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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 81 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



उवभोज्जमिंदिएहिं य इन्दियकाया मणो य कम्माणि । (81)

जं हवदि मुत्तिमण्णं तं सव्वं पोग्गलं जाणे ॥89॥

अर्थ: 

इन्द्रियों द्वारा उपभोग्य विषय, इन्द्रियाँ, शरीर, मन, कर्म और अन्य जो कुछ मूर्त है, वह सब पुद्गल जानो।

समय-व्याख्या: 

सकलपुद्गलविकल्पोपसंहारोऽयम् ।

इन्द्रियविषयाः स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाश्च, द्रव्येन्द्रियाणि स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुः-श्रोत्राणि, कायाः औदारिकवैक्रियकाहारकतैजसकार्मणानि, द्रव्यमनः, द्रव्यकर्माणि, नोकर्माणि, विचित्रपर्यायोत्पत्तिहेतवोऽनन्ताः अनन्ताणुवर्गणाः, अनन्ता असंख्येयाणुवर्गणाः, अनन्ताः संख्येयाणुवर्गणाः द्वयणुकस्क न्धपर्यंताः, परमाणवश्च, यदन्यदपि मूर्तं तत्सर्वं पुद्गलविकल्पत्वेनोपसंहर्तव्यमिति ॥८१॥

- इति पुद्गलद्रव्यास्तिकायव्याख्यानं समाप्तम् ।

समय-व्याख्या हिंदी : 

यह, सर्व पुद्‍गल भेदों का उपसंहार है ।

स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द रूप (पाँच) इंद्रिय-विषय, स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र रूप (पाँच) द्रव्येन्द्रियाँ, औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्माण रूप (पाँच) काया, द्रव्य-मन, द्रव्य-कर्म, नोकर्म, विचित्र पर्यायों की उत्पत्ति के हेतुभूत (अर्थात अनेक प्रकार की पर्यायें उत्पन्न होने के कारण-भूत) १अनन्त अनन्ताणुक वर्गणाएँ, अनन्त असंख्याताणुक वर्गणाएँ और द्वि-अणुक स्कंध तक की अनन्त संख्याताणुक वर्गणाएँ तथा परमाणु, तथा अन्य भी जो कुछ मूर्त हो वह सब पुद्‍गल के भेद रूप से समेटना ।

इस प्रकार पुद्गल द्रव्यास्तिकाय का व्याख्यान समाप्त हुआ ॥८१॥

अब धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय का व्याख्यान है ।

१लोक में अनन्त परमाणुओं की बनी हुई वर्गणाएँ अनन्त हैं, असंख्यात परमाणुओं की बनी हुई वर्गणाएँ भी अनन्त हैं और (द्वि-अणुक स्कंध, त्रि- अणुक स्कंध इत्यादि) संख्यात परमाणुओं की बनी हुई वर्गणाएँ भी अनन्त हैं । (अविभागी परमाणु भी अनंत है) ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

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