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वैशेषिक

From जैनकोष

  • वैशेषिक मत
    1. सामान्य परिचय
    2. वैशेषिक मत - प्रवर्तक, साहित्य व समय
    3. वैशेषिक मत का तत्त्व विचार
    4. ईश्वर, सृष्टि व प्रलय
    5. पीलुपाक व पिठरपाक सिद्धांत
    6. ज्ञान प्रमाण विचार
    7. वैशेषिक मत में साधु चर्या
    8. वैशेषिकों व नैयायिकों में समानता व असमानता
    9. जैन व वैशेषिक मत की तुलना

    

    1. सामान्य परिचय
      (वैशेषिक लोग भेदवादी हैं, ये द्रव्य, गुण, पर्याय तथा वस्तु के सामान्य व विशेष अंशों की पृथक्-पृथक् सत्ता स्वीकार करके समवाय संबंध से उनकी एकता स्थापित करते हैं । ईश्वर को सृष्टि व प्रलय का कर्त्त मानते हैं । शिव के उपासक हैं, प्रत्यक्ष व अनुमान दो प्रमाण स्वीकार करते हैं । इनके साधु वैरागी होते हैं ।
    2. प्रवर्तक, साहित्य व समय
      इस मत के आद्य प्रवर्तक कणाद ॠषि थे, जिन्हें उनकी कापोती वृत्ति के कारण कण भक्ष तथा उलूक ॠषि का पुत्र होने के कारण औलूक्य कहते थे । इन्होंने ही वैशेषिक सूत्र की रचना की थी । जिस पर अनेकों भाष्य व टीकाएँ प्राप्त हैं, जैसे–प्रशस्तपाद भाष्य, रावण भाष्य, भारद्वाज वृत्ति । इनमें से प्रशस्तपाद भाष्य प्रधान है जिस पर अनेकों वृत्तियाँ लिखी गयी हैं, जैसे–व्योमशेखरकृत व्योमवती, श्रीधरकृत न्यायकंदली, उदयनकृत किरणावली, श्री वत्सकृत लीलावती, जगदीश भट्टाचार्यकृत भाष्य सूक्ति तथा शंकर मिश्रकृत कणाद रहस्य । इसके अतिरिक्त भी शिवादित्यकृत सप्त पदार्थी, लोगाक्षिभास्करकृत तर्ककौमुदी, विश्वनाथकृत भाषा परिच्छेद, तर्कसंग्रह, तर्कामृत आदि वैशेषिक दर्शन के महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं । इनमें से वैशेषिक सूत्र की रचना ई.श.1 का अंत तथा प्रशस्तपाद भाष्य की रचना ई. श.5-6 अनुमान की जाती है । (स.म./परि-ग./पृ.418) ।
    3. तत्त्व विचार
      (वैशे. सू./अधिकार 1-5) (षट् दर्शन समुच्चय/60-66/63-66) (भारतीय दर्शन)
      1. पदार्थ 7 हैं–द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय व अभाव ।
      2. द्रव्य 9 हैं–पृथिवी, जल तेजस्, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा तथा मनस् । प्रथम 4 नित्य व अनित्य के भेद से दो-दो प्रकार हैं और शेष पाँच अनित्य हैं । नित्यरूप पृथिवी आदि तो कारण रूप तथा परमाणु हैं और अनित्य पृथिवी आदि उस परमाणु के कार्य हैं । इनमें क्रम से एक, दो, तीन व चार गुण पाये जाते हैं । नित्य द्रव्यों में आत्मा, काल, दिक व आत्माकाश तो विभु है और मनस् अभौतिकपरमाणु है । आकाश शब्द का समवायि कारण है । समय व्यवहार का कारण काल और दिशा-विदिशा का कारण दिक् है । आत्मा व मनस् नैयायिकों की भाँति हैं । (देखें न्याय - 1.5) ।
      3. कार्य का असमवायि कारण गुण है । वे 24 हैं–रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रव्यत्व, स्नेह, शब्द, ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म तथा संस्कार । प्रथम 4 भौतिक गुण हैं, शब्द आकाश का गुण है, ज्ञान से संस्कार पर्यंत आत्मा के गुण हैं और शेष आपेक्षिक धर्म हैं । धर्म व अधर्म दोनों गुण जीवों के पुण्य पापात्मक भाग्य के वाचक हैं । इन दोनों को अदृष्ट भी कहते हैं ।
      4. कर्म-क्रिया को कर्म कहते हैं । वह पाँच प्रकार की है–उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण, व गमनागमन । वह कर्म तीन प्रकार का है–सत्प्रत्यय, असत्प्रत्यय और अप्रत्यय । जीव के प्रयत्न से उत्पन्न कायिक चेष्टा सत्प्रत्यय है, बिना प्रयत्न की चेष्टा असत्प्रत्यय है और पृथिवी आदि जड़ पदार्थों में होने वाली क्रिया अप्रत्यय है ।
      5. अनेक वस्तुओं में एकत्व की बुद्धि का कारण सामान्य है । यह नित्य है तथा दो प्रकार है–पर सामान्य या सत्ता सामान्य, अपर सामान्य या सत्ता विशेष । सर्व व्यापक महा सत्त पर सामान्य है तथा प्रत्येक वस्तु व्यापक द्रव्यत्व गुणत्व आदि अपर सामान्य है, क्योंकि अपने से ऊपर-ऊपर की अपेक्षा इनमें विशेषता है ।
      6. द्रव्य, गुण, कर्म आदि में परस्पर विभाग करने वाला विशेष है ।
      7. अयुत सिद्ध पदार्थों में आधार आधेय संबंध को समवाय कहते हैं जैसे–द्रव्य व गुण में संबंध, यह एक व नित्य है ।
      8. अभाव चार प्रकार का है प्रागंभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव व अत्यंताभाव (देखें वह वह नाम) ।
      9. ये लोक नैगम नयाभासी हैं ।–(देखें अनेकांत - 2.9) ।
    4. ईश्वर, सृष्टि व प्रलय
      1. यह लोक सृष्टि कर्ता वादी हैं । शिव के उपासक हैं (देखें परमात्मा - 3.5) ।
      2. आहार के कारण घट आदि कार्य द्रव्यों के अवयवों में क्रिया विशेष उत्पन्न होने से उनका विभाग हो जाता है तथा उनमें से संयोग गुण निकल जाता है । इस प्रकार वे द्रव्य नष्ट होकर अपने-अपने कारण द्रव्य परमाणुओं में लय हो जाते हैं । इसे ही प्रलय कहते हैं । इस अवस्था में सृष्टि निष्क्रिय होती है । समस्त आत्माएँ अपने अदृष्ट, मनस् और संस्कारों के साथ विद्यमान रहती हैं ।
      3. ईश्वर की इच्छा होने पर जीव के अदृष्ट तथा परमाणु कार्योन्मुख होते हैं, जिसके कारण परस्पर के संयोग से द्विअणुक आदि स्थूल पदार्थों की रचना हो जाती है । परमाणु या द्विअणुकों के मिलने से स्थूल द्रव्य नहीं होते त्रिअणुकों के मिलने से ही होते हैं । यही सृष्टि की रचना है । सृष्टि की प्रक्रिया में ये लोग पीलुपाक सिद्धांत मानते हैं–(देखें आगे नं - 5) ।
      4. पूर्वोपार्जित कर्मों के अभाव से जीव के शरीर, योनि, कुल आदि होते हैं । वही संसार है । उस अदृष्ट के विषय समाप्त हो जाने पर मृत्यु और अदृष्ट समाप्त हो जाने पर मुक्ति हो जाती है ।
    5. पीलुपाक व पिठरपाक सिद्धांत
      (भारतीय दर्शन)
      1. कार्य वस्तुएँ सभी छिद्रवाली (Porous) होती हैं । उनके छिद्रों में तैजस द्रव्य प्रवेश करके उन्हें पका देता है । वस्तु ज्यों की त्यों बनी रहती है । यह पिठरपाक है ।
      2. कार्य व गुण पहले समवायि कारण में उत्पन्न होते हैं । पीछे उन समवायि कारणों के संयोग से कार्य द्रव्यों की उत्पत्ति होती है, जैसे–घट को आग में रखने से उस घट का नाश हो जाता है फिर, उसके परमाणु पककर लाल रंग से युक्त होते हैं, पीछे इन परमाणुओं के योग से घड़ा बनता है और उसमें लाल रंग आता है । यह पीलुपाक है ।
    6. ज्ञान प्रमाण विचार
      (वैशे. द. /अधिकार 8-9), (षट्दर्शन समुच्चय/67/66), (भारतीय दर्शन)
      1. नैयायिकोंवत् बुद्धि व उपलब्धि का नाम ही ज्ञान है, ज्ञान दो प्रकार है–विद्या व अविद्या । प्रमाण ज्ञान विद्या है और संशय आदि को अविद्या कहते हैं ।
      2. प्रमाण 2 हैं–प्रत्यक्ष, अनुमान । नैयायिकों वत् इंद्रिय ज्ञान प्रत्यक्ष है, अनुमान का स्वरूप नैयायिकोंवत् है । योगियों को भूत, भविष्यग्राही प्रातिभ ज्ञान आर्ष है ।
      3. अविद्या–चार प्रकार की है–संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय तथा स्वप्न । संशय, विपर्यय व अनध्यवसाय के लिए देखें वह वह नाम । निद्रा के कारण इंद्रियाँ मन में विलीन हो जाती हैं और मन मनोवह नाड़ी के द्वारा पुरीतत् नाड़ी में चला जाता है । तहाँ अदृष्ट के सहारे, संस्कारों व वात पित्त आदि के कारण उसे अनेक विषयों का प्रत्यक्ष होता है । उसे स्वप्न कहते हैं ।
    7. साधु चर्या
      (स. म. /परि-ग. /पृ. 410) इनके साधु, दंड, कमंडलु, या तुंबी, कमंडल, लँगोटी व यज्ञोपवीत रखते हैं, जटाएँ बढ़ाते हैं तथा शरीर पर भस्म लगाते हैं । नीरस भोजन या कंदमूल खाते हैं । शिव का ध्यान करते हैं । कोई-कोई स्त्री के साथ भी रहते हैं । परंतु उत्कृष्ट स्थिति में नग्न व रहित ही रहते हैं । प्रातःकाल दाँत, पैर आदि को सा़फ करते हैं । नमस्कार करने वालों को ‘ॐ नमः शिवाय’ तथा संन्यासियों को ‘नमः शिवाय’ कहते हैं ।
    8. वैशेषिकों व नैयायिकों में समानता व असमानता
      स्याद्वादमंजरी / परि-ग. /पृ. 410-411/-
      1. नैयायिक व वैशेषिक बहुत सी मान्यताओं में एक मत हैं । उद्योत कर आदि के लगभग सभी प्राचीन न्यायशास्त्रों में वैशेषिक सिद्धांतों का उपयोग किया गया है ।
      2. पीछे वैशेषिक लोग आत्मा अनात्मा व परमाणु का विशेष अध्ययन करने लगे और नैयायिक तर्क आदि का । तब इनमें भेद पड़ गया है ।
      3. दोनों ही वेद को प्रमाण मानते हैं । वैशेषिक लोक प्रत्यक्ष व अनुमान दो ही प्रमाण मानते हैं, पर नैयायिक उपमान व शब्द को भिन्न प्रमाण मानते हैं ।
      4. वैशेषिक सूत्रों में द्रव्य गुण कर्म आदि प्रमेय की और न्याय सूत्रों में तर्क, अनुमान आदि प्रमाणों की चर्चा प्रधान है ।
      5. न्याय सूत्र में ईश्वर की चर्चा है पर वैशेषिक सूत्रों में नहीं ।
      6. वैशेषिक लोग मोक्ष को निःश्रेयस या मोक्ष कहते हैं । और नैयायिक लोग-अपवर्ग ।
      7. वैशेषिक लोग पीलुपाक वादी हैं और नैयायिक लोग पीठरपाक वादी ।
      • वैदिक दर्शनों का स्थूल से सूक्ष्म की ओर विकास क्रम–देखें दर्शन ।
    9. जैन व वैशेषिक मत की तुलना
      वैशेषिकों की भाँति जैन भी पर्यायार्थिक व सद्भुत व्यवहार नय की दृष्टि से द्रव्य के गुण व पर्यायों को, उसके प्रदेशों को तथा उसके सामान्य व विशेष सर्व भावों को पृथक्-पृथक् मानते हुए द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव रूप चतुष्टय से वस्तु में भेद करते हैं (देखें नय - .IV.3 व V/4, 5 ) परंतु उसके साथ-साथ द्रव्यार्थिक नय की दृष्टि से उसका विरोधी अभेद पक्ष भी स्वीकार करने के कारण जैन तो अनेकांतवादी हैं (देखें नय - V.1,2), परंतु वैशेषिक लोग अभेद पक्ष को सर्वथा स्वीकार न करने के कारण एकांतवादी हैं । यही दोनों में अंतर है ।)


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