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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 152 - तात्पर्य-वृत्ति

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जीवसहाओ णाणं अप्पडिहददंसणं अणण्णमयं । (152)

चरियं च तेसु णियदं अत्थित्तमणिंदियं भणियं ॥162॥

अर्थ: 

अनन्य-मय, अप्रतिहत ज्ञान-दर्शन जीव का स्वभाव है, तथा उनमें नियत अस्तित्व-मय अनिंदित चारित्र कहलाता है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जीवसहाओ णाणं अप्पडिहददंसणं अणण्णमयं] जीव का स्वभाव है । कर्तारूप क्या जीव का स्वभाव है ? ज्ञान और अप्रतिहत दर्शन जीव का स्वभाव है । वह कैसा है ? अनन्यमय, अभिन्न है, इसप्रकार पूर्वार्ध से जीव का स्वभाव कहा । [चरियं य तेसु णियदं अत्थित्तमणिंदियं भणियं] और चारित्र उन दोनों में नियत, अस्तित्व अनिंदित कहा गया है । वह क्या है ? चारित्र है । वह कैसा है ? अस्तित्वमय है । वह किस विशेषता वाला है ? उन ज्ञान-दर्शन में नियत, स्थित है । और किस विशेषता वाला है ? रागादि का अभाव होने से अनिंदित है; यही चारित्र मोक्षमार्ग है (ऐसा अर्थ है) ।

अथवा द्वितीय व्याख्यान: मात्र केवल-ज्ञान-दर्शन- ये दो ही जीव के स्वभाव नहीं हैं; अपितु पूर्वोक्त लक्षण चारित्र, स्वरूपास्तित्व भी जीव का स्वभाव है ।

यहाँ विस्तार करते हैं -- समस्त वस्तुओं सम्बंधी अनन्त धर्मों को युगपत् विशेष-रूप से जानने में समर्थ केवलज्ञान है तथा सामान्यरूप से युगपत् जानने (देखने) में समर्थ केवल-दर्शन है ये जीव के स्वभाव हैं । ये जीव के स्वभाव कैसे हैं ? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं सहज शुद्ध सामान्य-विशेष चैतन्यात्मक जीव अस्तित्व से संज्ञा, लक्षण, प्रयोजन आदि भेद होने पर भी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा अभेद होने से ये जीव के स्वभाव हैं । पूर्वोक्त जीव स्वभाव से अभिन्न उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक और इन्द्रिय व्यापार का अभाव होने से निर्विकार, अदूषित- इसप्रकार के गुण से विशिष्ट स्वरूपास्तित्वमय जीव-स्वभाव में नियत चारित्र है । वह चारित्र कैसे है ? -- 'स्वरूप में चरण / प्रवृत्ति चारित्र हैं' -- ऐसा वचन होने से वह चारित्र है । और वह दो प्रकार का है

  1. स्वयं आचरण नहीं करते हुए भी, पर से अनुभूत इष्ट काम-भोगों में स्मरण, अपध्यान लक्षण इत्यादि रूप परभाव-परिणमन परचारित्र है;
  2. तथा उससे विपरीत स्वचारित्र है ।
यह ही चारित्र परमार्थ शब्द से वाच्य मोक्ष का कारण है; इससे भिन्न कोई दूसरा मोक्ष का कारण नहीं है; -- ऐसा नहीं जानते हुए, मोक्ष से भिन्न असार संसार के कारण-भूत मिथ्यात्व-रागादि में निरत वर्तते हुए, हमारा ही अनन्तकाल व्यतीत हो गया; -- ऐसा जानकर मोक्ष के कारण-भूत उस ही जीव स्वभाव में नियत चारित्र निरंतर भावना करने योग्य है, ऐसा सूत्र-तात्पर्य है । वैसा ही कहा भी है

'असार संसार के कारणों में रत जीवों का इसीप्रकार ही (यों ही) समय व्यतीत हो गया; उन्होंने परमार्थ के कारणों का कारण कुछ भी नहीं जाना ।' ॥६२॥

इसप्रकार जीव-स्वभाव के कथन द्वारा और जीव-स्वभाव में नियत चारित्र ही मोक्षमार्ग है, इस कथन द्वारा प्रथम स्थल में गाथा पूर्ण हुई ।

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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