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समयसार - आत्मख्याति टीका - गाथा 97

From जैनकोष

तत: स्थितमेतद्‌ ज्ञानान्नश्यति कर्तृत्वम्‌ 
एदेण दु सो कत्त आदा णिच्छयविदूहिं परिकहिदो ।
एवं खलु जो जाणदि सो मुञ्चदि सव्वकत्तितं ॥९७॥


एतेन तु स कर्तात्मा निश्चयविद्भि: परिकथित: ।
एवं खलु यो जानाति सो मुञ्‍चति सर्वकर्तृत्वम्‌ ॥९७॥


येनायमज्ञानात्परात्मनोरेकत्वविकल्पमात्मन: करोति तेनात्मा निश्चयत: कर्ता प्रतिभाति, यस्त्वेवं जानाति स समस्तं कर्तृत्वमुत्सृजति तत: स खल्वकर्ता प्रतिभाति ।
तथा हि  इहायमात्मा किलाज्ञानी सन्नज्ञानादासंसारप्रसिद्धेन मिलितस्वादस्वादनेन मुद्रितभेद-संवेदनशक्तिरनादित एव स्यात्‌, तत: परात्मानावेकत्वेन जानाति, तत: क्रोधोऽहमित्यादिविकल्प-मात्मन: करोति, ततो निर्विकल्पादकृतकादेकस्माद्विज्ञानघनात्प्रभ्रष्टो बारम्बारमनेकविकल्पै: परिणमन्‌ कर्ता प्रतिभाति ।
ज्ञानी तु सन्‌ ज्ञानात्तदादिप्रसिध्यता प्रत्येकस्वादस्वादनेनोन्मुद्रितभेदसंवेदनशक्ति: स्यात्‌, ततो-ऽनादिनिधनानवरतस्वदमाननिखिलरसान्‍तरविविक्तात्यन्‍तमधुरचैतन्यैकरसोऽयमात्मा भिन्नरसा:
कषायास्तै: सह यदेकत्वविकल्पकरणं तदज्ञानादित्येवं नानात्वेन परात्मानौ जानाति, ततोऽकृतक-मेकं ज्ञानमेवाहं न पुन: कृतकोऽनेक: क्रोधादिरपीति क्रोधोऽहमित्यादिविकल्पमात्मनो मनागपि न करोति, तत: समस्तमपि कर्तृत्वमपास्यति, ततो नित्यमेवोदासीनावस्थो जानन्‌ एवास्ते, ततो निर्विकल्पोऽकृतक एको विज्ञानघनो भूतोऽत्यन्‍तमकर्ता प्रतिभाति ॥९७॥


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  • आचार्य अमृतचंद्र
  • समयसार - तात्पर्यवृत्ति टीका - गाथा 97
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