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ग्रन्थ

ग्रन्थ:पद्मपुराण - पर्व 113

From जैनकोष



एक सौ तेरहवां पर्व

अथानंतर रात्रि व्यतीत होने पर स्वर्ण के समान सूर्य ने दीप्ति से जगत् को उस तरह प्रकाश मान कर दिया जिस तरह कि साधु वाणी के द्वारा प्रकाशमान करता है ॥1॥ सूर्य ने नक्षत्र समूह को हटाकर कमलों के समूह को उस तरह विकसित कर दिया जिस तरह कि जिनेंद्रदेव भव्यों के समूह को विकसित कर देते हैं ॥2॥ जिस प्रकार पहले तपोवन को जाते हुए भरत ने अपने मित्रजनों से पूछा था उसी प्रकार महासंवेग से युक्त, तथा निःस्पृह चित्त हनूमान् ने मित्रजनों से पूछा ॥3॥ तदनंतर जिनके नेत्र अत्यंत दीन तथा चश्चल थे, जो परम उद्वेग को धारण कर रहे थे एवं जो प्रेम से भरे हुए थे ऐसे मंत्रियों ने स्वामी से प्रार्थना की कि हे देव ! आप हम लोगों को अनाथ करने के योग्य नहीं हैं। हे उत्तम गुणों के धारक प्रभो ! भक्तों पर प्रसन्न हूजिए और उनका पालन कीजिए ॥4-5। इसके उत्तर में हनूमान ने कहा कि तुम लोग परम अनुयायी होकर भी हमारे अनर्थकारी बांधव हो; हितकारी नहीं ॥6॥ जो संसार समुद्र से पार होते हुए मनुष्य को उसी में गिरा देते हैं वे हितकारी कैसे कहे जा सकते हैं ? वे तो यथार्थ में वैरी ही हैं ॥7॥ जब मैंने नरकवास में बहुत भारी दुःख पाया था तब माता-पिता, मित्र, भाई-कोई भी सहायता को प्राप्त नहीं हुए थे; किसी ने सहायता नहीं की थी ॥8॥ दुर्लभ मनुष्य-पर्याय और जिन-शासन का ज्ञान प्राप्त कर बुद्धिमान् मनुष्य को निमेष मात्र भी प्रमाद करना उचित नहीं है ॥9॥ परम प्रीति से युक्त आप लोगों के साथ रहकर जिस प्रकार भोग की प्राप्ति हुई है उसी प्रकार अब कर्म-निर्मित तीव्र विरह भी अवश्यंभावी है ॥10॥ अपने-अपने कर्म के आधीन रहने वाले ऐसे कौन देवेंद्र असुरेंद्र अथवा मनुष्येंद्र हैं जो कालरूपी दावानल से व्याप्त हो विनाश को प्राप्त न हुए हों ? ॥11॥ मैंने स्वर्ग में अनेकों बार हजारों पल्य तक भोग भोगे हैं फिर भी सूखे ईंधन से अग्नि के समान तृप्त नहीं हुआ ॥12।। गमनागमन को देने वाला यह कर्म मुझसे भी अधिक महाबलवान है। मेरा शरीर तो अब अक्षम-असमर्थ हो गया है ॥13।। प्राणी जिस दुर्गम जन्म संकट को पाकर मोहित हो जाते हैं― स्वरूप को भूल जाते हैं। मैं उसे उल्लंघन कर गर्भातीत पद को प्राप्त करना चाहता हूँ॥14॥

इस प्रकार वज्रमय शरीर को धारण करने वाले हनूमान् ने जब अपनी दृढ़ चेष्टा दिखाई तब उसके अंतःपुर की स्त्रियों में रुदन का महाशब्द उत्पन्न हो गया ॥15॥ तदनंतर समझाने में समर्थ एवं नाना प्रकार के वृत्तांतों का निरूपण करने वाले वचनों के द्वारा विषाद से पीडित, व्यग्र स्त्रियों को सांत्वना देकर तथा समस्त पुत्रों को यथाक्रम से राजधर्म में लगाकर व्यवस्था पटु तथा शुभ कार्य में मन को स्थिर करने वाले राजा हनूमान्, मित्रों के बहुत बड़े समूह से परिवृत हो विमानरूपी भवन से बाहर निकले ॥16-18॥ जो रत्न और सुवर्ण से देदीप्यमान थी, छोटे-छोटे गोले, दर्पण, फन्नूस तथा नाना प्रकार के चमरों से सुंदर थी और दिव्य-कमल के समान नाना प्रकार के वेलबूटों से सुशोभित थी ऐसी पालकी पर सवार हो परम अभ्युदय को धारण करने वाला श्रीमान हनुमान जिस ओर मंदिर का उद्यान था उसी ओर चला ॥19-20॥ जिस पर पताकाएँ फहरा रही थीं तथा जो मालाओं से सहित थीं ऐसी उसकी पालकी देखकर लोग हर्ष तथा विषाद दोनों को प्राप्त हो रहे थे और दोनों ही कारणों से उनके नेत्रों में आँसू छलक रहे थे ॥21॥ जो नाना प्रकार के वृत्तों से मंडित था, मैंना, भ्रमर तथा कोयल के कोलाहल से व्याप्त था और जिसमें नाना फूलों की केशर से सुगंधित वायु बह रही थी ऐसे मंदिर के उस महोद्यान में उस समय धर्मरत्न नामक यशस्वी मुनि विराजमान थे ॥22-23॥

जिनका मन वैराग्य की भावना से आप्लुत था ऐसे बाहुबली जिस प्रकार पहले धर्मरूपी रत्नों की महाराशि स्वरूप अत्यंत उत्तम योगी-श्री ऋषभ जिनेंद्र के समीप गये थे उसी प्रकार वैराग्य भावना से आप्लुत हृदय हनूमान् पालकी से उतरकर आकाशगामी एवं चारणर्षियों से आवृत उन भगवान् धर्मरत्न नामक मुनिराज के समीप पहुँचा ।।24-25॥ पहुँचते ही उसने प्रणाम किया, बहुत बड़ी गुरुपूजा की और तदनंतर हस्तरूपी कमल-कुड्मलों को शिर पर धारण कर कहा कि हे महामुने ! मैं आपसे दीक्षा लेकर तथा शरीर से ममता छोड़ निर्द्वंद्व विहार करना चाहता हूँ अतः मुझ पर प्रसन्नता कीजिए ॥26-27॥ यह सुन उत्तम हृदय के धारक मुनिराज ने कहा कि बहुत अच्छा, ऐसा ही हो, जगत् को निःसार देख अपना परम कल्याण करो ॥28॥ विनश्वर शरीर से अविनाशी पद प्राप्त करने के लिए जो तुम्हारी कल्याणरूपिणी बुद्धि उत्पन्न हुई है यह बहुत उत्तम बात है ॥29॥

इस प्रकार मुनि की आज्ञा पाकर जो वैराग्य के वेग से सहित था, जिसने प्रणाम किया था, और जो संतुष्ट होकर पद्मासन से विराजमान था ऐसे हनूमान् ने मुकुट, कुंडल, हार तथा अन्य आभूषण, वस्त्र और मानसिक परिग्रह को तत्काल छोड़ दिया ॥30-31।। उसने स्त्री रूपी बेड़ी तोड़ डाली थी, ममता से उत्पन्न जाल को जला दिया था, स्नेह रूपी पाश छेद डाली थी, सुख को विष के समान छोड़ दिया था, अत्यंत भंगुर शरीर को अद्भुत अपकारी देख वैराग्य रूपी दीपक की शिखा से मोहरूपी अंधकार को नष्ट कर दिया था, और कमल को जीतने वाली अपनी सुकुमार अंगुलियों से शिर के बाल नोच डाले थे। इस प्रकार समस्त परिग्रह से रहित, मुक्ति रूपी लक्ष्मी के सेवक, महाव्रतधारी, और वैराग्य लक्ष्मी से युक्त उत्तम हनुमान अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥32-34॥ उस समय वैराग्य और स्वामिभक्ति से प्रेरित, उदारात्मा, शुद्ध हृदय और महासंवेग में वर्तमान सात सौ पचास विद्याधर राजाओं ने अपने-अपने पुत्रों के लिए राज्य देकर मुनिपद धारण किया ॥35-67॥ इस प्रकार जिनके चित्त अत्यंत प्रसन्न थे, तथा जिनके सब कलंक छूट गये थे ऐसे वे विद्युतगति आदि नाम को धारण करने वाले मुनि हनूमान् की शोभा को प्राप्त थे अर्थात उन्हीं के समान शोभायमान थे ॥38॥

तदनंतर जो वियोगरूपी अग्नि से संतप्त थीं, महाशोकदायी अत्यंत करुण विलाप कर परम निर्वेद-वैराग्य को प्राप्त हुई थीं, श्रीमती थीं, संसार से भयभीत थीं, धीमती थीं, महा आभूषणों से रहित थीं, और शीलरूपी आभूषण को धारण करने वाली थीं ऐसी राज स्त्रियों ने बंधुमती नाम की प्रसिद्ध आर्यिका के पास जाकर तथा भक्तिपूर्वक नमस्कार और उत्तम पूजा कर दीक्षा धारण कर ली ॥39-41।। उस समय उन सबके लिए वैभव जीर्णतृण के समान जान पड़ने लगा था सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम पुरुष राग करने वालों से अत्यंत विरक्त रहते ही हैं ॥42॥ इस प्रकार जो व्रत, गुप्ति और समिति के मानो उच्च पर्वत थे ऐसे श्री हनूमान् मुनि महातप रूपी धन के धारक, धीमान और गुण तथा शीलरूपी आभूषणों से सहित थे ।।43॥ हर्ष से भरे बड़े-बड़े राजा जिनकी स्तुति करते थे, अप्सराएँ जिन्हें नमस्कार करती थीं, जिन्होंने मोह की राशि भस्म कर दी थी, जो मुनियों में उत्तम थे, तथा पुरुषों में सूर्य के समान थे ऐसे श्रीशैल महामुनि ने सर्वज्ञ प्रतिपादित निर्मल आचार का पालन कर तथा जिनेंद्र संबंधी पूर्णज्ञान प्राप्त कर निर्वाण गिरि से सिद्ध पद प्राप्त किया ॥44-45।।

इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, श्री रविषेणचार्य द्वारा कथित पद्मपुराण में हनूमान् के निर्वाण का वर्णन करने वाला एक सौ तेरहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥113॥


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