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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 86 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



जादो अलोगलोगो जेसिं सब्भावदो य गमणठिदी । (86)

दो वि य मया विभत्ता अविभत्ता लोयमेत्ता य ॥94॥

अर्थ: 

जिनके सद्भाव से लोक-अलोक का विभाग है, (जीव-पुद्गलों की ) गति-स्थिति है, वे दोनों विभक्त और अविभक्त स्वरूप तथा लोकप्रमाण माने गए हैं।

समय-व्याख्या: 

धर्माधर्मसद्भावे हेतूपन्यासोऽयम् ।

धर्माधर्मौ विद्येते । लोकालोकविभागान्यथानुपपत्तेः । जीवादिसर्वपदार्थानामेकत्र वृत्तिरूपो लोकः । शुद्धैकाकाशवृत्तिरूपोऽलोकः । तत्र जीवपुद्गलौ स्वरसत एवगतितत्पूर्वस्थितिपरिणामापन्नौ । तयोर्यदि गतिपरिणामं तत्पूर्वस्थितिपरिणामं वा स्वय-मनुभवतोर्बहिरङ्गहेतू धर्माधर्मौ न भवेताम्, तदा तयोर्निरर्गलगतिस्थितिपरिणामत्वादलोकेऽपि वृत्तिः केन वार्येत । ततो न लोकालोकविभागः सिध्येत । धर्माधर्मयोस्तु जीव-पुद्गलयोर्गतितत्पूर्वस्थित्योर्बहिरङ्गहेतुत्वेन सद्भावेऽभ्युपगम्यमाने लोकालोकविभागो जायत इति । किञ्च धर्माधर्मौ द्वावपि परस्परं पृथग्भूतास्तित्वनिर्वृत्तत्वाद्विभक्तौ । एक-क्षेत्रावगाढत्वादविभक्तौ । निष्क्रियत्वेन सकललोकवर्तिनोर्जीवपुद्गलयोर्गतिस्थित्युपग्रहकरणा-ल्लोकमात्राविति ॥८६॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

यह, धर्म और अधर्म के सद्‍भाव की सिद्धि के लिये हेतु दर्शाया गया है ।

धर्म और अधर्म विद्यमान है, क्योंकि लोक और अलोक का विभाग अन्यथा नहीं बन सकता । जीवादि सर्व पदार्थों के एकत्र-अस्तित्व-रूप लोक है, शुद्ध एक आकाश के अस्तित्व-रूप अलोक है । वहाँ जीव और पुद्‍गल स्व-रस से ही (स्वभाव से ही) गति-परिणाम को तथा गति-पूर्वक स्थिति-परिणाम को प्राप्त होते हैं । यदि गति-परिणाम अथवा गति-पूर्वक स्थिति-परिणाम का स्वयं अनुभव करने वाले उन जीव-पुद्‍गल को बहिरंग हेतु धर्म और अधर्म न हो, तो जीव-पुद्‍गल के १निरर्गल गति-परिणाम और स्थिति-परिणाम होने से अलोक में भी उनका (जीव-पुद्‍गल का) होना किससे निवारा जा सकता है ? (किसी से नहीं निवारा जा सकता) । इसलिये लोक और अलोक का विभाग सिद्ध नहीं होता । परन्तु यदि जीव-पुद्‍गल की गति के और गति-पूर्वक स्थिति के बहिरंग हेतुओं के रूप में धर्म और अधर्म का सद्‍भाव स्वीकार किया जाये तो लोक और अलोक का विभाग (सिद्ध) होता है । (इसलिये धर्म और अधर्म विद्यमान है) और (उनके सम्बन्ध में विशेष विवरण यह है कि), धर्म और अधर्म दोनों परस्पर पृथग्भूत अस्तित्व से निष्पन्न होने से विभक्त (भिन्न) हैं, एक-क्षेत्रावगाही होने से अविभक्त (अभिन्न) हैं, समस्त लोक में विद्यमान जीव-पुद्‍गलों को गति स्थिति में निष्क्रिय-रूप से अनुग्रह करते हैं इसलिये (निमित्त-रूप होते हैं इसलिये) लोक-प्रमाण हैं ॥८६॥

१निरर्गल= निरंकुश, अमर्यादित ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

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