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सूत्रपाहुड़ गाथा 26

From जैनकोष

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चित्तसोहि ण तेसिं ढिल्लं भावं तहा सहावेण ।
विज्जदि मासा तेसिं इत्थीसु ण संकया झाणा ॥२६॥
चित्तशोधि न तेषां शिथिल: भाव: तथा स्वभावेन ।
विद्यते मासा तेषां स्त्रीषु न शङ्‍कया ध्यानम्‌ ॥२६॥


आगे कहते हैं कि स्त्रियों के ध्यान की सिद्धि भी नहीं है -
अर्थ - उन स्त्रियों के चित्त की शुद्धता नहीं है, वैसे ही स्वभाव ही से उनके ढीला भाव है, शिथिल परिणाम है और उनके मासा अर्थात्‌ मास-मास में रुधिर का स्राव विद्यमान है, उसकी शंका रहती है उससे स्त्रियों के ध्यान नहीं है ।
भावार्थ - - ध्यान होता है वह चित्त शुद्ध हो, दृढ परिणाम हो, किसी तरह की शंका न हो तब होता है सो स्त्रियों के तीनों ही कारण नहीं हैं, तब ध्यान कैसे हो ? ध्यान के बिना केवलज्ञान कैसे उत्पन्न हो और केवलज्ञान के बिना मोक्ष नहीं है, श्वेताम्बरादिक मोक्ष कहते हैं, वह मिथ्या है ॥२६॥


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