• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 15 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



भावस्स णत्थि णासो णत्थि अभावस्स चेव उप्पादो ।

गुणपज्जएसु भावा उप्पादवये पकुव्वंति ॥15॥

अर्थ: 

भाव का नाश नहीं है, अभाव का उत्पाद नहीं है, भाव गुण पर्यायों में उत्पाद व्यय करते हैं।

समय-व्याख्या: 

अत्रासत्‍पा्रदुर्भावत्‍वमुत्‍पादस्‍य यदुच्‍छेदत्‍वं विगमस्‍य निषिद्धम् । भावस्‍य सतो हि द्रव्‍यस्‍य न द्रव्‍यत्‍वेन विनाश:, अभावस्‍यासतोऽन्‍यद्रव्‍यस्‍य न द्रव्‍यत्‍वेनोत्‍पाद:, किन्‍तु भावा: सन्ति द्रव्‍याणि सदुच्‍छेदमसदुत्‍पादं चान्‍तरेणैव गुणपर्यायेषु विनाशमुत्‍पादं चारभन्‍ते । यथा हि घृतोत्‍पत्तौ गोरसस्‍य सतो न विनाश:, न चापि गोरसव्‍यतिरिक्तस्‍यार्थान्‍तरस्‍यासत: उत्‍पाद: किन्‍तु गोरस्‍सयैव सदुच्‍छेदमसदुत्‍पादं चानुपलभमानस्‍य स्‍पर्शरसगन्‍धवर्णादिषु परिणामिषु गुणेषु पूर्वावस्‍थया विनश्‍यत्‍सूत्तरावस्‍थया प्रादुर्भवत्‍सु नश्‍यति च नवनीतपर्यायो घृतपर्याय उत्‍पद्यते, तथा सर्वभावामपीति ॥१५॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

यहाँ उत्पाद में असत् का प्रादुर्भाव का और व्यय में सत् के विनाश का निषेध किया है (अर्थात उत्पाद होने से कहीं असत् की उत्पत्ति नहीं होती और व्यय होने से कहीं सत् का विनाश नहीं होता --ऐसा इस गाथा में कहा है ) ।

भाव का (सत् द्रव्य का) द्रव्य-रूप से विनाश नहीं है, अभाव का (असत् अन्य-द्रव्य का) द्रव्य-रूप से उत्पाद नहीं है; परन्तु भाव (सत् द्रव्य), सत् के विनाश और असत् के उत्पाद बिना ही, गुण-पर्यायों में विनाश और उत्पाद करते हैं । जिस प्रकार घी की उत्पत्ति में गोरस का (सत् का) विनाश नहीं है तथा गोरस से भिन्न पदार्थान्तर का (असत् का) उत्पाद नहीं है, किन्तु गोरस को ही, सत् का विनाश और असत् का उत्पाद किये बिना ही, पूर्व अवस्था से विनाश प्राप्त होने वाले और उत्तर अवस्था से उत्पन्न होने वाले स्पर्श-सर-गंध-वर्णादिक परिणामी गुणों में मक्खन पर्याय विनाश को प्राप्त होती है तथा घी पर्याय उत्पन्न होती है; उसी प्रकार सर्व भावों का भी वैसा ही है (अर्थात समस्त द्रव्यों को नवीन पर्याय की उत्पत्ति में सत् का विनाश नहीं है और असत् का उत्पाद नहीं है, किन्तु सत् का विनाश और असत् का उत्पाद बिना ही, पहले की--पुरानी अवस्था से विनाश को प्राप्त होने वाले और बाद की--नवीन अवस्था से उत्पन्न होनेवाले परिणामी गुणों में पहले की पर्याय का विनाश और बाद की पर्याय की उत्पत्ति होती है )॥१५॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_15_-_समय-व्याख्या&oldid=115613"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki