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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 104 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



अभिवंदिऊण सिरसा अपुणब्भवकारणं महावीरं । (104)

तेसिं पयत्थभंगं मग्गं मोक्खस्स वोच्छामि ॥112॥

अर्थ: 

अपुनर्भव (मोक्ष) के कारण-भूत महावीर भगवान को शिर झुकाकर नमस्कार करके, उनके (छह द्रव्यों के) पदार्थ भंग को और मोक्ष के मार्ग को कहूँगा ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

इससे आगे [अभिवंदिऊण सिरसा] इत्यादि गाथा से प्रारंभ कर पचास गाथा पर्यंत अथवा टीका (समय-व्याख्या) के अभिप्राय से अड़तालीस गाथा पर्यंत जीवादि नव पदार्थ प्रतिपादक द्वितीय महाधिकार प्रारंभ होता है । वहाँ दश अन्तराधिकार हैं ।

उन दस अधिकारों में से सर्व-प्रथम नमस्कार गाथा से प्रारम्भकर पाठक्रम से चार गाथा पर्यन्त व्यवहार मोक्षमार्ग की मुख्यता से व्याख्यान करते हैं । इस प्रकार प्रथम अंतराधिकार में समुदाय पातनिका है । वह इस प्रकार --

((अपुनर्जनम के हेतु शिरसा नमन श्रीमहावीर को

कर कहूँगा उनके पदारथ भंग, मुक्तिमार्ग को ॥११२॥))

[अभिवंदिऊण] अभिवंद्य, प्रणाम कर / नमस्कार कर । कैसे नमस्कार कर ? [सिरसा] शिर से / शिर झुकाकर नमस्कार कर । किन्हें नमस्कार कर ? [अपुणब्भवकारणं महावीरं] अपुनर्भव / मोक्ष के कारण-भूत महावीर को नमस्कार कर । उन्हें नमस्कार करने के बाद क्या करता हूँ ? [वोच्छामि] उन्हें नमस्कार करने के बाद कहूँगा । किसे कहेंगे ? [तेसिं पयत्थभंगं] उन पंचास्तिकाय, षट् द्रव्यों के नवपदार्थ भेद को कहूँगा । न केवल नव पदार्थ को कहूँगा, अपितु [मग्गं मोक्खस्स] मोक्ष के मार्ग को भी कहूँगा ।

वह इसप्रकार -- मोक्ष सुख रूपी सुधारस-पान के पिपासित भव्यों को परम्परा से अनन्त ज्ञानादि गुण फल-रूप रत्नत्रयात्मक प्रवर्तमान महा धर्मतीर्थ के प्रतिपादक होने से मोक्ष के कारणभूत 'महावीर' नामक अंतिम जिनेश्वर को सर्वप्रथम नमस्कार करता हूँ । इसप्रकार गाथा-पूर्वार्ध द्वारा ग्रन्थकार मंगल के लिए इष्ट देवता को नमस्कार करते हैं । तत्पश्चात् उत्तरार्ध द्वारा शुद्धात्म-रुचि, प्रतीति, निश्चल अनुभूति रूप अभेद-रत्नत्रयात्मक निश्चय-मोक्ष-मार्ग के परंपरा कारण-भूत व्यवहार-मोक्ष-मार्ग को और उस ही व्यवहार-मोक्ष-मार्ग के अवयव-भूत दर्शन और ज्ञान के विषय-भूत होने से नव-पदार्थ को प्रतिपादित करता हूँ इसप्रकार प्रतिज्ञा करते हैं ।

यद्यपि आगे चूलिका में मोक्ष-मार्ग का विशेष व्याख्यान है; तथापि नौ पदार्थों की संक्षेप सूचना हेतु यहाँ भी उन्हें कहा गया है । उनकी संक्षेप सूचना कैसे है ? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं यहाँ सर्वप्रथम नव पदार्थों का व्याख्यान प्रस्तुत है (इससे स्पष्ट है कि उनका यहाँ संक्षेप सूचन है)। वे पदार्थ कैसे हैं ? वे व्यवहार मोक्ष-मार्ग में विषयभूत हैं ऐसा अभिप्राय है ॥११२॥

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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