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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 163 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



अण्णाणादो णाणी जदि मण्णदि सुद्धसंपयोगादो । (163)

हवदित्ति दुक्खमोक्खो परसमयरदो हवदि जीवो ॥173॥

अर्थ: 

यदि अज्ञान से ज्ञानी ऐसा मानता है कि शुद्ध सम्प्रयोग (शुभभाव) से दु:ख-मोक्ष होता है तो वह जीव परसमयरत है ।

समय-व्याख्या: 

सूक्ष्मपरसमयस्वरूपाख्यानमेतत् ।

अर्हदादिषु भगवत्सु सिद्धिसाधनीभूतेषु भक्तिभावानुरञ्जिता चित्तवृत्तिरत्र शुद्धसम्प्रयोगः । अथ खल्वज्ञानलवावेशाद्यदि यावत् ज्ञानवानपि ततः शुद्धसम्प्रयो-गान्मोक्षो भवतीत्यभिप्रायेण खिद्यमानस्तत्र प्रवर्तते तदा तावत्सोऽपि रागलवसद्भावात्पर-समयरत इत्युपगीयते । अथ न किं पुनर्निरङ्कुशरागकलिकलङ्कितान्तरङ्गवृत्तिरितरो जनइति ॥१६३॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

यह, सूक्ष्म परसमय के स्वरूप का कथन है ।

सिद्धि के साधन-भूत ऐसे अर्हंतादि भगवन्तों के प्रति भक्ति-भाव से, १अनुरंजित चित्त-वृत्ति वह यहाँ 'शुद्ध-सम्प्रयोग' है । अब, २अज्ञान-लव के आवेश से यदि ज्ञानवान भी 'उस शुद्ध-सम्प्रयोग से मोक्ष होता है' ऐसे अभिप्राय द्वारा खेद प्राप्त करता हुआ उसमें (शुद्ध-सम्प्रयोग में) प्रवर्ते, तो तब तक वह भी ३रागलव के सद्भाव के कारण ४'परसमयरत' कहलाता है । तो फिर निरंकुश रागरूप क्लेश से कलंकित ऐसी अंतरंग वृत्तिवाला इतर जन क्या परसमयरत नहीं कहलाएगा ? (अवश्य कहलाएगा ही) ॥१६३॥

१अनुरंजित = अनुरक्त; रागवाली; सराग ।

२अज्ञानलव = किन्चित अज्ञान; अल्प अज्ञान ।

३रागलव = किन्चित राग; अल्प राग ।

४परसमयरत = परसमय में रत; परसमयस्थित; परसमय की ओर झुकाववाला; परसमय में आसक्त ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

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