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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:सहजपरमात्मतत्त्व - गाथा 1

From जैनकोष



यस्मिन सुधाम्नि निरता गतभेदभावाः, प्राप्स्यंति चापुरचलं सहजं सुशर्म ।

एकस्वरूपममलं परिणाममूलं, जुद्धं चिदस्मि सहजं परमात्मतत्त्वम् ।।1।।

अभेद अंतस्तत्त्व की उपासना―मैं क्या हूं? इसका चिंतन इस स्तवन में किया गया है । में वह शुद्ध सहज चित्स्वरूप परमात्मतत्त्व हूँ जिसमें कि निरत होकर, भेदभाव से रहित होकर भव्य आत्माओं ने अचल सहज अनंत आनंद को प्राप्त किया और जो इस सुधाम में इस चैतन्य तेज में निरत हो रहे हैं वे इस अनंत आनंद को प्राप्त करते हैं, में हूँ शुद्ध चेतन । जैसे किसी चीज में सार देखा जाता है तो जो उस चीज के सही सत्त्व से न आया हो और किसी कारण से आ गया हो तो उसको चित्त से हटाकर केवल उस वस्तु को निरखने से सारतत्त्व ज्ञात होता है । आत्मा में सार तत्त्व है चिद्भाव, इस भाव के कारण यह आत्मा अपने विशुद्ध आनंद का अनुभव कर सकता है । संसार के झंझट अनंत हैं, अनेक हैं । उन झंझटों में से एक भी झंझट न रह सके, ऐसा कोई व्यवसाय है तो वह इस शुद्ध चैतन्यस्वरूप का अनुभव ही है । यह शुद्ध चित्स्वरूप एक उत्तम धाम है । मेरा स्वरूप एक उत्तम धाम है । ऐसा कौनसा मेरा घर है जिसमें मैं पहुंच जाऊं तो सर्व बाधाओं से रहित हो जाऊँ? यहाँ मैं का अर्थ है उपयोग और धाम का अर्थ है चित्स्वरूप । यह मैं उपयोग अपने चित्स्वरूप में पहुंच जाऊँ और ऐसी धुन रखकर, ऐसा लीन होकर जिस खुद के धाम में भी में भेद न कर सकूं जहाँ यह मेरे में ज्ञान है, दर्शन है, चारित्र है, आनंद है ऐसा विशुद्ध भेद भी न उत्पन्न हो । यों अभेद भाव से इस चैतन्य धाम में निरत होऊँ तो मेरा कल्याण है । इसके अतिरिक्त जो-जो कुछ भी बातें आती विकल्प में, चित्त में, वे सारी असार बातें हैं । खेद यह है कि जिस मुझ सहज चित्स्वरूप को कोई पहिचानता तक भी नहीं है ऐसे लौकिक समुदाय में यह जीव भ्रम करके कि ये लोग मुझे जानते हैं, पहिचानते हैं, अपने आपकी पोजीशन सम्हालने का विकल्प उठाकर अपने आपके स्वरूप से अपने को दूर बनाये रहा करता है । तो उस पर खेद इस बात का है कि आनंद का धाम होने पर भी अपने उपयोग में यह आनंद से रीता हो रहा है । मैं वह शुद्ध चैतन्य तेज हूँ जिस उत्तम धाम में निरत होकर, भेदभाव से दूर होकर निश्चल सहज विशुद्ध आत्मीय आनंद को आत्मा प्राप्त करता है ।

अभेद अंतस्तत्त्व की उपासना का प्रसाद―अब तक जितने भी सिद्ध हुए हैं उन सब भगवंतों ने किया क्या था इस संसार अवस्था में कि संसार से, जन्ममरण से छूटकर सदा के लिए अनंत आनंदमग्न हो गए । यही किया । सर्वप्रथम नय और प्रमाण के बोधों में वस्तु के स्वरूप का परिचय प्राप्त करें । जब वस्तु के स्वरूप का परिचय होगा, मेरा परिचय होगा तो मैं स्वयं समझ जाऊँगा कि यह तो मेरा स्वभाव है और यह परभाव है । केवल एक सामान्य अविलक्षण, अवस्तु जो चित्प्रतिभास है तन्मात्र मैं हूँ । जो प्रभु हुए हैं ऐसे ही तो प्रकट हो गए हैं । अब दोष ओर आवरण दूर होने से उनके अनंत ज्ञान हो गया । हो जावो अनंत ज्ञान, होना पड़ता है, पर न हो अनंत ज्ञान तो उससे क्या? प्रभु अनंत ज्ञान करके कौनसा लाभ लूट लेते हैं? उनका लाभ तो शुद्ध चिन्मात्र रहने के कारण है । रागद्वेषादिक विकारों से रहित होने का उनको लाभ है । अब अविकार दशा में रहने पर स्वरूप ही ऐसा है चेतन का कि इसके ऐसा असीम अतुल विकास हो जाता है कि तीन लोक तीन काल समस्त विश्व इसके ज्ञान में झलकता है । जब तक यह जीव चाहता है कि मेरा ज्ञान बड़े, सारे विश्व की बात मैं जान जाऊँ तब तक कुछ नहीं जान पाता । जब ही ये आकांक्षायें और ऐसी ही अन्य समस्त आकांक्षायें दूर हो जाती हैं, उस ज्ञान में वह प्रताप जगता है कि सारा विश्व इसके ज्ञान में आ जाता है ।

वास्तविक अनुभव और आनंद―भैया ! संसार में सुख क्या है? जब तक कुछ चाहो तब तक प्राप्ति नहीं है और जब कुछ न चाहो तब सब कुछ प्राप्ति है । स्वरूप सिद्धांत से भी यही बात है । चाह जीव को उत्पन्न होती ही कब है? जब जिसकी चाह है उसका मिलन न हो । मिलन है तो तत्संबंधी चाह ही क्यों होगी? तो यह सिद्धांत का नियम है कि जिस समय इच्छा है उस समय वस्तु नहीं है, भोगोपभोग नहीं है जिस काल में वस्तु है, भोगोपभोग है उस काल में तद᳭विषयक वांछा नहीं है । भले ही फिर अन्य चीज की वांछा कर ले, पर तत्संबंधी वांछा तो नहीं रहती । सारी समस्या इस जीव की यहाँ अटकी हुई है । वह कौनसी अटक है? संधि के बीच में वह कौनसा विश्व पड़ा है कि जिसके कारण हम और प्रभु में इतना महान् अंतर है कि हम तो पेड़ पौधे, कीट पतिंगा, पशु पक्षी, मनुष्य आदिक योनियों में जन्ममरण कर चक्र लगा रहे हैं, भवभ्रमण कर रहे हैं और ये प्रभु सब तरह से स्थिर निष्क्रिय, अचल और विशुद्ध, पूर्ण विकास वाले हैं ऐसी अंतर डालने वाली बात बस यही है कि हम अपने को शुद्ध चिन्मात्र अनुभव नह कर पाते, जिसका फल यह है कि संसार की इतनी बड़ी विडंबनायें लगी हैं । जो कुछ धन वैभवादिक प्राप्त हुए हैं वे सबके सब भी कहीं चले जाये, नष्ट हो जायें, न्यौछावर हो जाये और ज्ञानानुभव प्राप्त हो जाये, मैं अपने को ज्ञान मात्र अनुभव लूँ तो यह वैभव सर्वोपरि वैभव है ।

चैतन्य तेज―में वह तेज हूँ जिस तेज में निरत होकर बहुत से जीवों ने निश्चल सहज उत्तम आनंद पाया, पावेंगे और पा रहे हैं, वह तेज एकस्वरूप है । बदल नहीं होती, मूल स्वरूप है । जो ध्रुव है, अनादि अनंत शाश्वत है वह एक स्वरूप है । जैसे यहाँ पूछे कि पुद्गल में, मानों किसी आम में जो ये रूप उत्पन्न हुए हैं काले, नीले, हरे, पीले आदिक और सड़ने पर हो गया सफेद तो एक ही आम में जो क्रम से इतने रंग बदले हैं उन रूपों के बदलने पर भी रूप सामान्य तो कुछ रहा । जैसे कोई आदमी कहीं गया, कहीं पहुंचा, कहीं अदलबदल किया है, किसी स्थान की बदली की तो बदल करने वाला तो कोई एक ही है ना, तब तो बदल संभव है, तो इसी तरह मो ये रूप बदले हैं तो इन बदलनों की संतान में कोई एक रूप शक्ति है ना? वह रूप शक्ति कितनी तरह की है? वहतो एक प्रकार की है । अब उसमें जो परिणमन हुआ, पर्याय हुई, काला, पीला, नीला आदिक ये विभिन्न रूप बन गए, पर इनका जो आधारभूत स्वरूप है, शक्ति है वह एक स्वरूप है । इसी तरह हमारे आत्मा में जितनी भी बदल चलती हैं परिणमन चलते हैं अशुद्ध परिणमन तो प्रकट बदल है, शुद्ध परिणमन भी बदल है । तो उनका जो अशुद्ध शुद्ध परिणमन चलते हैं उनका मूल आधार कोई एक है ना? पहिले अशुद्ध था अब शुद्ध हो गया तो कौन शुद्ध हो गया ? कोई दूसरा? एक ही कुछ । तो इसी प्रकार मैं जो सत्त्व हूँ वह एक हूँ ।

सहज परमात्मतत्त्व की एकस्वरूपता―मैं शुद्ध चेतन हूँ, एकस्वरूप हूँ, जिसके स्वरूप में मल नहीं है, निर्मल हूँ । जो मल है, विकार है वह मैं नहीं, जो मैं हूँ वह विकार नहीं । जैसे जिसको जिस पर तीव्र अनुराग होता है उसके ध्यान में वही समाया रहता है । इसी प्रकार ज्ञानी को इस शुद्धचैतन्य भाव से तीव्र अनुराग हुआ है । अतएव उसके उपयोग में बही शुद्ध चैतन्य तेज समाया रहता है, तन्मय ही अपने आपको मानता है, तो ऐसा अपने को चिन्मात्र अनुभव वाला पुरुष सर्वसंकटों से मुक्त होता है, उस ही की यह भावना की जा रही है कि मैं एक स्वरूप हूँ । जिनको कुछ भी हित की आकांक्षा हुई है उन्हें समझना चाहिए कि हमें करना क्या है जिससे हमारी उन्नति हो, शुद्ध विकास हो, हम संकटों से हटे, विडंबनारहित होकर शुद्ध स्थिति में रहा करें । वह उपाय क्या है ? वह उपाय मन, वचन, काय के व्यापाररूप नहीं, किंतु अपने इस सहजसिद्ध स्वरूप के चिंतन रूप हैं और ऐसा ही अपने को स्वीकार करने रूप हैं । मैं यह हूँ, इस पर विश्वास करने वाले ज्ञानी जनों को यश अपयश, सम्मान अपमान, लाभ हानि, निंदा प्रशंसा आदि एक समान दिखते हैं, उसका कारण तो कोई पुष्ट होना चाहिए । वह कारण यही है कि इस ज्ञानी ने अपने को सबसे निराला शुद्ध चैतन्यमात्र अनुभव किया है ।

सहज परमात्मतत्त्व की परिणाममूलता―मैं एकस्वरूप निर्मल हूँ और परिणाम मूल हूँ । जो भी पर्यायें प्रकट होती हैं उन सब पर्यायों का मैं मूल हूँ । मेरे में वे पर्यायें प्रकट होती हैं । जैसे किसी पानी का झरना हो तो वह सब पानी प्रवाह उस स्थल से प्रकट हो रहा है, उस समस्त पानी प्रवाह का वह स्रोत है । कहते हैं ना कि इस पानी का स्रोत देखो किधर है? इसी तरह देखिये इन पर्यायों का स्रोत कौन है? इसमें जो परिणतियां हैं उन सब परिणमनों का स्रोत तो देखिये क्या है? वह स्रोत ही मैं शुद्ध चैतन्यमात्र हूँ । यह शुद्ध चैतन्यमात्र तेज सहज है और परमात्मतत्त्व है । अपने आपके स्वभाव की बात सहज हुआ करती है, सरल होती है, सुगम होती है और स्वभाव से बहिर्भूत बात अपने को असहज है, असुगम है, असरल है, लेकिन मोही जीवों की बुद्धि में यह बात यों नहीं समायी रहती, मोही जीव तो इससे विपरीत जानते हैं । मोह राग द्वेष गप्पसप्प की कहानियां, प्रशंसा निंदा की चर्चायें, किसी के बारे में आलोचनायें ये सब बड़ी सुगम लग रहीं हैं, धनवैभव के काम ये सब बड़े सुगम लय रहे हैं और धर्म की बात, आत्मा के स्वभाव की बात, उसकी बात सुनने, ध्यान में रखने व उसका संपर्क बनाने में ही कठिनाई मालूम होती है कि यह तो बड़ी कठिन चीज है ।

आत्मज्ञान से ही लाभ की श्रद्धा करके आत्मज्ञान के यत्न करने का अनुरोध―देखिये, जब आत्मा ज्ञानस्वरूप हैं, और जिस ज्ञान का यह कार्य है कि जो कुछ है सब जान जाये, एक भी न छूटे और इतना ही नहीं, अतीत काल में जो कुछ था उसे भी जान जाये । भविष्य काल में जो होगा उसे भी जान जाये । जब इतना बड़ा बल प्रताप हमारे शान में पड़ा हुआ है और हम यह श्रद्धा करके बैठ जायें कि आत्मा की बात तो बड़ी कठिन होती है, वह तो समझ के ही बाहर है, ऐसा जानकर ज्ञानचर्चा के अर्जन का लाभ ही छोड़ दे, तो यह कितनी विषमता की बात है? कहां तो मेरे ज्ञान में यह स्वभाव हैं कि जो कुछ है सब अनिवार्यरूप से ज्ञात हो रहा हो और कहां यह अटक कि कुछ सदा, कुछ बात, यह तो अत्यंत कठिन है, यह तो अव्यवहार्य है, इसकी बात तो कहना ही न चाहिये, बात वह कहना चाहिए जिसे जन-साधारण समझें । ठीक है, जनसाधारण के घर जा जाकर और अधिक से अधिक मूर्ख ढूंढ़ ढूंढ़कर उनमें रहकर बात करें, यह तो हमारे और आपके आत्मा के लाभ की बात नहीं है, कितना भी कठिन तत्त्व हो, अपने आत्मा की चर्चा कितनी भी असुगम लगे, विश्वास यह बनाओ कि इस आत्मा के सच्चे ज्ञान से ही मुझे लाभ होगा, अन्य बातों से लाभ न होगा । थके हुए दिल को बहलाने के लिये अन्य बात को कहना और बात है, पर वास्तविक लाभ मिलेगा हम आपका तो इस आत्मा के निकट पहुँचने में ही मिलेगा । यह उपयोग जो ज्ञान से बिछुड़कर बहुत दूर बाह्म पदार्थों में लगा हुआ है, उस उपयोग को उन बाह्य तत्त्वों से हटाकर ज्ञानस्वरूप निज तत्त्व में जो लगाये वह पुरुष धन्य है । यह संसार है, दुःखरूप है, गुप्त रहकर अंत: ही समझ बनाकर इस संसार विडंबना से छुटकारा पा ले, बस एक ही यह चित्त में धुन होनी चाहिए । यह बात बिल्कुल सरल है, अपने सहज स्वरूप में निरख लीजिए । मैं शुद्ध चैतन्य सहज परमात्मस्वरूप हूँ । बाह्य को असार जानकर उनका विकल्प तोड़कर विश्राम से बैठ जाने पर यह सहज ज्ञात हो जाता है । जैसे मिश्री का स्वाद बोलने से ज्ञात नहीं होता, खाने से ज्ञात होता है, इसी प्रकार आत्मा के स्वरूप का परिज्ञान बोलने से ज्ञात नहीं होता, किंतु उस प्रकाश का उपयोग बनाने से, आचरण करने से विदित होता है । सब कुछ न्यौछावर करके भी यदि एक ज्ञानमात्र निज तत्त्व का अनुभव पा लिया तो समझ लीजिए कि सब पा लिया और अब हम कृतार्थ हो गये ।


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