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समयसार - आत्मख्याति टीका - गाथा 143

From जैनकोष

पक्षातिक्रान्तस्य किं स्वरूपमिति चेत्‌
दोण्ह वि णयाण भणिदं जाणदि णवरं तु समयपडिबद्धो ।
ण दु णयपक्खं गिण्हदि किंचि वि णयपक्खपरिहीणो ॥१४३॥


द्वयोरपि नययोर्भणितं जानाति केवलं तु समयप्रतिबद्ध: ।
न तु नयपक्षं गृह्णाति किञ्‍चिदपि नयपक्षपरिहीन: ॥१४३॥


यथा खलु भगवान्केवली श्रुतज्ञानावयवभूतयोर्व्यवहारनिश्चयनयपक्षयो: विश्वसाक्षितया केवलं स्वरूपमेव जानाति, न तु सततमुल्लसितसहजविमलसकलकेवलज्ञानतया नित्यं स्वयमेव विज्ञानघनभूतत्वात्‌ श्रुतज्ञानभूमिकातिक्रान्‍ततया समस्तनयपक्षपरिग्रहदूरीभूतत्वात्कञ्‍चनापि नयपक्षं परिगृह्णाति, तथा किल य: श्रुतज्ञानावयवभूतयोर्व्यवहारनिश्चयनयपक्षयो: क्षयोपशमविजृम्भित-श्रुतज्ञानात्मकविकल्पप्रत्युद्‌गमनेऽपि परपरिग्रहप्रतिनिवृत्तैत्सुक्यतया स्वरूपमेव केवलं जानाति, न तु खरतरदृष्टिगृहीतसुनिस्तुषनित्योदितचिन्मयसमयप्रतिबद्धतया तदात्वे स्वयमेव विज्ञानघन-भूतत्वात्‌ श्रुतज्ञानात्मकसमस्तान्‍तर्बहिर्जल्परूपविकल्पभूमिकातिक्रान्‍ततया समस्तनयपक्षपरिग्रह-दूरीभूतत्वात्कञ्‍चनापि नयपक्षं परिगृह्णाति, स खलु निखिलविकल्पेभ्य: परतर: परमात्मा ज्ञानात्मा प्रत्यग्ज्योतिरात्मख्यातिरूपोऽनुभूतिमात्र: समयसार: ॥१४३॥


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See Also

  • समयसार कर्ता-कर्म अधिकार
  • समयसार अनुक्रमणिका
  • आचार्य कुंद्कुंद
  • आचार्य अमृतचंद्र
  • समयसार - तात्पर्यवृत्ति टीका - गाथा 143
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