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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 80 - तात्पर्य-वृत्ति

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एयरसवण्णगंधं दो फासं सद्दकारणमसद्दं । (80)

खंदंतरिदं दव्वं परमाणु तं वियाणाहि ॥88॥

अर्थ: 

जो एक रस, एक वर्ण, एक गंध, दो स्पर्श वाला है, शब्द का कारण और अशब्द है, स्कन्धों के अन्दर है, उसे परमाणु द्रव्य जानो।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[एयरसवण्णगंधं दोफासं] एक रस-वर्ण-गंध, दो स्पर्श हैं । वह इसप्रकार -- वहाँ परमाणु में

  • तिक्त आदि पाँच रस पर्यायों में से एक समय में कोई एक रस रहता है ।
  • शुक्ल आदि पाँच वर्ण पर्यायों में से एक समय में कोई एक वर्ण रहता है ।
  • सुरभि-दुरभि रूप दो गंध पर्यायों में से एक समय में कोई एक गंध रहती है ।
  • शीत-स्निग्ध, शीत-रूक्ष, उष्ण-स्निग्ध, उष्ण-रूक्ष, इन चार स्पर्श पर्याय के युगलों में से एक समय में कोई एक युगल स्पर्श रहता है ।
[सद्दकारणमसद्दं] शब्द का कारण होने पर भी आत्मा के समान अशब्द है । जैसे आत्मा व्यवहार से तालु, औष्ठपुट-व्यापार से (दोनों ओठों के हलन-चलन रूप व्यापार से) शब्द का कारण-भूत होने पर भी निश्चय से अतीन्द्रिय ज्ञान का विषय होने के कारण शब्द-ज्ञान का विषय नहीं है; अथवा शब्द आदि पुद्गल पर्याय रूप नहीं होता है, उस कारण अशब्द है; उसीप्रकार परमाणु भी शक्ति रूप से शब्द का कारण-भूत होने पर भी एक प्रदेशी होने के कारण शब्द की व्यक्ति / प्रगटता का अभाव होने से अशब्द है । [खंदंतरिदं दव्वं परमाणु तं वियाणाहि] परमात्मा के समान कहे गए वर्णादि गुण शब्दादि पर्याय की वृत्ति से विशिष्ट जो स्कन्ध के अन्दर स्कन्ध में द्रव्यरूप परमाणु को जानो । वह इसप्रकार -- जैसे परमात्मा व्यवहार से द्रव्य-भाव रूप कर्म-स्कन्धों के अंतर्गत होने पर भी निश्चय-नय से शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी हैं; उसी प्रकार परमाणु भी व्यवहार से स्कंध के अन्तर्गत होने पर भी निश्चय नय की अपेक्षा स्कंध से बहिर्भूत / भिन्न शुद्ध द्रव्यरूप ही है ।

अथवा [स्कंदांतरित] इसका क्या अर्थ है ? स्कन्ध से पहले ही वह उससे भिन्न है -- ऐसा अभिप्राय है ॥८८॥

इस प्रकार परमाणु द्रव्य के वर्णादि गुणों का स्वरूप और शब्द आदि पर्याय के स्वरूप-कथन की अपेक्षा पाँचवीं गाथा पूर्ण हुई ।

इस प्रकार परमाणु द्रव्य-रूप से दूसरे स्थल में समुदाय की अपेक्षा पाँच गाथायें पूर्ण हुईं ।

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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