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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 159 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



णिच्छयणयेण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्पा । (159)

ण कुणदि किंचिवि अण्णं ण मुयदि मोक्खमग्गोत्ति ॥169॥

अर्थ: 

उन तीन में समाहित होता हुआ जो आत्मा वास्तव में न तो कुछ करता है और न छोडता है, वह मोक्षमार्ग है, ऐसा कहा गया है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[भणिदो] कहा गया है । किससे कहा गया है ? [णिच्छयणयेण] निश्चयनय से कहा गया है । वह कौन कहा गया है ? [जो अप्पा] जो आत्मा है वह कहा गया है । कैसा आत्मा कहा गया है ? [तिहि तेहिं समाहिदो य] उन तीन दर्शन-ज्ञान-चारित्र से समाहित, एकाग्र आत्मा कहा गया है । और भी जो क्या करता है ? [ण कुणदि किंचिवि अण्णं ण मुणदि किंचिदपि] शब्द से (भाव यह है कि) जो आत्मा से भिन्न क्रोधादि को नहीं करता है तथा आत्माश्रित अनन्त ज्ञानादि गुण-समूह को नहीं छोडता है । वह इसप्रकार के गुणों से विशिष्ट आत्मा; कैसा कहा गया है ? [मोक्खमग्गोत्ति] मोक्षमार्ग है, ऐसा कहा गया है ।

वह इसप्रकार -- निज शुद्धात्मा की रुचि, परिच्छित्ति / जानकारी, निश्चल अनुभूति रूप निश्चय-मोक्षमार्ग है; अविद्या / अज्ञानजन्य वासना के विलय (समाप्त) होने से उस (निश्चय- मोक्षमार्ग) के साधक कथंचित् स्वसम्वित्ति लक्षण भेद-रत्नत्रयात्मक व्यवहार-मोक्षमार्ग को प्राप्त होता हुआ, गुणस्थान सोपान (वीतरागता की श्रेणियों के) क्रम से निज शुद्धात्म-द्रव्य-मय भावना से उत्पन्न नित्यानन्द एक लक्षण सुखामृत रस के आस्वाद से तृप्तिरूप परम कला के अनुभव के कारण स्व-शुद्धात्मा के आश्रित रहनेवाले निश्चयदर्शन-ज्ञान-चारित्र के साथ जब अभेदरूप से परिणत होता है, तब निश्चयनय से भिन्न साध्य-साधन का अभाव होने से यह आत्मा ही मोक्षमार्ग है ।

इससे निश्चित हुआ कि सुवर्ण-पाषाण के समान निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्ग के साध्य-साधक भाव सदा सम्यक्तया होता है ॥१६९॥

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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