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कालानुयोग - ज्ञान मार्गणा

From जैनकोष

 ज्ञान मार्गणा

मार्गणा

गुणस्थान     

नाना जीवापेक्षया

एक जीवापेक्षया

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

नं.1

नं.2

नं.1 

नं.3

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

सू.

सू.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मति श्रुतअज्ञान      

 

 

31-32

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

133-135

अनंत

अनादि अनंत व अनादि सांत

अनंत 

जघन्यवत्

मति श्रुतज्ञान सादि सांत

 

 

31-32

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

136-137

अंतर्मु.

ज्ञान परिवर्तन

कुछ कम अर्ध पु.परि.

सम्यक्त्व से मिथ्यात्व फिर सम्यक्त्व देव नारकी में उपरोक्त प्रकार

विभंग सामान्य

 

 

31-32

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

139-140

1 समय      

उप.सम्य. देव नारकीद्विती.समय सासा.हो मरे। 

अंतर्मु.कम 33सा.

 

विभंग (मनु.तिर्य.)      

 

 

धवला/9/397

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

धवला/9/397

1 समय

औदारिक शरीर की संघातनपरिशातन कृति  

अंतर्मुहूर्त

 

मतिश्रुत अवधिज्ञान

 

 

31-32

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

142-143

अंतर्मु.

देव नारकी सम्यक्त्वी हो पुन: मिथ्या।

66 सागर+4पूर्व को.

(देखो काल/5)      

मन:पर्यय      

 

 

31-32

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

145-146

अंतर्मु.

इतने काल पश्चात् मरण  

8 वर्ष कम 1को.पू.

8 वर्ष में दीक्षा लेकर शेष उत्कृष्ट आयु पर्यंत 

केवलज्ञान      

 

 

31-32

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

 

145-146 ( कषायपाहुड़ )      

अंतर्मु.

इतने काल पश्चात् मरण

अंतर्मुहूर्त

   " (देखें दर्शन - 3.2)      

मतिश्रुत अज्ञान

1-2

260-261

 —

 —

मूलोघवत्      

 —

  —

260-261

 —

 —

मूलोघवत्     

 — 

   —

विभंग ज्ञान      

1

262

 

 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा     

विच्छेदाभाव      

263-264

 

अंतर्मु.

गुणस्थान परिवर्तन

33 सागर से अंतर्मु.कम अंतर्मुहूर्त

सप्तम पृथिवी की अपेक्षा

मनुष्य तिर्यंच की अपेक्षा

 

2

265

 —

 —

मूलोघवत्      

 —

  —

265

—

 —

मूलोघवत्

 —

   —

मतिश्रुतज्ञान

4-12

266

 

 

मूलोघवत्

 

 

266

 

 

मूलोघवत्

 

 

अवधिज्ञान      

1-4

266

 

 

मूलोघवत्

 

 

266

 

 

मूलोघवत्

 

 

 

5

266

 

 

मूलोघवत्

 

 

266

 —

मूलोघवत्

 —

4 अंत.कम 1 को.पू.

ओघ से 1 अंतर्मु.और भी कम है। क्योंकि सम्यक्त्व अवधि धारने में 1 अंतर्मु. लगा 

 

6-12

266

 

 

मूलोघवत्

 

 

266

 

 —

मूलोघवत्      

 —

 

मन:पर्यय      

6-12

267

 

 

मूलोघवत्

 

 

267

 

 

मूलोघवत्

 

 

केवल 

13-14

268

 

 

मूलोघवत्

 

 

268

 

 

मूलोघवत्

 

 

 


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