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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 153 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जीवो सहावणियदो अणियदगुणपज्जओध परसमओ । (153)

जदि कुणदि सगं समयं पब्भस्सदि कम्मबंधादो ॥163॥

अर्थ: 

स्वभाव नियत जीव यदि अनियत गुण-पर्याय वाला होता है तो वह पर-समय है; तथा यदि वह स्व-समय को करता है, तो कर्म-बंध से छूट जाता है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जीवो सहावणियदो] जीव निश्चय से स्वभाव में नियत होने पर भी [अणियदगुणपज्जओ य परसमओ] अनियत गुण-पर्याय वाला होता हुआ परसमय होता है ।

वह इसप्रकार -- वास्तव में तो जीव शुद्ध-नय से विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभावी है । पश्चात् व्यवहार से निर्मोह शुद्धात्मा की उपलब्धि से प्रतिपक्षभूत अनादि मोहोदय वश, मतिज्ञानादि विभाव गुण और मनुष्य-नारकी आदि विभाव पर्यायों रूप परिणमित होता हुआ परसमयरत परचारित्र होता है; परंतु जब निर्मल विवेक ज्योति से समुत्पादक परमात्मानुभूति लक्षण परमकला के अनुभव से शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी आत्मा की भावना करता है, तब स्व-समय, स्व-चारित्र-रत होता है । [जदि कुणदि सगं समयं] यदि स्व-समय को करता है; -- इसप्रकार स्वसमय-परसमय के स्वरूप को जानकर यदि निर्विकार स्व-सम्वित्तिरूप स्वसमय को करता है, उस रूप परिणमित होता है, [पब्भस्सदि कम्मबंधादो] प्रभ्रष्ट होता है कर्मबंध से; तब केवलज्ञान आदि अनन्त गुणों की प्रगटता रूप मोक्ष के प्रतिपक्ष-भूत जो वह बंध है, उससे च्युत होता है । इससे ज्ञात होता है कि स्व-सम्वित्ति-लक्षण स्व-समय रूप जीव-स्वभाव में नियत चारित्र ही मोक्ष-मार्ग है, ऐसा भावार्थ है ॥१६३॥

इसप्रकार स्वसमय-परसमय के भेद-सूचनरूप से गाथा पूर्ण हुई ।

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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