वर्द्धमान
From जैनकोष
सिद्धांतकोष से
सामान्य परिचय
| तीर्थंकर क्रमांक | 24 |
|---|---|
| चिह्न | सिंह |
| पिता | सिद्धार्थ |
| माता | प्रियकारिणी |
| वंश | नाथ |
| उत्सेध (ऊँचाई) | 7 हाथ |
| वर्ण | स्वर्ण |
| आयु | 72 वर्ष |
पूर्व भव सम्बंधित तथ्य
| पूर्व मनुष्य भव | नन्द |
|---|---|
| पूर्व मनुष्य भव में क्या थे | मण्डलेश्वर |
| पूर्व मनुष्य भव के पिता | प्रौष्ठिल |
| पूर्व मनुष्य भव का देश, नगर | जम्बू भरत छत्रपुर |
| पूर्व भव की देव पर्याय | पुष्पोत्तर |
गर्भ-जन्म कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| गर्भ-तिथि | आषाढ़ शुक्ल 6 |
|---|---|
| गर्भ-नक्षत्र | उत्तराषाढा |
| गर्भ-काल | अन्तिम रात्रि |
| जन्म तिथि | चैत्र शुक्ल 13 |
| जन्म नगरी | कुण्डलपुर |
| जन्म नक्षत्र | उत्तरा-फाल्गुनी |
| योग | अर्यमा |
दीक्षा कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| वैराग्य कारण | जातिस्मरण |
|---|---|
| दीक्षा तिथि | मार्गशीर्ष कृष्ण 10 |
| दीक्षा नक्षत्र | उत्तरा फा꠶ |
| दीक्षा काल | अपराह्न |
| दीक्षोपवास | तृतीय भक्त |
| दीक्षा वन | नाथ |
| दीक्षा वृक्ष | साल |
| सह दीक्षित | एकाकी |
ज्ञान कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| केवलज्ञान तिथि | वैशाख शुक्ल 10 |
|---|---|
| केवलज्ञान नक्षत्र | मघा |
| केवलोत्पत्ति काल | अपराह्न |
| केवल स्थान | ऋजुकूला |
| केवल वृक्ष | शाल |
निर्वाण कल्याणक सम्बंधित तथ्य
| योग निवृत्ति काल | दो दिन पूर्व |
|---|---|
| निर्वाण तिथि | कार्तिक कृष्ण 14 |
| निर्वाण नक्षत्र | स्वाति |
| निर्वाण काल | प्रात: |
| निर्वाण क्षेत्र | पावापुरी |
समवशरण सम्बंधित तथ्य
| समवसरण का विस्तार | 1 योजन |
|---|---|
| सह मुक्त | एकाकी |
| पूर्वधारी | 300 |
| शिक्षक | 9900 |
| अवधिज्ञानी | 1300 |
| केवली | 700 |
| विक्रियाधारी | 900 |
| मन:पर्ययज्ञानी | 500 |
| वादी | 400 |
| सर्व ऋषि संख्या | 14000 |
| गणधर संख्या | 11 |
| मुख्य गणधर | इन्द्रभूति |
| आर्यिका संख्या | 36000 |
| मुख्य आर्यिका | चन्दना |
| श्रावक संख्या | 100000 |
| मुख्य श्रोता | श्रेणिक |
| श्राविका संख्या | 300000 |
| यक्ष | गुह्यक |
| यक्षिणी | सिद्धयिनी |
आयु विभाग
| आयु | 72 वर्ष |
|---|---|
| कुमारकाल | 30 वर्ष |
| विशेषता | त्याग |
| छद्मस्थ काल | 12 वर्ष |
| केवलिकाल | 30 वर्ष |
तीर्थ संबंधी तथ्य
| जन्मान्तरालकाल | 278 वर्ष |
|---|---|
| तीर्थकाल | 21042 वर्ष |
| तीर्थ व्युच्छित्ति | ❌ |
| शासन काल में हुए अन्य शलाका पुरुष | |
| चक्रवर्ती | ❌ |
| बलदेव | ❌ |
| नारायण | ❌ |
| प्रतिनारायण | ❌ |
| रुद्र | सात्यिक |
- प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति/1/3/16 अब समंतादृद्धं ‘वृद्धं’ मानं प्रमाणं ज्ञानं यस्य स भवित वर्द्धमानः । = ‘अव’ अर्थात् समंतात्, ॠृद्धम् अर्थात् वृद्ध, मान अर्थात् प्रमाण या ज्ञान । अर्थात् हर प्रकार से वृद्ध ज्ञान जिसके होता है ऐसे भगवान् वर्द्धमान हैं ।
- भगवान् महावीर का अपरनाम भी वर्द्धमान है - देखें महावीर ।
- रुचक पर्वत का एक कूट है - देखें लोक - 5.13;
- अवधिज्ञान का एक भेद । - देखें अवधिज्ञान - 1 ।
पुराणकोष से
(1) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.145
(2) रुचकवर पर्वत की उत्तर दिशा का एक कूट । यहाँ अंजन गिरि का दिग्गजेंद्र देव रहता है । हरिवंशपुराण - 5.703, देखें रुचकवर
(3) नृत्य का एक भेद । महापुराण 14.133
(4) कीर्ति तथा गुणों से वर्द्धमान होने के कारण इंद्र द्वारा प्रदत्त तीर्थंकर महावीर का एक नाम । वीरवर्द्धमान चरित्र 1. 4, देखें महावीर