगी और अनंतकाल तक दु:ख भोगना पड़ेगा।

विवेकी पुरूष का विवेक- विवेकी पुरूष वह है जो इस सुयोग का लाभ उठाये।जैसे किसी नगर में एक यह रिवाज था कि हर वर्ष नया राजा बनाया जाता था, और नया राजा बनने पर पहिले वाले राजा को जंगल में छोड़ दिया जाता था, यों बहुत से लोग राजा बने, जंगल में छोड़े गए और दु:खी होकर मरे।एक बार एक विवेकी पुरूष राजा बना।उसने विचार किया कि एक वर्ष के लिए तो हमें सब अधिकार प्राप्त हैं।जो चाहे हम कर सकते हैं।उसने जिस जंगल में उसे छोड़ा जाना था उस जंगल में एक बहुत बड़ा भाग साफ करवा लिया खेती करने लायक भूमि बना ली, बहुत से नौकर चाकर दिये, कोठियाँ भी बनवा लीं, खेती करने के सारे सामान भी भेज दिए।जब एक वर्ष बाद उसे उस जंगल में छोड़ दिया गया तो वहां उसे क्या कष्ट? वह तो बड़े आराम से रहने लगा।तो इसी तरह से समझिये हम आप लोग कुछ समय के लिए मनुष्य बन गए हैं।अब मनुष्य बनकर यहां की यह रीति है कि प्राय: करके ये मनुष्य निगोद में, नरक में अथवा पशु पक्षियों की योनियों में पटक दिये जायेंगे।लेकिन कोई आत्मा चतुर हो तो वह समझता है कि इस मनुष्य भव में मैं जो कुछ करना चाहूं कर सकता हूं जो ज्ञान मिला है उसका ठीक उपयोग कर ले।तो वह अपने ज्ञान का ठीक उपयोग करेगा, अपने आत्मा को जानेगा, आत्मा का विश्वास करेगा, आत्मा में लीन होगा उसके सब कर्म कट जायेंगे वह सिद्ध पद पायेगा और अनंत काल के लिए सुखी रहेगा।

आयु, नाम व गोत्र कर्म के विपाक में विडंबना- भैया ! यहाँ व्यर्थ के भ्रम का चैन मत मानो।विपदा हम आप पर बसी है इन कर्मों की।ये मौज मानने के दिन हैं।कुछ अच्छे साधन पाकर, योग्यतायें पाकर यदि मौज मानते रहे तो उसका फल क्या होगा? इस 100-50 वर्ष के समय की तो बात क्या, अनंत काल तक जन्म मरण की परंपरा के दु:ख भोगने पड़ेगे।कुछ तो सोचिये।यह कर्मों का ही तो फल हैं कि इस जीव को शरीर में फँसना पड़ता है।यदि यह जीव शरीर में न फंसा होता, खालिस होता तो इसकी बड़ी शांत अवस्था होती।जिस शरीर को देखकर हम बड़े खुश होते हैं, जिसको देखकर हम अपना बड़ा गौरव अनुभव करते हैं, जिसको हम बड़े आराम से रखना चाहते हैं, जिसकी शकल के फोटो स्टैचू आदि बनवाकर लोक में नामवरी फैलाना चाहते हैं वह शरीर ही इन समस्त विडंबनाओं का कारण है।खूब निरख लीजिए, शरीर के संबंध से होगा क्या? भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, इज्जत, प्रतिष्ठा आदिक ये सब इस शरीर के नाते से ही तो हैं, इस शरीर को निरखकर गर्व न करें।यह शरीर नाम कर्म के उदय से प्राप्त हुआ है, यह मेरी चीज नहीं।यह जड़ है, मैं चेतन हूं, और फिर खासकर यह मनुष्य का शरीर तो बड़ा भयानक सा है।इस शरीर में अंदर से लेकर बाहर तक कुछ भी तो पवित्र चीज नहीं है।हाड़, मांस, मज्जा, खून, पीप, नाक, थूक, खकार, मल, मूत्र आदिक महा दुर्गंधियों का घर है यह शरीर।अनुप्रेक्षा ग्रंथों में आचार्यों ने कहा है कि इस मनुष्य को जो ऐसा गंदा अपवित्र शरीर मिला है वह इसको वैराग्य के लिए दिया है।इस शरीर से इस मनुष्य को राग न रहे क्योंकि महा गंदी अपवित्र चीज से किसे प्रीति होती है? तो ये मनुष्य इस शरीर में राग न करके आत्मकल्याण कर लें, मानों इसलिए यह महा अपवित्र शरीर को ही अपना सर्वस्व मानता है।यही कारण है कि यह शरीर इस जीव को महा दु:ख दे रहा है।शरीर के संबंध से ही यह जीव ऊँच नीच कहलाता।जिसे कुल कहो अथवा गोत्र कहो।ये कुल गोत्र भी इस जीव के क्लेश के ही कारण हैं।यदि लोक में निंद्य कुल मिल गया तो यह जीव यह सोचकर दु:खी रहता है कि हाय मैं क्या हूं।अगर पूज्य कुल मिल गया तो उसमें यह जीव गर्व करने लगता है।यों यही शरीर इस जीव के क्लेश का ही कारण बन रहा है।

इच्छा की अनर्थरूपता व अंतराय का विपाक- इच्छा के माफिक इस संसार में न कभी किसी का हुआ, न होगा, न होता है।कोई पुरूष जिस काल में इच्छा करे उसी काल में उसकी इच्छा की पूर्ति हो जाय यह किसी के आज तक हुआ क्या? एक दिन की देर लग जाय, एक घंटे की अथवा एक मिनट की देर लग जाय।इच्छा करते ही तुरंत उसकी पूर्ति हो जाय, ऐसा नहीं हो सकता।बड़े-बड़े पुरूष तीर्थंकर चक्रवर्तियों को भी ऐसा नहीं हुआ।इसका प्रमाण यह है कि जिस काल में कोई चीज मिली हुई है, अनुभवी जा रही है, भोगी जा रही है उसी काल में उस चीज की किसी ने इच्छा भी की क्या? चाहे और दूसरी इच्छा कर ले पर जिसको भोग रहा है उसकी इच्छा तो नहीं होती।जैसे कोई दुकान पर बैठा हुआ सोचता है कि आज हमें इसमें 50 रू मिलें तो जब तक नहीं मिलें तब तक तो वह सोच रहा है और जब तक मिल गए तो फिर जब मिल गए तो फिर नहीं सोचता, भले ही वह नई बात चाह ले।तो जो चीज पास है उसकी चाह नहीं बनती और जो चीज पास नहीं है उसकी चाह बनती है।इससे सिद्ध है कि जब चाह है तब वस्तु की प्राप्ति नहीं होती और जब चाह नहीं है तब वस्तु की प्राप्ति होती है।कोई जिस काल में जिस चीज की इच्छा करे वह उसे उसी समय में प्राप्त हो जाय, ऐसा कभी नहीं हो सकता।बहुत से लोग तो अपने घर में ऐसी हठ करने लगते हैं कि हमें तो अमुक चीज खानी है, जैसे मानों खीर खाना है तो जिस समय उसको खीर खाने की इच्छा हुई उसी समय उसे खीर मिल तो नहीं जाती।तो ऐसा कभी हो ही नहीं सकता कि जब इच्छा की जाय तभी उस चीज की प्राप्ति हो सके।जब इच्छा करते ही तुरंत चीज प्राप्त न हुई तो मुझे कुछ भी न चाहिये।मैं बिना चाहे, बिना इच्छा किए अपने आपमें तुष्ट रहूं।तो हम आप को ये कर्म बड़ी विडंबना के, विकार के कारण बन रहे हैं।

कर्मबंध व कर्ममुक्ति का आधार आत्मभाव- कर्मों का बंध होता है तो हमारे ही भावों से होता है।हम अपने विकार भाव न करें, पापों से दूर रहें, कषायों से दूर रहें, दूसरों को क्षमा करने का, दूसरों के आगे नम्र रहने का, अपने आपमें सरल बने रहने का, उदार रहने का हम अपना अभ्यास बनायें।इन कषायों से कोई लाभ नहीं होता।क्रोध करके यह कभी शांति नहीं पा सकता।क्रोध के काल में अशांत हैं और क्रोध करके जिस दूसरे मनुष्य को पीड़ा उत्पन्न कर दे उसकी ओरसे सदा भय और चिंता रहेगी।अभिमान करके दुनिया को नीचा देखकर, अपने को सबसे ऊँचा समझना आदि इन प्रवृत्तियों से किसी को शांति नहीं मिलती।मायाचार करके, छल कपट करके भी किसी को शांति नहीं मिलती।लोभ करके भी शांति नहीं मिलती।अनेक बार ऐसा अनुभव किया हो कि 10 रूपये का लोभ किया तो उसी प्रसंग में या अन्य किसी प्रसंग में हजार 500 का टोटा हो गया।और लोभ करना किसका? कोई अपनी चीज हो तब ना।जगत में जो कुछ भी समागम हैं वे सब मुझसे भिन्न हैं उनसे मेरा कुछ भी संबंध नहीं, मैं अकिन्चन हूं, ज्ञानमात्र हूं, ये दो भावनाएँ ऐसी ऊँची हैं कि इन भावनाओं से ही आप धर्म पा लेंगे।ज्ञान ज्योति पायेंगे, कर्मों का विनाश कर लेंगे और अपने आपमें तृप्त हो लेंगे।अपने आपको अकिन्चन अनुभव कर लेने से अपने आपकी प्रभुता के दर्शन होंगे और उसी समय जो आनंद प्रकट होगा, वह आनंद अन्य किसी भी उपाय से नहीं प्राप्त हो सकता।वह सर्वोत्कृष्ट आनंद है।स्वाधीन आत्मा की उपासना से उत्पन्न हुआ आनंद है।इससे इतना तो कम से कम ख्याल करते ही रहें कि जो समागम मिले हैं ये सब विनाशीक हैं, मेरे साथ सदा न रहेंगे।मैं तो अकिन्चन हूं और ज्ञानमात्र हूं।यह बात समझ में तो आयी होगी।जो बात समझ में आयी है उसे कई बार विचार लो।अपने अंदर में उसे देखें, यह भी किया जा सकता है और इस उपाय से नियम से आत्मकल्याण होगा।धर्म किसी जाति अथवा मजहब की चीज नहीं, धर्म का संबंध तो आत्मा से है।और धर्म का फल है शांति देना।जो धर्म करेगा सो शांत होगा और सदा के लिए संसार के संकटों से छूट जायेगा।हमारा कर्तव्य यह है कि हम अपने को सही जानें यथार्थ प्रतीति करें और अपने आपमें रमने की धुन बनायें, इसी उपाय से कर्म दूर होंगे और उस शुद्ध सिद्ध पद की प्राप्ति होगी।उसकी ही धुन में समता का उपासक पुरूष सिद्ध भगवान का यही ध्यान करता है, उनकी भक्ति करता है और सिद्ध के स्वरूप को अपने स्वरूप को एक समान निरखकर सोऽहं, वही मैं हूं इस अभेद भावना से अपने आपमें एक ज्ञान ज्योति का अनुभव करता है।यही धर्मपालन है और यही सबका काम है, जो करेगा सो इस धर्म के फल में अतुल शांति प्राप्त करेगा।

समाधिभक्त द्वारा मोक्षलक्ष्मीनिकेतन की वंदना- आत्मा के रागद्वेषादिक किसी भी विकार में हित न समझने वाला ज्ञानी पुरूष समता के परिणाम की उपासना में समता की शाश्वत स्पष्ट मूर्ति सिद्ध भगवंत की वंदना कर रहा है।ये सिद्ध प्रभु मोक्षलक्ष्मी के निकेतन हैं अर्थात् मुक्तिश्री हैं इसका आश्रय पाकर शोभायमान है।ये शरीर से भी मुक्त हैं, कर्मों से भी मुक्त है, विषय कषाय वान्छा आदिक विकारों से भी मुक्त हैं और इतना सामान्य ज्ञानात्मक हैं कि वहां विचार तर्क वितर्क आदिक भी नहीं उत्पन्न होते।एक स्वरूप जो जाना ऐसा ही सदाकाल जानते रहेंगे, ऐसे साधु समूह की मैं वंदना करता हूं।सिद्ध भगवान में सम्यक्त्व आदिक 8 गुण होते हैं।जैसे कर्म 8 हैं तो इन 8 कर्मों ने आत्मा के इन 8 गुणों को दबा दिया था, विकृत कर दिया था।अब 8 कर्मों के नष्ट होने से ये 8 गुण सिद्ध भगवंत में प्रकट हुए हैं।

ज्ञानावरण, दर्शनावरण व वेदनीय के क्षय से परमगुणविकास- कौन से 8 गुण सिद्ध भगवंत में इन कर्मों के नष्ट होने से प्रकट हुए हैं? उनको क्रम से सुनिये- ज्ञानावरण के नष्ट होने से भगवान में केवल ज्ञान प्रकट हुआ, जिसके प्रताप से तीन लोक तीन कालवर्ती समस्त पदार्थों को स्पष्ट जानते हैं।यह ज्ञान आत्मा का स्वभाव है, कहीं बाहर से लाया गया हो, ऐसी बात नहीं है।ज्ञान एक अमूर्त स्वरूप है, उस पर किसी का आवरण नहीं वरन् संबंध बनता है कि ज्ञानावरण के उदय का निमित्त बनता है।लेकिन आत्मा की स्वयं की कमजोरी के कारण ऐसा निमित्तनैमित्तिक पाकर यह जीव स्वयं अपने ज्ञान का विकास नहीं कर पाता।अब ज्ञानावरण बिलकुल नष्ट हो जाने के कारण उस सिद्ध आत्मा में केवल ज्ञान प्रकट हुआ है।दूसरे कर्म का नाम है दर्शनावरण कर्म, इस कर्म के उदय से आत्मा का दर्शन गुण नहीं प्रकट हो पा रहा।विकृत दृष्टि बन रही थी।अब दर्शनावरण कर्म के नष्ट होने से प्रभु से केवल दर्शन प्रकट हुआ है।अब वे प्रभु तीन लोक तीन काल के समस्त पदार्थों के जाननहार निजस्वरूप का दर्शन किया करते हैं।तीसरा कर्म है वेदनीयकर्म।इस वेदनीयकर्म के उदय से बड़ी बाधायें जीव को आ रही थीं।सांसारिक सुख दु:ख के रूप में यह जीव क्षुब्ध रहा करता था।इष्ट वियोग अनिष्ट संयोग आदिक के रूप से यह जीव दु:ख माना करता था।अब वेदनीयकर्म के नष्ट हो जाने से सिद्ध भगवंत में ये सुख दु:ख नहीं रहे, उनमें सत्य आनंद प्रकट हो गया।सुख और आनंद में अंतर है।सु का अर्थ है सुहावना लगना और ख का अर्थ है इंद्रिय।जो इंद्रियों को सुहावना लगे उसे सुख कहते हैं और जो अपने आपमें सर्व ओर से समृद्धिशाली बने, शांत बने उसे कहते हैं आनंद।आनंद आत्मा का स्वभाव है, पर सुख आत्मा का स्वभाव नहीं।ये सुख दु:ख वेदनीयकर्म के उदय से बनते हैं।अब ये प्रभु सुख दु:ख से परे, परमशांत आनंदमग्न है, उनके अनंत आनंद है।उनका आनंद आत्मा से उत्पन्न हुआ आनंद है।वह आनंद कभी भी मिट न सकेगा।उसे अनंत आनंद कहो अथवा अव्याबाध कहो।जहां किसी प्रकार की बाधा न रहे वह वेदनीयकर्म के अभाव से प्रकट हुआ है।

मोहनीयकर्म के क्षय से परम गुणविकास- चौथे कर्म का नाम है मोहनीयकर्म।मोहनीय कर्म दो प्रकार से प्रहार कर रहे थे।एक तो इस जीव की श्रद्धा बिगाड़ दी।निज को निज, पर को पर जानना चाहिये था, लेकिन निज की तो अब सुध भी न रही और पर को निज जान रहा था।ऐसी श्रद्धा बिगड़ी इस दर्शन मोह के उदय से कि चारित्र मोह के उदय से यह जीव विषयों में रमने लगा।इसको रमना चाहिए था अपने ज्ञानमात्र स्वरूप में, किंतु इस अंतस्तत्त्व में न रमकर यह जीव रम रहा है बाह्य विषयों में, बाह्य पदार्थों में।तो मोहनीयकर्म के ये दो प्रकार के प्रहार हो रहे हैं।अब मोहनीय के नाश हो जाने से यहां सिद्ध भगवंत विशुद्ध आत्म प्रतीति में रहते हैं और अपने आत्मा में ही लीन रहा करते हैं।उससे होता है आनंद और समीचीनता।जैसा आनंद का स्वरूप है तैसा ही सही स्वरूप प्रकट हो गया।तो मोह के अभाव में इसमें सम्यक्त्व गुण प्रकट हुआ है।यहां सम्यक्त्व का अर्थ केवल सम्यग्दर्शन का ही न लेना।सम्यग्दर्शन भी होता है और यही आचरण भी होता है।प्रकट रूप से जैसा यह आत्मा है, जैसा इसका स्वरूप है वह पूर्णरूप से वैसा ही प्रकट हो गया है।

आयुकर्म के क्षय से परम गुणविकास- 5 वां कर्म है आयुकर्म, आयुकर्म के उदय के कारण यह जीव संसार अवस्था में शरीरों में बँधा रहता था।जैसे इस समय हम आप शरीर में बँधे हुए हैं, तो जब तक मनुष्य आयुकर्म चल रहा है तब तक इस मनुष्य शरीर में बँधेरहेंगे, इसी प्रकार मनुष्यभव की आयु समाप्त होने पर, दूसरे भव में पहुंचने पर दूसरी आयु ने बाँध दिया।अब उस भव में उस आयु के कारण बँधे रहेंगे।तो शरीर में इस जीव को रोके रखने का काम आयुकर्म करता है, आयुकर्म अब न रहा तो सिद्ध भगवंत अब किसी भी शरीर में नहीं बँधे है और उनमें अब अवगाहन गुण प्रकट हो गया है।इस समय तो एक जीव दूसरे के शरीर में नहीं समा सकता, दूसरे के स्थान पर नहीं रह पाता, लेकिन आयुकर्म अब न रहने से सिद्ध भगवान जहाँ विराजे हुए हैं वहां अनंत सिद्ध विराजे हैं, ऐसा उसमें अवगाहन गुण प्रकट हुआ है।जिस जगह से कोई ऋषि मुक्त होता है उसी जगह से अनंत ऋषि मुक्त हुए हैं।उन सबका अवगाहन ऊपर उसी जगह से होता है।जीव जब कर्मों से मुक्त होता है तो इसकी ऊर्ध्व गति होती है।जहां से वह जीव मुक्त हुआ है, कर्मों से छूटा है, ठीक उसकी ही सीध में बहुत ऊपर जिसके बाद फिर लोक नहीं हैं, वहाँ जाकर यह जीव विराजमान होता है और वहीं से अनंत जीव मोक्ष गए हैं तो वे भी उसी जगह में अवस्थित हैं।इस ढाई द्वीप के अंदर कोई सा भी प्रदेश ऐसा नहीं है जहां से जीव मोक्ष न गए हों।इस दृष्टि से ढाई द्वीप का प्रत्येक स्थान निर्वाणस्थानहै, तीर्थ क्षेत्र है।जैसे हम आप यहां पर शिखरजी, गिरिनारजी आदिक को निर्वाण क्षेत्र कहते हैं।क्यों कहने की प्रसिद्धि है ऐसी कि शिखरजी से अनंत जीव मोक्ष गए हैं और इस युग में भी अनेक महापुरूष मोक्ष पधारे तो जिन-जिन क्षेत्रों से जीव मोक्ष गए हैं, विशेषतया जिनकी प्रसिद्धि है उनको हम निर्वाण क्षेत्र कहते हैं।यह तो हम ढाई द्वीप के भीतर ही रहकर सोच रहे हैं ना, इसलिए विशेषपूर्वक हमें निर्वाण क्षेत्र विदित होते है।लेकिन सारी दुनिया की दृष्टि में देखो ढाई द्वीप के बाहर के क्षेत्र यहां से कोई जीव मुक्त नहीं हुए।तो उनके मुकाबले में यह ढाई द्वीप का क्षेत्र तो सारा का सारा निर्वाण क्षेत्र है।जिस जगह हम आप बैठे हैं इस जगह से भी अनंत जीव मोक्ष गए।तो यह जगह भी निर्वाण क्षेत्र है।तो इस ढाई द्वीप में प्रत्येक प्रदेश से अनेक जीव मोक्ष गए हैं और वे वहां भी सीधे ऊपर जाकर विराजमान रहते हैं।तो सिद्ध भगवंत में ऐसा अवगाहन गुण प्रकट हुआ है।देखिये- वहां रहने वाले सिद्ध भगवान की स्थिति कि एक माहि एक राजे, एक माहि अनेक नो।वे सिद्ध भगवान किस तरह रह रहे हैं? एक सिद्ध भगवान में अनेक सिद्ध भगवान रह रहे हैं, क्योंकि उसही जगह से जितने आत्मा मुक्त हुए है वे ऊपर ठीक सीध में उस ही जगह रहेंगे।इसलिए एक में अनेक रह रहे हैं, फिर भी एक में अनेक नहीं रह रहे।एक में एक ही रह रहा है, वह किस प्रकार कि जिस भगवान ने केवलज्ञान के द्वारा जो कुछ जाना वह उस ही भगवान ने जाना, वही रहने वाले अन्य सिद्ध भगवान ने अपने स्वरूप से अपने उस समस्त को जाना।तो सबका ज्ञान, सबका आनंद, सबका परिणमन उनका अपने आपमें जुदा जुदा है।इस निगाह से देखो तो प्रत्येक सिद्ध अपने एक में एक ही रह रहा है, एक में अनेक नहीं रहते।लेकिन स्थान की दृष्टि से देखो तो एक सिद्ध में अनेक सिद्ध रह रहे हैं।तो आयुकर्म के नष्ट होने से सिद्ध भगवंत में यह अवगाहनगुण प्रकट हुआ है।

नामकर्म के क्षय से परमगुण विकास- छठे कर्म का नाम है नामकर्म।नामकर्म के उदय से इस जीव के शरीर की रचना होती आ रही थी।जैसे कोई मनुष्य मरा और मरकर उसे घोड़ा बनना है तो जिस स्थान पर वह घोड़ा बनेगा उस स्थान पर यह जीव पहुंचा।पहुंचने के बाद घोड़े के शरीर का निर्माण हुआ।घोड़े के जैसे अंगोपांग बने।तो इसको रचने वाला कौन है? यदि किसी एक विधाता को मान लिया जाता तो उसमें अनेक आपत्तियां हैं।प्रथम तो यह बात है कि उसने कहां बैठ कर इस शरीर को बनाया? और वह भी शरीर वाला है या बिना शरीर का है? यदि शरीर वाला है तो उसके शरीर को किसने बनाया? यदि शरीर बनाया नहीं है तो जिसके शरीर नहीं है वह क्रिया ही क्या कर सकता है? और फिर उसने बनाया क्यों? क्या दया आयी इसलिए इन जीवों को बनाया? यदि दया की वजह से जीवों को बनाया तो उसे अंत तक दया निभानी चाहिए थी, लेकिन यह जीवों को दु:ख भी दे रहा है, नरक में भेज रहा है।तो अब उसकी दयालुता कहां गई? यदि वह खेल खेल में बना रहा है, उसे ऐसा बनाने में कुछ आनंद आ रहा है इसलिए अपने मौज के लिए बना रहा, तो अपने मौज के लिए दुनिया की रचना की जिससे जीव दु:खी हों, यह तो बड़े पुरूषों का काम नहीं।यह तो तुच्छ लोगों का काम है कि अपने मौज के लिए दूसरों पर चाहे कुछ भी अन्याय करें।इससे अच्छा तो यह था कि उन जीवों को वह बनाता ही नहीं तो वे दु:खी ही न होते।किसलिए बनाया? कोई इसका ठीक उत्तर नहीं बैठता।दूसरी बात यह है कि जीवों को बनाया तो किसी साधन से बनाया या कुछ भी न था और बना दिया? कुछ भी न हो और कुछ बन जाय, ऐसा तो त्रिकाल में भी नहीं हो सकता।अरे मिट्टी है तभी तो घड़ा बनेगा, कुछ भी न हो और घड़ा बन जाय ऐसा तो नहीं हो सकता और कुछ था तो वह था ही पहिले से फिर बनाया गया।एक नया परिणमन हो गया है।तो बहुत सी बातें विचारने पर यह सिद्ध होता है कि इस जगत को, इस जीव को, इस शरीर को किसी एक ने ही बनाया है, किंतु ये ही शरीर के परमाणु जो फुटकर फैले रहे थे वे ही इस मोही जीव का संसर्ग पाकर इस शरीर रूप में बन गए।उसका कारण है नाम कर्म का उदय।तो नामकर्म के उदय के निमित्त से यहां जीवों के शरीर की रचना होती थी और इस शरीर के कारण यह जीव स्थूल रहा करता था।जैसे- हम आप सब मोटे मोटे लोग बैठे हैं ना, सूक्ष्मता तो नहीं रही, इस जीव को पकड़ भी सकते, कोई भग रहा हो तो उसे पकड़कर बाँधा जा सकता।तो ऐसा स्थूलपना बन रहा था लेकिन अब नामकर्म नष्ट हो गया तो सिद्ध भगवंत वहां सूक्ष्म रूप से ही विराजमान है।अब यह स्थूलपना नहीं रहा।जैसे यहां किसी को देखकर हम कह बैठते हैं कि यह अमुक है, इसको पकड़ लिया, बैठा लिया, बाँध दिया, यहां से अब अन्य कहीं जा सकता नहीं।जैसा व्यवहार यहां जीव के प्रति किया जा सकता था वह व्यवहार अब नहीं हो सकता है।वह अत्यंत सूक्ष्म है।

गोत्रकर्म के क्षय से परमगुणविकास- 7 वां कर्म है गोत्रकर्म, इस गोत्रकर्म के उदय के निमित्त से यह जीव ऊँच नीच कुल वाला कहलाता था, देवगति के सभी जीव उच्च कुल वाले कहलाते हैं देवों का नीच कुल नहीं होता, तिर्यन्च गति के जीव सभी नीच कुल के कहलाते हैं चाहे सिंह हो, चाहे बछड़ा हो, चाहे पेड़ हो, सभी नीच कहलाते हैं।केवल मनुष्यगति के जीवों में दोनों कुल संभव है।कोई मनुष्य कुल के कहलायेंगे, कोई उच्च कुल के कहलायेंगे।तो ये जो कुल से भेद हैं ये गोत्रकर्म के उदय से हो रहे हैं।अब सिद्ध भगवंत में गोत्रकर्म नहीं रहा, गोत्रकर्म के नष्ट होने से अब वहां अगुरूर्लघु गुण प्रकट हुआ है।अ मायने नहीं, गुरु मायने बड़ा, लघु मायने छोटा, वहां कोई सिद्ध छोटा है न बड़ा।सभी एक समान हैं।अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति, अनंत आनंद के धारी हैं।यहां से कई मुनि ऐसे मोक्ष गए हैं जिन्हें कोई लोग जान भी नहीं सके, पर वे मुनि मुक्त होने पर सिद्धों की भांति अनंत आनंद के धारी बने।अनंत चतुष्टय उनसे प्रकट हुए. जैसे ऋषभदेव, वर्द्धमान स्वामी आदिक मुक्त हुए ऐसे ही वे अनंते मुनि भी मुक्त हुए, उनमें कोई छोटे बड़े का भेद नहीं रहता।इसी कारण सिद्ध भगवंत में ये अगुरूर्लघु गुण प्रकट हुआ है।

अंतराय कर्म के क्षय से परमगुण विकास- 8 वें कर्म का नाम है अंतरायकर्म।अंतराय कर्म के उदय से इस जीव को बड़े विघ्न आ रहे थे।दान देना चाहते थे, पर दान न दे सके, दान देने के भाव ही नहीं पैदा हो पाते।कोई पुरूष तो ऐसे भी हुए हैं जो अपने मुख से भी कह डालते हैं कि मेरे पास धन बहुत है और मैं चाहता हूं कि कुछ दान में लगाऊँ, पर मेरे हाथ से दान दिया नहीं जाता रहा।चाहते हुए भी मैं अपने हाथ से किसी को दान नहीं दे सकता।कोई जबरदस्ती उसका धन छुडाकर दान में लगा दे तो वह उसका कुछ बुरा नहीं मानता, उसमें वह खुश है, पर अपने हाथों से दान नहीं दिया जाता।यह क्या है? यह एक ऐसा विचित्र अंतराय का उदय है कि दान दे नहीं सकता।चाहता यह है कि मुझे इतना लाभ हो, पर लाभ नहीं हो पाता।लाभ होने की स्थिति भी आये तो उस लाभ में विघ्न हो जाते हैं।यह जीव चाहता है कि मैं खूब खाऊँ, पर खाया नहीं जाता।बहुत से रईस लोग ऐसे हैं कि जो चाहते हैं कि मैं खूब खाऊँ, पर कोई रोग के कारण उनको खाना ही नहीं पचता, वे खा ही नहीं सकते तो क्या है? यह एक अंतराय का उदय है।इसी प्रकार उपभोग में भी विघ्न आता है।उपभोग उन पदार्थों को कहते हैं जो बारबार भोगने में आ सकते हैं, जैसे चारपाई, परिजन, घर ये उपभोग कहलाते हैं इनमें भी विघ्न आ जाता है।वह उन भोग को नहीं भोग सकता है।शक्ति में विघ्न आ गया।तो ये सब अंतराय होते होते संसार अवस्था में अंतराय कर्म का उदय था लेकिन वे अंतराय कर्म नष्ट हो गए, सिद्ध भगवान के अनंत शक्ति प्रकट हुई है।अब वे प्रतिक्षण अनंत आनंद भोगते रहते हैं।यह उनका एक सकल संन्यास है।तो प्रभु के ये 8 गुण उत्पन्न हुए हैं।ऐसे सम्यक्त्व आदिक 8 गुणों से सहित सिद्ध समूह को मैं नमस्कार करता हूं।


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