• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 82 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



धम्मत्थिकायमसं अवण्णगंधं असद्दमप्फासं । (82)

लोगागाढं पुट्ठं पिहुलमसंखादियपदेसं ॥90॥

अर्थ: 

धर्मास्तिकाय अरस, अवर्ण, अगन्ध, अशब्द, अस्पर्श स्वभावी है; लोकव्यापक है, अखण्ड, विशाल और असंख्यातप्रदेशी है।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[धम्मत्थिकायं] धर्मास्तिकाय है । [अरसमवण्णमगंधमसद्दमप्फासं] रस, वर्ण, गंध, शब्द, स्पर्श से रहित हैं । [लोगागाढ] लोक-व्यापक है । [पुट्ठ] निर्विकार स्व-संवेदन ज्ञान परिणत जीव-प्रदेशों में परम आनन्द एक लक्षण सुख-रस के आस्वाद-मय समरसी भाव के समान, सिद्ध-क्षेत्र में सिद्ध-समूह के समान, पूर्ण घट में भरे जल के समान या तिल में तेल के समान स्पृष्ट है; परस्पर प्रदेशों में व्यवधान / अन्तर से रहित होने के कारण निरन्तर है; निर्जन-प्रदेश में आत्मा को भाते हुए (आत्मा में लीन) मुनि-समूह के समान या नगर में स्थित जन-समूह के समान सांतर / अंतर-सहित नहीं है; [बहुलं] अभव्य जीव के प्रदेशों में स्थित मिथ्यात्व-रागादि के समान या लोक में स्थित नभ / आकाश के समान विशाल है; स्वभावत: ही अनादि-अनन्त रूप से विस्तृत है; केवली समुद्घात में जीव-प्रदेशों के समान अथवा लोक में वस्त्रादि-प्रदेशों के विस्तार के समान यह विस्तृत नहीं है । वह और किस विशेषता वाला है? [असंखादियपदेसं] निश्चय से अखण्ड एक प्रदेशी होने पर भी सद्भूत व्यवहार से लोकाकाश प्रमाण असंख्यात-प्रदेशी है, ऐसा सूत्रार्थ है ॥९०॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_82_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=115778"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki