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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधिभक्ति - श्लोक 7

From जैनकोष



तब पादौ मम ह्दये मम ह्रदयं तव पदद्वये लीनम्।

तिष्ठतु जिनेंद्र तावद्यावन्निर्वाण संप्राप्ति:।।7।।

नि:संकट ज्ञानपिंड की शरण्यता- हे जिनेंद्र देव ! जब तक मुझे निर्वाण की प्राप्ति न हो तब तक आपके चरणद्वय मेरे हृदय में विराजें और मेरा मन आपके चरणद्वय में लीन रहे।जब हम किसी को अपने ज्ञान में लें, उपयोग में रखें, इसके सिवाय कुछ कर ही नहीं सकते हैं तब यह विवेक रखना बहुत आवश्यक है कि हम किसको उपयोग में लें तो हमारे संकट दूर हो सकते है? लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जिसको उपयोग में लेने से हमारे संकट टल सके।हमारे संकट तो खुद के संकट सहित ज्ञान स्वभाव के ज्ञान से ही टल सकते हैं।कारण यह है कि संकट तो कुछ हैं ही नहीं, केवल पर के संबंध में जो विकल्प बनायें जा रहे हैं वही मात्र संकट हैं और उन ही विकल्पों रूप कार्य करके हम दु:खी रहा करते हैं।तो पर के संबंध में जो हम अनेक प्रकार के विकल्प बनाया करते हैं उन विकल्पों को हटाना है अपने संकट दूर करने के लिए।ये विकल्प तब तक नहीं हट सकते जब तक विकल्परहित केवल ज्ञानज्योतिस्वरूप तत्त्व को उपयोग में न ले पायें।यह बात शत प्रतिशत यथार्थ है।

यथासंभव धर्मपालन में अभी से ही लगने की आवश्यकता- भैया ! बाह्य दृष्टि करके एक तो काम नहीं बनता।कोई सोचे कि चलो अभी बाह्य दृष्टि कर लें, पर में रम लें, खूब राग कर लें, खूब मोह कर लें थोड़े दिनों के बाद में इन सब बाह्य प्रसंगों को छोड़कर केवल धर्मकार्य में जुट जायेंगे, तो ऐसा सोचना गलत है।इस कारण किसी भी स्थिति में हों चाहे बड़ा वैभव कमा लिया हो, चाहे कोई बड़ा ऊँचा काम कर लिया हो दुकान का अथवा किसी काम काज का और जहाँ ऐसा लगता है कि हम फंसे हुये हैं, ये काम निपटें तो हम निपट सकते हैं।चाहे कैसी भी स्थितियाँ हों, सर्व स्थितियों में मोह का तुरंत त्याग करना ही भला है अन्यथा ऐसी स्थिति कभी न मिल सकेगी कि जहाँ हम आराम से रहकर उन सब अधर्म के, पाप के, मोह के कार्यों को त्याग दें और अपने आपके स्वरूप में रम सकें।यह स्थिति पर की ओर से हम सुविधा चाह करके प्राप्त करना चाहे तो यह बिलकुल असंभव है।इसी कारण जो लोग यह सोचते हैं कि हमको दो चार वर्ष की और देर है घर गृहस्थी के झंझटों से छूटने में, उसके बाद तो फिर धर्म कार्यों में ही पूरे तौर से लगेंगे ऐसा उनका सोचना केवल स्वप्न भर रह जाता है, अत: कर्तव्य यह है कि धर्म की अपार रूचि हुई है तो आज जो स्थिति है और सुविधा है उसके अनुकूल अभी से ही करने लगें और अगर अभी से नहीं करते हैं तो समझिये कि सही मायने में अभी धर्म की धुन नहीं हुई है।अरे आगे ज्यादा धर्म कर लिया जायेगा, यह तो ठीक है पर अभी भी तो जैसी स्थिति है उसके अनुकूल धर्म करते रहना चाहिये।ऐसा तो किसी से किया नहीं जाता और खूब धर्म आगे करूँगा ऐसी दृष्टि रखकर जीवन के अमूल्य क्षण व्यर्थ ही व्यतीत किए जायें और आगे के स्वप्न देखे जायें, यह तो कोई भली बात नहीं है।

वीतराग सर्वज्ञदेव की उपासनीयता- इस लोक में सिवाय एक अपने आत्मा की दृष्टि करने के अन्य कोई शरण नहीं है।हाँ प्रभु जिनेंद्र देव, वीतराग, सर्वज्ञ ज्ञानपुंज की उपासना हमें इस कारण करनी चाहिये कि चूँकि प्रभु का स्वरूप, मेरा स्वरूप और प्राणी मात्र का स्वरूप सबका एक समान है, लेकिन प्रभु में वह स्वरूप व्यक्त रूप से प्रकट हो चुका है और उन्हें अनंत आनंद की प्राप्ति हो गई है उन प्रभु के स्वरूप का स्मरण करने से अपने आपमें अपने स्वरूप के स्मरण से बल ही मिलता है, इस कारण मेरा मेरे सिवाय यदि कोई स्मरण के लायक है, पूज्य है तो वह है एक वीतराग सर्वज्ञदेव।सो हे नाथ ! जब तक मुझे निर्विकल्प समाधि नहीं प्राप्त हुई है तब तक आपके चरणकमल मेरे हृदय में बसे रहें और निरंतर आपका स्मरण रहे।आपके स्वरूप का स्मरण रहेगा तो हमारी रक्षा है।उसी से हमारे दु:ख दूर होंगे।

अंत: परमस्वास्थ्य की भावना- हे प्रभो ! ऐसी अवस्था हो, ऐसी निवृत्ति हो, ऐसा संग समागम हो कि जिससे वीतराग सर्वज्ञदेव के उस शुद्धस्वरूप का ध्यान रहे जिसमें रागद्वेष नहीं।भैया ! विकाररहित जो ज्ञायकस्वरूप है, अपना सहजस्वरूप है उस पर दृष्टि जाय तो वह ज्ञान उस समय वीतराग है।होंगे राग, पर जैसे सिनेमा के पर्दे पर चित्र आ जाते हैं फिर भी वह पर्दा (सूतपुन्ज) अपने आपमें उसी रूप है इसी प्रकार जब उपयोग रागद्वेष रहित ज्ञानस्वरूप पर पहुंचता है उस समय इस ज्ञानस्वभाव को जानने वाला ज्ञान, इसका उपयोग, वह भी वीतराग है।होंगे रागादिक विकार, पर यह उपयोग उनका ग्रहण नहीं कर रहा।उपयोग तो अपने ज्ञानस्वरूप का ग्रहण कर रहा है।रागद्वेष रहित है, ऐसा ज्ञानस्वरूप यदि अपने उपयोग में रहे तो फिर वहां कोई संकट नहीं और उसे भूलकर अगर उपयोग पर की ओर लग जाता है तो फिर सारे संकट आ जाते हैं।जिन योगी पुरूषों ने, बड़े तीर्थंकर चक्रवर्तियों ने सब कुछ बाह्य चीजें त्यागीं, नौकर, चाकर, भोजन, वस्त्रादिक कुछ भी उनके पास न थे, फिर भी वे अपने सहज ज्ञायकस्वरूप में ऐसे लीन हो गए कि जहां ध्यान ध्याता ध्येय का कुछ भी अंतर नहीं है, ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय का भी भेद नहीं है।कौन जान रहा, किसे जान रहा, किसके द्वारा जान रहा, इनमें कोई भेद न रहा, केवल एक पवित्र अनुभूति स्थिति रह गई।यह एक ज्ञानस्वभाव अपनी सहज परिणति रूप हो जाता है, इससे उनके रातदिन ऐसे गुजरते हैं, ऐसे कटते हैं कि उन्हें कुछ पता ही नहीं रहता।यहाँ के लोग तो बाट देखते हैं कि अभी तो बड़ी रात है अथवा बड़ा दिन है, लेकिन अपने आपके सहजस्वरूप का लगाव, अपने सहज शुद्ध ज्ञायकस्वभाव की दृष्टि ऐसा पवित्र काम है कि इस काम में न तो दिन मालूम पड़ता है और न रात मालूम पड़ती है।समय यों ही गुजर जाता है।जैसे स्वर्गवासी देवताओं का सागरों का समय यों ही गुजर जाता है।उन्हें यह ध्यान नहीं रह पाता कि यह सारा समय कैसे गुजर गया? उनका तो जीवन गुजरता है राग और विषय साधनों के प्रेम में और इन योगी संन्यासियों का इतना लंबा समय गुजर जाता है अपने आपके शुद्धस्वभाव की उपासना में।

भैया ! करने योग्य काम तो एक यही है कि आत्मतत्त्व का परिज्ञान करें और उसमें तृप्त रहें।न करते बने तो इतनी श्रद्धा तो होनी ही चाहिये कि करने योग्य काम तो एक यही है।लोक में दूसरा कार्य इस जीव के हित के लिए कोई नहीं पडा़ हुआ है।श्रद्धा और प्रतीति भी यदि पूरे तौर से नहीं बन रही है तो जानकारी के बल पर उसकी चर्चा करें, उसकी जिज्ञासा बनायें।कुछ थोड़ा बहुत तो समझ में आता ही है कि ऐसी जब मात्र जानन की परिणति होती है तो जीव को कोई संकट नहीं आता।बाह्य पदार्थों का संयोग क्षणमात्र का है।एक दिन का भी भरोसा नहीं है, ऐसे विनाशीक क्षणिक बाह्य पदार्थों में स्नेह करने से, मोह बुद्धि से इस कुदृष्टि का, अज्ञान का ऐसा सिलसिला चल उठेगा कि फिर हम अपने आत्मस्वरूप की चर्चा के लायक भी न रह सकेंगे।इस कारण यह बड़ी संभाल वाली स्थिति है।हम उस ज्ञानस्वरूप की चर्चा करें, उस ज्ञानस्वरूप को चर्चा में अपनी प्रतीति बनायें।इस ज्ञानस्वरूप की चर्चा प्रीतिपूर्वक कोई सुने तो वह नियम से भव्य है।ऐसा आचार्यों का बड़े घोष के साथ कथन है।इस चर्चा के माध्यम से अपने आपके भीतर अंतरंग में इस ज्ञानस्वरूप के दर्शन का प्रयास जो करता है वह नियम से भव्य है।कर्मोदय भव-भव में आ रहे हैं और उन कर्मोदयों का उचित परिणमन चल रहा है, कैसी-कैसी भावनायें बदलती हैं, किस-किस तरह से पर की ओर हमारा ख्याल बढ़ता है, ये सारी बातें होकर भी घबराहट नहीं है, क्योंकि जान लिया है कि मेरे आत्मा का ज्ञानरूस्वरूप सहज शुद्ध है और वही मात्र और आखिर वही प्रकट हो करके रहेगा।ये बाहरी कलंक, बाहरी दृष्टियां, बाहरी बंधन कर्म और शरीर का संयोग ये कब तक परेशान करेंगे? ये तो पर चीजें हैं।पर हैं इसलिए ये नियम से छूटकर रहेंगे, ऐसी भीतर में ज्ञान की भावना है और अपने आपको बड़ी दृढ़ श्रद्धा से यों तक रहा है कि मैं तो केवल ज्ञानस्वरूप हूं।विकारों से न्यारा, कर्मों से न्यारा, शरीर से न्यारा, बाह्य समस्त समागमों से न्यारा अमूर्त केवल ज्ञानस्वरूप मैं हूं।इस और जिसका लगाव लग गया और 'यही मैं हूं' ऐसा मानकर रह गया उसको संसार के संकट फिर नहीं सता सकते।तो यही स्वरूप है प्रभु का, इसलिए प्रभु से अभ्यर्थना की जा रही है कि हे प्रभो ! जब तक मेरी निर्विकल्प स्थिति न बने, जब तक मोक्ष की प्राप्ति न हो तब तक आपके दोनों चरण मेरे हृदय में रहें।मेरा हृदय आपके चरणों में रहें।यहाँ चरणों से मतलब औपाधिक शरीर के उस अंग पर न ले जायें और हृदय से मतलब द्रव्य, मन, शरीर रचना, इस पर न ले जायें, किंतु दो चरण क्या है प्रभु के? प्रभु के वे दो चरण हैं ज्ञान और दर्शन।उन चरणों का तो मेरे ज्ञान में निवास रहे।हृदय का मतलब ज्ञान का है।चूँकि रूचिपूर्वक मुझे उन चरणों को अपने ज्ञान में रखना है इस कारण हृदय कह करके वर्णन किया है।क्योंकि लोकप्रसिद्धि यह है कि हृदय का संबंध है प्रेम से और दिमाग का संबंध है ज्ञान से।तो रूचिपूर्वक प्रभु के दोनों चरण मेरे ज्ञान में रहें, इस स्थिति के लायक ही तो मैं हूं इसलिए यही चाह सकता हूं।तो उस ज्ञान से हृदय की यहां उपमा दी है और चरणद्वय की उपमा इस ज्ञानदर्शन से दी है।हे ज्ञानपूंज प्रभु ! आपका सहज ज्ञान, सहज दर्शन मेरे उपयोग में निवास करे और मेरा उपयोग आपके सहज ज्ञान और सहज दर्शन में बना रहे, यही मात्र मैं चाहता हूं और कुछ मेरी वान्छा नहीं है।


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