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जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

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कालानुयोग - गति मार्गणा

From जैनकोष



1.गति मार्गणा

मार्गणा

गुणस्थान     

नाना जीवापेक्षया

एक जीवापेक्षया

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

नं.1

नं.2

नं.1

नं.3

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नरक गति—

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नरकगति सामान्य

...

 

2

सर्वदा     

प्रवेशांतर काल से अवस्थान काल अधिक है    

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

2-3

10000 वर्ष     

 

33 सागर    

 

1ली पृथिवी 

...

 

2

सर्वदा

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

5-6

10000 वर्ष

 

1 सागर     

 

2-7 पृथिवी

...

 

2

सर्वदा

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

8-9

1-22 सागर     

क्रमश: 1,3,7,10,22 सागर 

3-33 सागर  

क्रमश: 3,7,10,1722,33 सागर

नरक सामान्य

1

33

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

34-35

 

अंतर्मू.

28/ज 3 या 4थे से गिरकरपुन: चढ़े       

33 सागर    

7वें नरक की पूर्ण आयु मिथ्यात्व सहित बीते

नरक सामान्य

2-3

36

 

 

मूलोघवत्      

 

मूलोघवत्      

36

 

 

मूलोघवत्     

 

मूलोघवत्     

नरक सामान्य

4

37

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

38-39

 

अंतर्मू.

28/ज 1ले 3रे से 4थे में जा पुन: गिरे      

33सागर-6 अंतर्मुहूर्त 

7वें नरक में उत्पन्न 28/ज.मिथ्यादृ पर्याप्तिपूर्ण कर वेदकसम्यक्त्वी हो अंतर्मुहूर्त आयु शेष रहने पर पुन: मिथ्यात्वी हुआ

1-7 पृथिवी 

1

40

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

41-42

 

अंतर्मू.

नरक सामान्यवत्      

क्रमश: 1,3,7,10,17,22,33 सागर 

नरक सामान्यवत्

1-7 पृथिवी

2-3

43

 

 

मूलोघवत्      

 

 

43

 

 

मूलोघवत्     

 

 

1-7 पृथिवी

4

44

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

45-46

 

अंतर्मु.

नरक सामान्यवत्

क्रमश: 1,3,7,10,17सा.22सा.3अ.33सा.-6अंतर्मु.

पूर्ण स्थिति से पर्याप्तिकाल व अंतिम अंतर्मुहूर्त हीन।  

2. तिर्यंच गति  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तिर्यंच सामान्य

...

 

4-5

सर्वदा     

प्रवेशांतर काल से अवस्थानकाल अधिक है      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

11-12

1 क्षुद्रभव     

मनुष्यसे आकर कर्मभूमि में उपजे तो

असं. पु. परि.

अन्य गतियों से आकर कर्मभूमिज तिर्यंचों में परिभ्रमण      

पंचेंद्रिय सामा.

...

 

4-5

सर्वदा

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

14-15

1 क्षुद्रभव

अपर्याप्तक की अपेक्षा

3पल्य+95को.पू.

परिभ्र.के पश्चा.उत्तमभोगभू.में देव हुआ     

पंचेंद्रिय पर्याप्त.

...

 

4-5

 

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

14-15

अंतर्मु.

पर्याप्तक की अपेक्षा      

3पल्य+47को.पू.

परिभ्र.के पश्चा.उत्तमभोगभू.में देव हुआ

पंचेंद्रिय योनिगति      

...

 

4-5

सर्वदा

काल से अवस्थानकाल अधिक है

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

14-15

अंतर्मु.

पर्याप्तक की अपेक्षा      

3पल्य+15को.पू.

परिभ्र.के पश्चा.उत्तमभोगभू.में देव हुआ

पंचेंद्रिय नपुंसक वेदी   

...

 

4-5

सर्वदा

  ...

 ...

  ...

 

14-15

 ...

 ...

8 कोड़ पूर्व   

परिभ्रमण (कर्मभूमि में)   

पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्त

...

 

4-5

सर्वदा     

तिर्यं.सा.वत्      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

17-18

क्षुद्रभव     

अविवक्षि.तिर्यं.पर्या.से आना 

अंतर्मुहूर्त     

अविवक्षि.तिर्यं.से आकर पंचे.होना      

तिर्यंच सामान्य

1

47

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

48-49

 

अंतर्मु.

28/ज.3,4,5वें से 1ला हो पुन: ऊपर चढ़े   

असं. पुद्गलपरिव.

अनादि मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों में उपज वहाँ इतने काल पर्यंत परिभ्रमण कर अन्य गति को प्राप्त हुआ

मार्गणा

गुणस्थान     

नाना जीवापेक्षया

एक जीवापेक्षया

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

नं.1

नं.2

नं.1

नं.3

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

 

2-3

50

 

 

मूलोघवत्      

 

 

50

 

 

मूलोघवत्     

 

 

 

4

51

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

52-53

 

अंतर्मु.

1,3,5में से 4थे में आ पुन: लौटे      

3 पल्य

बद्धायुष्कक्षा. सम्य.भोगभूमि.तिर्यंच हुआ  

 

5

54

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

55-56

 

अंतर्मुहूर्त

उपरोक्तवत् पर 28/ज.की अपेक्षा      

1को.पू.-3अंतर्मुहूर्त   

28/ज.सम्मूर्च्छिम पर्याप्त मच्छमेंढक आदि कहो 3अंत में पर्याप्तिपूर्ण कर संयातासंय हो भव के अंत तक रहा      

पंचेंद्रिय सामान्य

1

57

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

58-59

 

अंतर्मु.

तिर्यंच सामान्यवत् 

3पल्य+95को.पू.+अंतर्मुहूर्त      

संज्ञी, असंज्ञी व तीनों वेद इन स्थानों में से प्रत्येक में 8को.पू.=48को.पू.; ल.अप.में अंतर्मु., पुन: उपरोक्तवत् 3वेदों में 47को.पू.,फिर भोगभूमि में उपजा      

 

2-3

60

 

 

मूलोघवत्      

 

 

60

 

 

मूलोघवत्     

 

 

 

4

61

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

62-63

 

अंतर्मु.

तिर्यंच सामान्यवत्      

3 पल्य

तिर्यंच सामान्यवत्

 

5

64

 

 

मूलोघवत्      

 

 

64

 

 

मूलोघवत्     

 

 

पंचेंद्रिय पर्याप्त 

1

57

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

 

58-59

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्   

3पल्य+47को.पू.

सविशेष पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

2-3

60

 

 

मूलोघवत्      

 

 

60

 

 

मूलोघवत्     

 

सविशेष पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

4-5

61-64

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्      

 

61-64

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

 

 

 

 

57

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

58-59

 

 

 

3पल्य+15को.पू.

सविशेष पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

पंचेंद्रिय योनिमति      

2-3

60

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

60

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

 

 

 

4

61

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

62-63

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

3पल्य–2मास व मुहूर्त   पृथक्त्व      

28/ज.मिथ्यात्वी भोगभूमिज तिर्यं.में उपजा/2मास गर्भ में बीते/जन्म के मुहू.पृथक्त्व पश्चात् वेद.सम्य.

 

 

5

64

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

64

 

 

पंचेंद्रिय सामान्यवत्

 

 

 

पंचे.ल.अप.

1

65

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

66-67

 

क्षुद्रभव

अविवक्षित.पर्या.से आ पुन: लौटे 

अंतर्मुहूर्त     

जघन्यवत्

3. मनुष्यगति      

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मनुष्य सामान्य

 ...

 

4-5

सर्वदा 

विच्छेदाभाव   

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

 

20-21

क्षुद्रभव     

अपर्याप्त की अपेक्षा

3पल्य+40को.पू.

कर्मभूमिज में भ्रमणकाल 40को.पू./फिर भोगभूमिज      

 " पर्याप्त      

 ...

 

4-5

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

20-21

अंतर्मु.

पर्याप्त होकर इतने काल से पहले न मरे  

3पल्य+23को.पू.

कर्मभूमिज में भ्रमणकाल 23को.पू./फिर भोगभूमिज

मनुष्यणी प.

 ...

 

4-5

सर्वदा

 विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

20-21

 अंतर्मु.

पर्याप्त होकर इतने काल से पहले न मरे

3पल्य+7को.पू.

कर्मभूमिज में भ्रमणकाल 7को.पू./फिर भोगभूमिज

मनुष्य ल.अप.

 ...

 

6-8

क्षुद्रभव

  ...

पल्य/असं.

संतान क्रम      

 

23-24

क्षुद्रभव     

कदलीघात से मरण कर पर्याय परिवर्तन     

अंतर्मु.

भ्रमण

मार्गणा

गुणस्थान     

नाना जीवापेक्षया

एक जीवापेक्षया

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

नं.1

नं.2

नं.1

नं.3

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

मनुष्य सामान्य

1

68

 

सर्वदा 

विच्छेदाभाव   

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

 

69-70

अंतर्मु.

3,4,5वें से 1ला, पुन: 3,4या 5

3पल्य+47को.पू.+अंतर्मुहूर्त      

तीनों वेदों में से प्रत्येक 8को.पू.=24को.पू.; फिर ल.अप.में अंत.; फिर स्त्री व नपुं.वेद में 8,8को.पू.=16को.पू.;फिर पुरुषवेद में 7को.पू.इस प्रकार 47को.पू.कर्मभूमि में भ्रमण कर भोगभूमि में उपजे 

 

2

71-72

 

1 समय      

उप.सम्य.7,8,मनुष्य का सम्य.में 1समय शेष रहते युग.प्रवेश      

अंतर्मु.

संख्यातमनु.का उप. सम्य.में 6आव.शेष रहते युग.प्रवेश

73-74

 

1समय     

उपशम सम्यक्त्व में 1समय काल शेष रहने पर सासादन में प्रवेश

6  आवली   

उपशम सम्यक्त्व में 6 आवली काल शेष रहने पर सासादन में प्रवेश 

 

3

75-76

 

अंतर्मु.

28/ज.1,4,5,6ठे से पीछे आये सं.मनु.युगपत् लौटे      

अंतर्मु.

जघन्यवत्

77-78

 

अंतर्मु.

28/ज.1,4,5,6ठे से 3रे में आ., अंतर्मु.वहाँ रह पुन: लौट जायें

अंतर्मुहूर्त

जघन्यवत्     

मनुष्य सामान्य

4

79

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

80-82

 

अंतर्मु.

28/ज.1,3,5,6ठे से 4थे में आ.पुन: लौटकर गुणस्थान परिवर्तन करे  

3पल्य+देशोन पूर्व कोड़

1को.पू.में त्रिभाग शेष रहने पर मनुष्यायु को बाँध क्षायिक सम्यक्त्वी हो भोगभूमि में उपजे।   

 

5-14

82

 

 

मूलोघवत्      

 

 

82

 

 

मूलोघवत्     

 

 

मनुष्य पर्याप्त 

1-14

68-82

 

 

मनुष्य सामान्यवत्

 

 

68-82

 

 

मनुष्य सामान्यवत्      

 

 

मनुष्यणी      

1-3

68-78

 

 

 मनुष्य सामान्यवत्

 

 

68-78

 

 

मनुष्य सामान्यवत्

 

 

 

4

79

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

80-81

 

अंतर्मु.

मनुष्य सामान्यवत्      

3पल्य–9मास व 49दिन       

28/ज. भोगभूमिया मनुष्यणी हो 9मास गर्भ में रह 49दिन में पर्याप्ति पूर्ण कर सम्यक्त्वी हो।

 

5-14

82

 

 

मनुष्य सामान्यवत्      

 

 

82

 

 

मनुष्य सामान्यवत्

 

 

मनुष्य ल. अप.

1

83-84

 

क्षुद्रभव     

अनेक जीवों का युगपत् प्रवेश व निर्गमन

पल्य/अ.

संतति क्रम न टूटे 

85-86

 

क्षुद्रभव

परिभ्रमण     

अंतर्मुहूर्त

परिभ्रमण

मार्गणा

गुणस्थान     

नाना जीवापेक्षया

एक जीवापेक्षया

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

नं.1

नं.2

नं.1

नं.3

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

4. देवगति—

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

देव सामान्य

 

 

9-10

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

 

26       -27

10,000 वर्ष   

देव की जघन्य आयु  

33 सागर      

देव की उत्कृष्ट आयु  

भवनवासी      

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

29-30

10,000 वर्ष

देव की जघन्य आयु  

1 सागर      

देव की उत्कृष्ट आयु  

व्यंतर

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

29-30

10,000 वर्ष

 देव की जघन्य आयु  

1 पल्य      

देव की उत्कृष्ट आयु  

 

 

 

 

 

 

 

 

( धवला/14/331 )

आ./असं      

सोपक्रम काल  

12 मुहूर्त     

अनुपक्रम काल  

 

ज्योतिषी      

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

29-30

 पल्य

जघन्य आयु  

उत्कृष्ट आयु  

सौधर्म से सहस्रार

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

32-33


क्रमश: प्रत्येक युगल में
2 7, 10, 14 16       सागर

2सा.-18सा.

प्रत्येक युगल में क्रमश:
1पल्य, 2 7, 10, 14 16       सागर

आनत-अच्युत

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

35-36

1820सा.

दो युगलों में क्रमश: 18व 20 सागर 

20 सा. 22 सा.

दोनों युगलों में क्रमश: 20 व 22 सागर     

नव ग्रैवेयक

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

35-36

22-30 सा.

प्रत्येक ग्रैवेयक में क्रमश: 22,23,24,25,26  ,27,28,29,30 सागर 

23 से 31 सागर 

प्रत्येक ग्रैवेयक में क्रमश: 23,24,25,26     ,27,28,29,30,31 सागर 

नव अनुदिश      

 

 

11

सर्वदा

 विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

35-36

31 सागर      

प्रत्येक में बराबर      

32 सागर      

प्रत्येक में बराबर     

विजय से अपराजित

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

35-36

32 सागर      

प्रत्येक में बराबर      

33 सागर      

प्रत्येक में बराबर     

सर्वार्थ सिद्धि 

 

 

11

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

38

33 सागर      

 

33 सागर      

 

देव सामान्य

1

87

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

88-89

 

अंतर्मु.

28/ज. 3,4थे से 1ले में गुणस्थान परिवर्तन करे  

31 सागर      

उपरिम ग्रैवेयक में जा मिथ्यात्व सहित रहे।

 

2-3

90

 

 

मूलोघवत्      

 

 

90

 

 

मूलोघवत्     

 

 

 

4

91

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

91-92

 

अंतर्मु.

1,3रे से 4थे में जा स्थान परिवर्तन करे

33 सागर    

सर्वार्थ सिद्धि में जा सम्यक्त्व सहित रहे

भवनवासी      

1

94

 

सर्वदा

 विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

95-96    

 

अंतर्मु.

1,3रे से 4थे में जा स्थान परिवर्तन करे

1 सागर+पल्य/असंख्यात

मिथ्यात्व सहित कुल काल बिताया।      

 

2-3

97

 

 

मूलोघवत्      

 

 

97

 

 

मूलोघवत्

 

 

मार्गणा

गुणस्थान     

नाना जीवापेक्षया

एक जीवापेक्षया

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

नं.1

नं.2

नं.1

नं.3

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

भवनवासी      

4

94

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

95-96

 

अंतर्मुहूर्त      

देव सामान्यवत् स्थान परि.

1 सागर–1 अंत. 1 सा.–4 अंत.

सम्यक्त्व सहित पूरा काल बितावें संयत मनुने वैमानिक की आयु बाँधी पीछे अपवर्तना घात द्वारा भवनवासी की रह गयी। वहाँ 6 पर्याप्ति प्राप्तकर सम्यक्त्वी हो रहा।    

व्यंतर

1

94

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

95-96

 

अंतर्मुहूर्त

देव सामान्यवत् स्थान परि.

1 पल्य-1अंत.

मिथ्यात्व सहित पूर्ण काल बिताया      

 

2-3

97

 

 —

मूलोघवत्      

 — 

   —

97

 

—

मूलोघवत्      

 —

 —

 

4

94

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव

सर्वदा        

विच्छेदाभाव

95-96

 

अंतर्मु.

देव सामान्यवत् स्थान परि.

1 पल्य-4अंत.

भवनवासीवत्  

ज्योतिषी      

1-4

94-97

 —

—

व्यंतरवत्      

 —

 —

95-97

  •  

 —

व्यंतरवत्      

 —

  —

सौधर्म-सहस्रार

1

94

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

95-96

  •  

 

अंतर्मु.

देव सामान्यवत् स्थान परि.

पल्य/असं.अधिक 2-18सागर     

अद्धायुष्क की अपेक्षा (मिथ्यात्व से अद्धायु का  अपवर्तना घात कर मरे तो) क्रमश: 2,7,10,14,16,18सागर+पल्य/असं.

 

2-3

97

 

 —

मूलोघवत्      

 —

 —

97

  •  

—

 —

मूलोघवत्      

 —

  —

 

4

94

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

95-96

  • —

अंतर्मु.

देव सामान्यवत् स्थान परि.

क्रमश: अंत.कम 2, 18

क्रमश: 2, 7, 10, 14, 16, 18 सागर से अंतर्मु. कम

आनत-अच्युत

1

98

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

99-100

  •  

अंतर्मु.

देव सामान्यवत् स्थान परि.

क्र. 20 व 22 सा.

उत्कृष्ट आयु पर्यंत वहाँ रहे   

 

2-3

101

 —

 —

मूलोघवत्      

 —

 —

101 

—

—

मूलोघवत्      

 —

 —

 

4

98

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

99-100

 

अंतर्मु.

देव सामान्यवत् स्थान परि.

क्र. 20 व 22 सा.

उत्कृष्ट आयु पर्यंत वहाँ रहे   

नव ग्रैवेयक

1

98

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

99-100

 

अंतर्मु.

देव सामान्यवत् स्थान परि.

क्र. 23-31 सा.

नौ ग्रैवेयकों में क्रमश: 23,24,25,26,27,28,29,30 व31 सागर 

 

2-3

101

 

 —

मूलोघवत्      

 —

  —

101

—

 —

मूलोघवत्      

 —

  —

 

4

98

 

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

99-100

 

अंतर्मु.

देव सामान्यवत् स्थान परि.

क्र. 23-31 सा.

इसी के 1ले गुणस्थानवत्     

नव अनुदिश      

4

102

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

103-104

 

31 सा.+1 समय 

मिथ्यात्व गुणस्थान का अभाव      

32 सागर    

उत्कृष्ट आयु  

विजय अपराजित

4

102

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

103-104

 

32 सागर 

मिथ्यात्व गुणस्थान का अभाव

33 सागर    

 उत्कृष्ट आयु

सर्वार्थ सिद्धि 

4

105

 

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

106

 

33 सागर 

जघन्य उत्कृष्ट दोनों समान 

33 सागर    

 उत्कृष्ट आयु

 


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