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सहचर

From जैनकोष

 न्यायदीपिका/3/52-59/55-59/9

यथा-पर्वतोऽयमग्निमान् धूमवत्त्वान्यानुपपत्ते: इत्यत्र धूम:। धूमो ह्यग्ने: कार्यभूतस्तदभावेऽनुपपद्यमानोऽग्निं गमयति। कश्चित्कारणरूप:, यथा-‘वृष्टिर्भविष्यति विशिष्टमेघान्यथानुपपत्ते:’ इत्यत्र मेघविशेष:। मेघविशेषो हि वर्षस्य कारणं स्वकार्यभूतं वर्षं गमयति।52। कश्चिद्विशेषरूप:, यथा-वृक्षोऽयं शिंशपात्वान्यथानुपपत्तेरित्यत्र [शिंशपा] शिंशपा हि वृक्षविशेष: सामान्यभूतं वृक्षं गमयति। न हि वृक्षाभावे वृक्षविशेषो घटत इति। कश्चित्पूर्वचर:, यथा-उदेष्यति शकटं कृत्तिकोदयान्यथानुपपत्तेरित्यत्र कृत्तिकोदय:। कृत्तिकोदयानंतरं मुहूर्त्तांते नियमेन शकटोदयो जायत इति कृतिकोदय: पूर्वचरो हेतु: शकटोदयं गमयति। कश्चिदुत्तरचर:, यथा-उद्‌ग्गद्भरणि: प्राक्‌कृत्तिकोदयादित्यत्र कृत्तिकोदय:। कृत्तिकोदयो हि भरण्युदयोत्तरचरस्तं गमयति। कश्चित्सहचर:, यथा मातुलिंगरूपवद्भवितुमर्हति रसवत्त्वान्यथानुपपत्तेरित्यत्र रस:। रसो हि नियमेन रूपसहचरितस्तदभावेऽनुपपद्यमानस्तद्‌गमयति।54। स यथा-नास्य मिथ्यात्वम्, आस्तिक्यान्यथोपपत्तेरित्यत्रास्तिक्यम् । आस्तिक्यं हि सर्वज्ञवीतरागप्रणीतजीवादितत्त्वार्थरुचिलक्षणम् । तन्मिथ्यात्ववतो न संभवतीति मिथ्यात्वाभावं साधयति।56। अस्त्यत्र प्राणिनि सम्यक्त्वं विपरीताभिनिवेशाभावात् । अत्र विपरीताभिनिवेशाभाव: प्रतिषेधरूप: सम्यक्त्वसद्भावं साधयतीति प्रतिषेधरूपो विधिसाधको हेतु:।58। नास्त्यत्र घूमोऽग्न्यनुपलब्धेरित्यत्राग्न्यभाव: प्रतिषेध रूपो घूमाभावं प्रतिषेधरूपमेव साधयतीति प्रतिषेधरूप: प्रतिषेधसाधको हेतु:।

विधिसाधक

  1. .....
  2. .....
  3. कोई सहचर है, जैसे-‘मातुलिंग (पपीता) रूपवान होना चाहिए, क्योंकि रसवान् अन्यथा नहीं हो सकता’, यहाँ ‘रस’ सहचर हेतु है। कारण रस, नियम से रूप का सहचारी है और इसलिए वह उसके अभाव में नहीं होता हुआ उसका ज्ञापन कराता है।54।

अधिक जानकारी के लिये देखें हेतु ।


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