• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 101 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



एदे कालागासा धम्माधम्मा य पोग्गला जीवा । (101)

लब्भंति दव्वसण्णं कालस्स दु णत्थि कायत्तं ॥109॥

अर्थ: 

ये काल, आकाश, धर्म और अधर्म, पुद्गल, जीव `द्रव्य' संज्ञा को प्राप्त करते हैं; परन्तु काल के कायत्व नहीं है।

समय-व्याख्या: 

कालस्य द्रव्यास्तिकायत्वविधिप्रतिषेधविधानमेतत् ।

यथा खलु जीवपुद्गलधर्माधर्माकाशानि सकलद्रव्यलक्षणसद्भावाद्द्रव्यव्यपदेश भाञ्जि भवन्ति, तथा कालोऽपि । इत्येवं षड्द्रव्याणि । किन्तु यथा जीवपुद्गलधर्माधर्माकाशानांद्वयादिप्रदेशलक्षणत्वमस्ति अस्तिकायत्वं, न तथा लोकाकाशप्रदेशसंख्यानामपि कालाणूनामेक-प्रदेशत्वादस्त्यस्तिकायत्वम् । अत एव च पञ्चास्तिकायप्रकरणे न हीह मुख्यत्वेनोपन्यस्तःकालः । जीवपुद्गलपरिणामावच्छिद्यमानपर्यायत्वेन तत्परिणामान्यथानुपपत्त्यानुमीयमानद्रव्यत्वेना-त्रैवान्तर्भावितः ॥१०१॥

- इति कालद्रव्यव्याख्यानं समाप्तम् ।

समय-व्याख्या हिंदी : 

यह, काल को द्रव्य-पने के विधान का और अस्ति-काय-पने के निषेध का कथन है (अर्थात काल को द्रव्यपना है किन्तु अस्तिकायपना नहीं है ऐसा यहाँ कहा है)

जिस प्रकार वास्तव में जीव, पुद्‍गल, धर्म, अधर्म, और आकाश को द्रव्य के समस्त लक्षणों का सद्‍भाव होने से वे 'द्रव्य' संज्ञा को प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार काल भी (उसे द्रव्य के समस्त लक्षणों का सद्‍भाव होने से) 'द्रव्य' संज्ञा को प्राप्त करता है । इस प्रकार छह द्रव्य हैं । किन्तु जिस प्रकार जीव, पुद्‍गल, धर्म, अधर्म और आकाश को १द्वि-आदि प्रदेश जिसका लक्षण है ऐसा अस्ति-काय-पना है, उस प्रकार कालाणुओं को, यद्यपि उनकी संख्या लोकाकाश के प्रदेशों जितनी (असंख्य) है तथापि, एक प्रदेशीपने के कारण अस्ति-काय-पना नहीं है । और ऐसा होने से ही (अर्थात काल अस्ति-काय न होने से ही) यहाँ पंचास्तिकाय के प्रकरण में मुख्य रूप से काल का कथन नहीं किया गया है, (परन्तु) जीव-पुद्‍गलों के परिणाम द्वारा जो ज्ञात होती है / मापी जाती है ऐसी उसकी पर्याय होने से तथा जीव-पुद्‍गलों के परिणाम की अन्यथा अनुपपत्ति द्वारा जिसका अनुमान होता है, ऐसा वह द्रव्य होने से उसे यहाँ २अन्तर्भूत किया गया है ॥१०१॥

इस प्रकार काल द्रव्य का व्याख्यान समाप्त हुआ ।

१द्वि-आदि = दो या अधिक, दो से लेकर अनन्त तक।

२अन्तर्भूत करना = भीतर समा लेना, समाविष्ट करना, समावेश करना (इस 'पंचास्तिकाय संग्रह' नामक शास्त्र में काल का मुख्य रूप से वर्णन नहीं है, पाँच अस्तिकायों का मुख्य रूप से वर्णन है । वहाँ जीवास्तिकाय और पुद्‍गलास्तिकाय के परिणामों का वर्णन करते हुए, उन परिणामों द्वारा जिसके परिणाम ज्ञात होते हैं- मापे जाते हैं उस पदार्थ का / काल का तथा उन परिणामों की अन्यथा अनुपपत्ति द्वारा जिसका अनुमान होता है उस पदार्थ का / काल का गौण रूप से वर्णन करना उचित है- ऐसा मानकर यहाँ पंचास्तिकाय प्रकरण में गौण रूप से काल के वर्णन का समावेश किया गया है। )

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_101_-_समय-व्याख्या&oldid=115493"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki