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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 81 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



उवभोज्जमिंदिएहिं य इन्दियकाया मणो य कम्माणि । (81)

जं हवदि मुत्तिमण्णं तं सव्वं पोग्गलं जाणे ॥89॥

अर्थ: 

इन्द्रियों द्वारा उपभोग्य विषय, इन्द्रियाँ, शरीर, मन, कर्म और अन्य जो कुछ मूर्त है, वह सब पुद्गल जानो।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[उवभोज्जमिंदिएहिं] वीतराग अतीन्द्रिय-सुख के आस्वाद से रहित जीवों के जो

  • उपभोग्य पंचेन्द्रिय विषय स्वरूप, [इन्दियकाया] अतीन्द्रिय आत्म-स्वरूप से विपरीत इन्द्रिय;
  • अशरीर आत्म-पदार्थ से प्रतिपक्ष-भूत औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस, कार्मण शरीर नामक पाँच शरीर,
  • [मणो य] और मनोगत विकल्प-जाल से रहित शुद्ध जीवास्ति-काय से विपरीत मन;
  • [कम्माणि] कर्म-रहित आत्म-द्रव्य से प्रतिकूल ज्ञानावरणादि आठ कर्म;
  • [जं हवदि मुत्तिमण्णं] अमूर्त आत्म-स्वभाव से प्रतिपक्ष-भूत अन्य भी जो मूर्त प्रत्येक अनन्त की संख्या वाले संख्येय, असंख्येय, अनन्त अणु-स्कन्ध रूप अनन्त अविभागी परमाणु राशि रूप [तं सव्वं पोग्गलं जाणे]
वे सभी और अन्य नोकर्मादि भी पुद्गल जानो, इस प्रकार पुद्गल-द्रव्य के कथन का उपसंहार हुआ ॥८९॥

इस प्रकार पुद्गलास्तिकाय के उपसंहार-रूप से तृतीय स्थल में एक गाथा पूर्ण हुई ।

इस प्रकार पंचास्तिकाय षड्द्रव्य प्रतिपादक प्रथम महाधिकार में दश गाथा पर्यंत तीन स्थल द्वारा पुद्गलास्ति-काय नामक पाँचवाँ अन्तराधिकार पूर्ण हुआ । अब इसके बाद अनन्त केवल-ज्ञानादि रूप से उपादेय-भूत शुद्ध जीवास्ति-काय से भिन्न हेय-रूप धर्म-अधर्मास्तिकाय अधिकार में सात गाथायें हैं । उन सात गाथाओं में से

  • धर्मास्ति-काय के स्वरूप-कथन की मुख्यता से [धम्मत्थिकायमरसं] इत्यादि पाठ-क्रम से तीन गाथायें हैं ।
  • तत्पश्चात् अधर्मास्तिकाय-स्वरूप के निरूपण की मुख्यता से [जह हवदि] इत्यादि एक गाथा सूत्र है ।
  • तदनन्तर धर्म-अधर्म दोनों के समर्थन की मुख्यता से और दोनों के अस्तित्व के अभाव में दूषण की मुख्यता से [जादो अलोग] इत्यादि पाठ-क्रम से तीन गाथायें हैं ।
इस प्रकार सात गाथाओं द्वारा तीन स्थलों के माध्यम से धर्माधर्मास्तिकाय व्याख्यान में सामूहिक उत्थानिका पूर्ण हुई ।

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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