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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 44 - तात्पर्य-वृत्ति

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अविभक्तमणण्णत्तं दव्वगुणाणं विभत्तमण्णत्तं । (44)

णेच्छन्ति णिच्चयण्हू तव्विवरीदं हि वा तेसिं ॥51॥

अर्थ: 

द्रव्य और गुणों के अविभक्तरूप अनन्यता है । निश्चय के ज्ञाता उनके (द्रव्य-गुणों के) विभक्तरूप अन्यता या उससे विपरीत विभक्तरूप अनन्यता स्वीकार नहीं करते हैं ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब, द्रव्य-गुणों के यथोचित (कथंचित्) अभिन्न प्रदेश रूप अनन्यता प्रदर्शित करते हैं --

[अविभक्तमणण्णत्तं] अविभक्त-रूप अनन्यता मानते हैं इसप्रकार क्रिया अध्याहार है (ऊपर से ले लेना) । किनकी मानते हैं ? [दव्वगुणाणं] द्रव्य-गुणों की मानते हैं ।

वह इसप्रकार -- जैसे परमाणु का वर्णादि गुणों के साथ अनन्यत्व, अभिन्नत्व है । वह अभिन्नत्व कैसा है ? वह अविभक्त-रूप अभिन्न प्रदेशत्व है; उसी प्रकार शुद्ध जीव-द्रव्य में केवल-ज्ञानादि की व्यक्ति / प्रगटता-रूप स्वभाव गुणों का और अशुद्ध जीव में मति-ज्ञानादि की व्यक्ति-रूप विभाव-गुणों का तथा और शेष द्रव्यों-गुणों का यथा-सम्भव अभिन्न प्रदेश लक्षण अनन्यत्व जानना चाहिए ।

[विभत्तमण्णत्तं णेच्छन्ति] विभक्त-रूप अन्यत्व नहीं मानते हैं । वह इसप्रकार -- अन्यत्व, भिन्नत्व नहीं मानते हैं । वह कैसा नहीं मानते हैं ? सह्य-और विन्ध्य के समान विभक्त-रूप भिन्न प्रदेश नहीं मानते हैं । कौन नहीं मानते हैं ? [णिच्चयण्हू] निश्चय को जानने वाले जैन नहीं मानते हैं । वे मात्र भिन्न प्रदेश-रूप अन्यत्व नहीं मानते, इतना ही नहीं; अपितु [तव्विवरीदं हि वा] उससे विपरीत भी [तेसिं] उन द्रव्य गुणों का नहीं मानते हैं; उससे अन्य होने के कारण विपरीत, तद्विपरीत, इसका अनन्यत्व ऐसा अर्थ है । वह किस विशेषता-वाला होने पर भी नहीं मानते हैं ? भिन्न (स्वभावी) दूध-पानी के समान, एक क्षेत्रावगाह होने पर भी भिन्न प्रदेश नहीं मानते हैं । वे ऐसा क्यों नहीं मानते हैं ? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं -- सह्य-विन्ध्य के समान, दूध-पानी के समान, उन द्रव्य-गुणों के भिन्न प्रदेशों का अभाव होने से, वे ऐसा नहीं मानते हैं ।

अथवा द्रव्य-गुणों का सर्वथा अनन्यत्व, अभिन्नत्व नहीं मानते हैं । किस-रूप में नहीं मानते हैं ? जैसे वे प्रदेशों की अपेक्षा अभिन्न हैं; उसी प्रकार संज्ञा आदि की अपेक्षा भी अभिन्न हैं -- ऐसा एकान्त / सर्वथा अविभक्त नहीं मानते हैं । मात्र इस प्रकार का अनन्यत्व नहीं मानते, इतना ही नहीं; अपितु अन्यत्व, भिन्नत्व भी नहीं मानते हैं । वह किस-रूप में नहीं मानते हैं? जैसे संज्ञादि की अपेक्षा भिन्न है; उसी प्रकार प्रदेशों की अपेक्षा भी भिन्न हैं इसप्रकार एकान्त / सर्वथा विभक्त नहीं मानते हैं । मात्र सर्वथा अनन्यत्व-अन्यत्व नहीं मानते हैं, इतना ही नहीं; अपितु [तेव्विवरीदे हि वा तेसिं] इसप्रकार पाठांतर होने से, उन दोनों से विपरीत अथवा परस्पर सापेक्ष अनन्यत्व-अन्यत्व से विपरीत, निरपेक्ष नहीं मानते हैं; उन दोनों से विपरीत तद्विपरीत (तृतीया तत्पुरुष) अथवा उन दोनों विपरीतों से -- ऐसा विश्लेषण कर, उन द्रव्य-गुणों का सर्वथा अनन्यत्व-अन्यत्व नहीं मानते हैं; किन्तु परस्पर सापेक्षरूप से स्वीकार करते हैं -- ऐसा अर्थ है ।

यहाँ इस गाथा-सूत्र में विशुद्ध ज्ञान-दर्शन-स्वभावी आत्म-तत्त्व से अन्यत्व-रूप जो विषय-कषाय हैं उनसे रहित; तथा उसी परम चैतन्य-रूप परमात्म-तत्त्व से जो अनन्यत्व-स्वरूप निर्विकल्प, परमाह्लाद, एकरूप सुखामृत-रसमय आस्वाद अनुभवन, उससे सहित पुरुषों को जो लोकाकाश प्रमाण असंख्येय शुद्ध प्रदेशों के साथ केवलज्ञानादि गुणों का अनन्यत्व है, वह ही उपादेय है -- ऐसा भावार्थ है ॥५२॥

इस प्रकार संक्षेप में गुण-गुणी के भेदाभेद व्याख्यान की मुख्यता से तीन गाथायें पूर्ण हुईं ।

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
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