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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधिभक्ति - श्लोक 5

From जैनकोष



जन्मजन्मकृतं पापं जन्मकोटि समार्जितम्।

जन्ममृत्युजरामूलं हन्यते जिन-वंदनात् ।।5।।

जिनवंदन से जन्मजन्मकृत पाप का विघात- जिन स्वरूप की वंदना करने से जन्म–जन्म में किए गए पाप, करोड़ों जन्मों में अर्जित पाप जो कि जन्म जरा मरण के कारणभूत हैं वे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।जिन स्वरूप है निष्पाप।राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ ये पाप कहलाते हैं।इन पापों से रहित केवल ज्ञानमात्र स्वरूप है जिनका, परमात्मा, प्रभु का उस जिनस्वरूप का जो अभिनंदन करता है उस जिनस्वरूप को जो अपने उपयोग में विराजमान करता है उस उपयोग युक्त जीव में नया पाप भी नहीं आता और जो जन्म-जन्म में उत्पन्न किए गए पाप थे वे भी नष्ट हो जाते हैं।प्रथम तो यह देखिये कि उपयोग में जब प्रभुस्वरूप समाया हुआ है तो उस समय में काम, क्रोध, मान, माया, लोभादिक विकार घर नहीं कर पाते।तो तत्काल भी देखिये पाप नष्ट हो गए और जन्म–जन्म में जो इन पाप परिणामों के कारण अशुभ कर्म बँधे थे वे कर्म भी निर्जरा को प्राप्त हो जाते हैं।यह बात निमित्तनैमित्तिक विधि पर बिलकुल सही उतरने वाली है।जब जीव कषाय करता है तब कर्म बँधते हैं।तो जब जीव कषाय न करे तो कर्म न बँधेंगे।कषाय अति मंद हो तो मंद कर्म बँधेंगे।तो जिन-वंदना के समय में, प्रभुस्वरूप में अपना उपयोग लगाने के समय में विषय, कषाय, इच्छाओं का कहां अवकाश है? अथवा वह हो भी, तो है अव्यक्त, जब मंद उदय में हो तब नवीन कर्म भी मंद होंगे, न बँधेंगे और पूर्व में बँधे कर्म भी निर्जरा को प्राप्त होंगे।

जिनवंदन से पापक्षय के कारण का मर्म- जैसे गीली धोती में रेत (धूल) लग गई हो तो रेत (धूल) तुरंत भी लगी।कुछ देर बाद भी लगी, हवा चलती रही 15-20 मिनट तक धूल बराबर चिपटती रही, लेकिन जब धोती सूख गई तो जरा से झटके में ही सारी धूल झड़ जाती है।इसी प्रकार इस जीव में कषाय भाव के कारण जन्म-जन्म में पाप बँध रहे हैं, हजारों, लाखों, करोड़ों के पापकर्म अब भी इस जीव में पडे़ हुए हैं।वे सारे के सारे पापकर्म एक जिस काल में ज्ञानप्रकाश जग जाय और कषायों से भिन्न अविकार ज्ञानमात्र निज तत्त्व की दृष्टि रमे, ऐसे समय में करोड़ों जन्मों के भी पाप एक साथ क्षणभर में ही ध्वस्त हो जाते हैं।क्यों न खिरेंगे? निमित्तनैमित्तिक भाव है ऐसा।रसोई बनाने वाले को क्या कभी यह संदेह होता है कि कल तो रोटियां बन गयी थीं, अब भी बन सकेंगी या नहीं।सिगड़ी, आटा, कोयला, जल आदिक सभी सामग्रियां तैयार हैं फिर भी कोई सँदेह करे कि पता नहीं आज रोटियां बन पायगी या नहीं, ऐसा तो कोई नहीं करता।वह तो एक निमित्तनैमित्तिक भाव की बात है।तो ऐसे ही यह भी बिल्कुल निमित्तनैमित्तिक भाव की बात है, कषाय करेंगे तो कर्म बँधेंगे।कषायें न रहेंगी तो करोड़ों जन्मों के भी पापकर्म क्षणभर में खिर जायेंगे।तो जब निष्कषाय प्रभु के स्वरूप का ध्यान होता है, उपयोग में वह वीतराग सर्वज्ञ प्रभु समाया हुआ होता है तो वहां पापकर्म नहीं बँधते और इसी कारण करोड़ों जन्मों के भी पहिले के बँधे हुए पाप खिर जाते हैं।

सम्यग्ज्ञान की महिमा- सम्यग्ज्ञान की महिमा का तो कोई वर्णन कर ही नहीं सकता।जिन जीवों का संसार निकट है, जो भव्य जीव हैं, जिनका इस जन्म, जरा, मरण, शरीर इन सबसे छूटकारा मिलने का समय आया है।आयेगा चाहे करोड़ों वर्षों बाद, सागरों बाद, फिर भी वह निकट ही कहलाता है।अनंतकाल के सामने लाखों सागर बाद भी अगर मोक्ष मिलने की बात होती है तो वह निकट ही कहलायेगा।जिनका मोक्ष निकट है ऐसे पुरूषों को ज्ञानप्रकाश पाने की प्रीति उत्पन्न होती है।सबसे बड़ी विपदा तो जीवों पर छायी है परपदार्थों के प्रति सही ज्ञान न होना और इसी कारण पर को अपना मानना और पर की वृद्धि में, तृप्ति में, उन्नति में अपने को अहोभाग्य समझना, पुण्य समझना मेरा बड़ा अच्छा पुण्य का उदय है।जो विचारते हैं तुरंत काम होता है।अरे पुण्य का क्या उदय है, इससे क्या लाभ कि जो हम चाहें वह तुरंत हो जाय? इससे आत्मा को क्या मिलेगा? इससे क्या लाभ जो बिना यत्न के ही खूब धन संपदा की प्राप्ति हो रही है।आखिर वे सब परपदार्थ हैं, परपदार्थ में जो दृष्टि है, आकर्षण है, लगाव है वह तो विपदा है, वह तो अज्ञान है।उस अज्ञान के रहते हुए तो हमें भलाई की कोई आशा नहीं।इस जगत में संख्या तो मिथ्यादृष्टियों की, मोहियों की, अज्ञानियों की ज्यादा है।ज्ञान की रूचि वाले, कल्याण की रूचि वाले पुरूष तो करोड़ों में से एक दो ही मिलेंगे।तब यह भी एक विपदा है कि उन्हीं करोड़ों में तो रहना है जो मिथ्यात्व के रूचिया हैं, अज्ञान से जिनका लगाव है, ऐसे पुरूषों के बीच रह रहे हैं, यह भी एक बड़ी विकट समस्या है कि उनकी देन से बचे रहें और अपने आपमें अपने को संभाल रखें, यह भी बहुत बड़ा कठिन काम है और उन लाखों के वैभवों को, आराम को मौज को देखकर अपने धार्मिक ध्यान से विचलित न होना, यह भी बहुत अधिक सा काम है, किंतु जिसको अंतस्तत्त्व स्पष्ट हो गया वे कभी मान ही नहीं सकते दूसरी बात।

अनुभूत ज्ञानस्वरूप के ज्ञान की अविस्मृतरूपता- -जैसे जिसने कोई चीज आँखों से देख ली है और उसे कोई मना करे कि यह नहीं है तो वह तो उसे मान ही नहीं सकता, क्योंकि उसको प्रत्यक्ष हुआ है कि मैंने आँखों देखी है।किसी बच्चे के काम की चीज हो और वह अपने पिता की जेब में उस चीज को देख ले तो चाहे वह पिता उसे कितना ही मान करे कि वह चीज नहीं है मेरी जेब में, पर वह बच्चा कैसे माने? क्योंकि उसने तो अपनी आँखों उस चीज को देख लिया।तो आँखों से भी जबरदस्त प्रमाण है स्वसम्वेदन का।आँखों देखी बात चाहे झूठ हो जाय, कानों सुनी बात चाहे झूठ हो जाय, पर स्वसम्वेदन में अनुभव में उतरी हुई बात झूठ नहीं हो सकती।वह प्रमाणभूत है।इंद्रियज ज्ञानों से भी प्रबल प्रमाण है स्वसम्वेदन ज्ञान।तो जिस जीव को एक ज्ञानप्रकाश के और शांति के वातावरण में सहज ही समस्त परतत्त्वों से उपेक्षा हो जाने के कारण अपने आपमें सहज ज्ञानस्वरूप का ज्ञान में सम्वेदन हुआ है, अनुभव हुआ है।निर्विकल्प स्थिति से जिसका अनुभव किया है उस ज्ञानप्रकाश का अनुभव होने पर और उसके साथ ही साथ अलौकिक स्वाधीन अनुपम आनंद प्राप्त करने पर फिर विश्व के मायामय वैभव अथवा कोई भी सांसारिक बात फिसलाना चाहे तो फिसला नहीं सकता।इस ही जीव के यदि पापकर्म का उदय आये और ऐसा आवरण आये, ऐसा दर्शन मोह का ही उदय आ जाय कि जिसके अपने आपके सहज स्वरूप के संवेदन की स्मृति तक भी न रहे अर्थात् स्वयं ही मिथ्यात्वी अज्ञानी बने तो भले ही पर विषयों में हित मानने की बुद्धि कर लें, लेकिन यहां भी यह नियम है कि जिस जीव ने एक बार भी किसी भी समय निर्विकल्प अविकार ज्ञानज्योतिमात्र अंतस्तत्त्व का अनुभव कर लिया है कर्मोदयवश चाहे वह अपने मार्ग से चाहे गिर भी जाय तो भी उसका उद्धार निश्चित है।फिर पायेगा ज्ञानप्रकाश।

शरणभूत ज्ञायकस्वरूप सहज अंतस्तत्त्व का मंगलमय आग्रह- भैया ! समझ लीजिए- इस अनंतकाल में इस विस्तृत लोक में हम आपको शरण केवल एक ज्ञान का अनुभव है, दूसरी कोई बात शरण नहीं है।जैसे कोई बालक कुछ चीज लेने पर रूठ जाय, हमको तो यह चीज इतनी लेनी है।अधिक लेनी है और माँ बाप न दें, तथा वह बच्चा भी उस चीज के लेने में बहुत हैरान हो जाय तो उस बच्चे की दृष्टि भी उस चीज के लेने से एक दम दूर हो जाती है।फिर उसके माँ बाप चाहे कितना ही समझायें पर वह उस चीज को लेना स्वीकार नहीं करता।तो इसी प्रकार यह जगत का वैभव है।जब इस वैभव की चाह है तब यह प्राप्त नहीं होता और जब इस वैभव की चाह न रही तब यह प्राप्त होता है।मिथ्यादृष्टियों को धन वैभव अधिक नहीं प्राप्त होता।सम्यग्दृष्टि, ज्ञानी, शुद्धतत्त्व के दार्शनिकों का ही ऐसा पुण्य का उदय होता है कि उन्हें सर्वोत्कृष्ट वैभव मिलता है।सो जब अज्ञानी थे, धन वैभव की खूब चाह कर रहे थे तब धन वैभव की प्राप्ति नहीं हो रही थी और जब ज्ञानप्रकाश जगा, धन वैभव की चाह न रही तो अटूट वैभव की प्राप्ति होती है।इंद्र भी उनकी सेवा करते हैं तब फिर इस वैभव की चाह करने से लाभ क्या? सबसे महान पाप अज्ञान का है, मिथ्यात्व का है।मिथ्यात्व में तो पाप निरंतर बँध ही रहे हैं कठिन से कठिन।चाहे वह नाम का ही धर्म कर रहे हों।चाहे गुरूजनों की सेवा में अपना तन, मन, धन, न्यौछावर कर रहे हों, सब कुछ कर रहे हों, पर यदि मिथ्यात्व है तो मिथ्यात्व के कारण रौद्रपाप का बंध निरंतर हो रहा है।एक उस संधि की जगह पर शिथिल होने और दृढ़ होने भर का अंतर है और ज्ञानी जीव जिसको ज्ञानप्रकाश जगा है, अविकार अंतस्तत्त्व का अनुभव किया है वह कभी विनोद भी हो, बाह्य प्रसंग में भी हो, किसी भी स्थिति में हो उसके वे कर्म बँधते ही नहीं हैं।जो मिथ्यात्व में बँधा करते हैं।जो भी कर्म बँधते हैं वे भी शिथिल अनुभाग को लेकर बँधते हैं।यह सब है सहज ज्ञान ज्योतिमात्र अंतस्तत्त्व के दर्शन का प्रताप।

निर्नाम सहज अंतस्तत्त्व की प्रभुता- इसी सहज अंतस्तत्त्व का नाम है प्रभु जिनेंद्रदेव।नाम रखे बिना तो व्यवहार चलता नहीं, जिसका नाम न हो सके, जो निर्नाम है उसका भी नाम रखना ही पड़ेगा और उससे फिर संकेत लेकर लोगों की प्रवृत्ति होगी।इस मंगल लोकोत्तम शरणभूत अंतस्तत्त्व का कोई नाम नहीं और नाम बिना कुछ बोला ही नहीं जा सकता।अंतस्तत्त्व शब्द बोला वही एक नाम हो गया।कुछ भी बोले वही एक नाम हो गया तो यह संकेत की चीज है।वस्तु का नाम नहीं है।पदार्थ का नाम नहीं है, इस बात को तो जरा दूर रहने दो।यहां ही जितने मनुष्य हैं इन मनुष्यों का कोई नाम नहीं है।हम आप जितने भी लोग यहां बैठे हुए हैं इनका किसी का भी कुछ नाम नहीं है।शरीर की ओर से, पदार्थों की ओर से कोई नाम बना हो तो बतलावो।लोगों ने कल्पना किया नाम धर दिया, सो नाम चल उठा।शरीर में रूप तो है, पर नाम नहीं है।किसी विदेशी व्यक्ति को आप यहाँ बुला लें और उससे यहाँ के किसी को दिखाकर उसका नाम पूछें तो वह उसका नाम बता सकता है क्या? नहीं बता सकता।वह तो शरीर के इस काले, पीले आदिक वर्ण को ही जान पायेगा पर उसका नाम नहीं बता सकता, क्योंकि उसका कुछ नाम है ही नहीं।गंध भी वह जान लेगा, क्योंकि शरीर में गंध है, पर नाम नहीं जान सकता।शरीर को निरखकर कोई किसी का नाम तो नहीं बता सकता, क्योंकि वस्तु का कुछ नाम ही नहीं है।नाम तो व्यवहार का काम चलाने के लिए रख लिया जाता है।तो यहां तो नाम लेकर लोग उसे बाँध देते हैं लेकिन जो सहज ज्ञानस्वरूप है, मंगल, लोकोत्तम शरणभूत अंतस्तत्त्व है उसको बाँध भी नहीं सकते किसी नाम से; फिर भी बाँधना तो पड़ता ही है।तो यह अविकार सहज आत्मा अपने आपसे अपने आप ही सत्त्व के कारण जैसा स्वयं है वैसा ही रहे और बात संग में नहीं लिपटे, वह है प्रभु।

जिनवंदन से पापक्षय एवं समाधिलाभ- प्रभु का नाम जिन इसलिए रख दिया कि वह आत्मा पहिले विषय कषायों में रत था और उसने विषय कषायों को जीता, दूर किया, रागद्वेष हटाया तो वह जिन कहलाया।जो विकारों को जीत ले दूर कर दे उसका नाम जिन है।वस्तुत: प्रभु का कोई नाम नहीं है।तो ऐसा जो अविकार ज्ञानानंदस्वरूप है उस स्वरूप का वंदना से, नमन से उपयोग में निरंतर ध्याये जाने से करोड़ों जन्मों के भी पाप कट जाते हैं।जिन पापों का काम था इस जीव का जन्म जरा मरण बनाते रहना, तो इसका अर्थ है कि उस ज्ञानज्योति के अनुभव के प्रसाद से जन्म जरा मरण की परंपरा समाप्त हो जाती है।समाधिभक्ति में यह समाधिभक्त संत उस अंतस्तत्त्व की भावना में लग रहा है कि जिसके प्रसाद से समताभाव, समाधिभाव जागृत होता है।यह अंतरंग की बात है, दिखावट की बात नहीं है।जिसका होनहार भला है उसमें गुप्त ही गुप्त अंदर में यह बात बन जाती है।प्रयत्न से न बने, सहज बने, फिर भी काम तो प्रयत्न करने का है।प्रयत्न करते हुए जब भी सहज बन सके बन जाय, किंतु अपना तो पुरूषार्थ करने का काम है।

समाधिभाव के प्रयत्नों में शास्त्राभ्यास व प्रभुभक्ति का स्थान- समाधिलाभ का पुरूषार्थ यही है जैसा कि समाधिभक्ति के दूसरे छंद में बतलाया था कि मुझे 7 बातें जन्म-जन्म में प्राप्त हों।वे 7 बातें क्या हैं? जो समाधिभाव के वास्तविक प्रयत्न हैं।उन 7 बातों की आज्ञा मानकर कोई अपना जीवन बिताये तो उसको नियम से कल्याण लाभ होगा।वे 7 बातें ये हैं शास्त्र का अभ्यास बनाना- कोई शास्त्र पढ़ता हो उसे सुनना, स्वयं बांचना सुनते सुनाते हुये में तत्त्व का गुनगुनाना, चित्त में रखे रहना, उस शास्त्र का जो निचोड़ है, जो कुछ थोड़े से शब्दों में अपना निष्कर्ष निकला है उसको ध्यान में बनाये रखना, थोड़े से मंत्रजाप से या उस सार बात के वचन से चित्त उसी में रमाये रहना, यह बड़ी श्रद्धा का सूचक है।शरीर में निरंतर संकट है।यहां शरण लेने योग्य कुछ भी पदार्थ नहीं है।इस भाव की सूचना मिलती है प्रभुभक्ति में।जो श्रावक प्रभुभक्ति करते आये हैं उनको निरख करके यही स्पष्ट ज्ञान होता है कि इनका कहीं मन नहीं लगा, पर की किसी चीज में, सो देखो घर छोड़कर ये मंदिर में आये और प्रभुस्तवन में लग गए।लगता तो ऐसा ही है, अब उनका दिल जाने कि वे क्या कर रहे हैं, पर जो लोग भी मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं उनकी मुद्रा को देखकर, उनके गानतान को निरखकर तो ऐसा ही लगता है कि ये बड़े उज्जवल पुरूष हैं, इनका घर में कहीं मन नहीं लगा।इन्हें कोई शरण न जगा।सब उपद्रव जँचे, सारे संकट जँचे, सो उन संकटों को टाल करके और यहां प्रभु शरण में आये हैं और प्रभुभक्ति कर रहे हैं, तो जिनेंद्रदेव के स्मरण से, प्रभुभजन से श्रद्धा की बात और भी बढ़ती जाती है।

समाधिभाव की पात्रता बनाये रहने के लिये सत्संग, गुणकथा, दोषमौन, सुवचन का स्थान- सदा सज्जन पुरूषों के साथ संगति रहना- वे बड़भागी पुरूष हैं जिनको उत्तम पुरूषों का संग मिलता रहता है।मंदिर में गए वहाँ उत्तम पुरूषों का संग, रास्ते में भी जहाँ कुछ खड़े होते हैं, कुछ बोलते चालते हैं वहां उत्तम संग, घर में गए, घर के लोग भी धार्मिक, तो वह भी उत्तम संग।जो जिस बात का अर्थी है उसको वह बात स्थान-स्थान पर भी मिल सकती है जो सत्संग का ही अभिलाषी है उसको थोडे़-थोडे़ समय के बाद भी रोज-रोज अनेक सत्संग मिल सकते हैं।क्योंकि उसकी प्रवृत्ति ही इसी प्रकार की होगी और जो महाविषयकषायी है उसको सर्वत्र उस तरह के साधन मिलते हैं।मिलते क्या, वह उस तरह के साधन में रमता है।जिस संग में आत्मा को होश रहे, पापों से हट सके, साधुजनों की उपासना में चित्त लगे, वह संग उत्तम है, हितकारी है।अत: सत्संग का यत्न करना।बोले तो गुण की बात बोले, दोष में चुपचाप रहे, किसी का दोषवाद न करे।बोले तो प्रियहित वचन बोले।ये तो बाहरी पुरूषार्थ हैं और इन पुरूषार्थों के बीच अथवा बाद जब चाहें आत्मतत्त्व में भावना जागृत रखें।

समाधिभाव के लिये आत्मतत्त्वभावना का प्राधान्य- आत्मभावना की वृत्ति होगी तो फिर कल्याण कैसे न होगा? जो घोड़ा चल सकता है वह कुमार्ग में चल रहा हो तो उसको वश में करके सन्मार्ग पर भी तो लगाया जा सकता है और बच्चों के खेलने के लकड़ी के घोड़े जिनमें कोई चाल ही नहीं है उन्हें कैसे सन्मार्ग में लाया जा सकता है? कोई पुरूष कितनी भी गिरी हालत में आ गया हो, विषय कषाय मोह रागद्वेष जंजाल पाप के फंद में आ गया हो लेकिन उसमें चलने की ताकत है तो उसे वश करके सन्मार्ग में लगाया जा सकता है।कोई यह सोचे कि जिंदगी भर तो हमने ज्ञानसाधना नहीं किया, इतनी जिंदगी व्यतीत हो गयी, हम विधि सहित किसी धर्म के ढंग में नहीं चले तो अब बुढ़ापे में क्या चलेंगे, ऐसा ख्याल छोड़ देना चाहिए।बहुत दिनों तक सन्मार्ग में नहीं लग सके तो अब न लग सकेंगे यह भ्रम छोड़ दीजिए।अगर यह नियम बनाते हैं कि बहुत दिन तक जो कुमार्ग में रहा उसका भला होना असंभव है तो ऐसे तो सारे जीव हैं।अनादिकाल से अनंतकाल तक कुमार्ग में लगे।10-20-50 वर्ष की ही बात क्यों कहते? तो नहीं की आत्मतत्त्व की भावना, सारा समय गुजार दिया।गुजरने दो, शिथिल हो गए होने दो, शरीर से नहीं सोचना है आत्मतत्त्व की बात।सोचने वाला तो आत्मा है।वह सोचेगा आत्मतत्त्व की बात।वह ज्यों का त्यों है।शरीर बूढ़ा हो गया तो क्या हुआ? जानने के बाद जो भी करे उसकी मनाही न होगी, वह जान लेगा।तो सर्व कुछ करते हुए भी हमें आत्मतत्त्व में भावना बनानी है।ये सब बातें हमें प्राप्त हुई हैं, होंगी, हो रही हैं वीतराग सर्वज्ञदेव आप्त के स्त्रोत पाप से।वह है एक ज्ञानज्योति पुन्ज तो उस प्रभु का स्मरण गुणों का वंदन करने से उपाय भी बनता है और करोड़ों जन्म के उपार्जित किए हुए कर्म भी कट जाते हैं।


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