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ग्रन्थ

ग्रन्थ:पद्मपुराण - पर्व 114

From जैनकोष



एक सौ चौदहवां पर्व

अथानंतर लक्ष्मण के आठ वीर कुमारों और हनूमान की दीक्षा का समाचार सुन श्रीराम यह कहते हुए हँसे कि अरे ! इन लोगों ने क्या भोग भोगा ? ॥1॥ जो दूरदर्शी मनुष्य, विद्यमान भोग को छोड़कर दीक्षा लेते हैं जान पड़ता है कि वे ग्रहों से आक्रांत हैं अथवा वायु के वशीभूत हैं । भावार्थ-या तो उन्हें भूत लगे हैं या वे वायु की बीमारी से पीड़ित हैं ॥2॥ जान पड़ता है कि ऐसे लोगों की औषधि करने वाले कुशल वैद्य नहीं हैं इसीलिए तो वे मनोहर भोगों को छोड़ बैठते हैं ॥3॥ इस प्रकार भोगों के महासंग से होने वाले सुख रूपी सागर में निमग्न तथा चारित्र-मोहनीय कर्म के वशीभूत श्रीरामचंद्र की बुद्धि जड़रूप हो गई थी ॥4॥ भोगने में आये हुए अल्प सुख से उपलक्षित संसारी प्राणियों को यदि किसी के लोकोत्तर सुख का वर्णन सुनने में भी आता है तो प्रायः वह आश्चर्य उत्पन्न करता है ॥5॥ इस प्रकार महाभोगों में निमग्न तथा प्रेम से बंधे हुए उन राम-लक्ष्मण का काल चारित्र रूपी धर्म से निरपेक्ष होता हुआ व्यतीत हो रहा था ॥6॥

अथानंतर किसी समय महा कांति से युक्त, उत्कृष्ट ऋद्धि से सहित, धैर्य और गांभीर्य से उपलक्षित सौधर्मेंद्र देवों की सभा में आकर विराजमान हुआ ॥7॥ नाना अलंकारों को धारण करने वाले समस्त मंत्री उसकी सेवा कर रहे थे इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो अन्य छोटे पर्वतों से परिवृत सुमेरु महापर्वत ही हो ।।8।। कांति से आच्छादित सिंहासन पर बैठा हुआ वह सौधर्मेंद्र सुमेरु के शिखर पर विराजमान जिनेंद्र की शोभा को धारण कर रहा था ॥9॥ चंद्रमा और सूर्य के समान उत्तम प्रकाश वाले रत्नों से उसका शरीर अलंकृत था । वह मनोहर रूप से सहित तथा नेत्रों को आनंद देने वाला था ॥10।। जिसकी बहुत भारी कांति फैल रही थी ऐसे निर्मल हार को धारण करता हुआ वह ऐसा जान पड़ता था मानो सीतोदा नदी के प्रवाह को धारण करता हुआ निषध पर्वत ही हो ॥11॥ हार, कुंडल, केयूर आदि उत्तम आभूषणों को धारण करने वाले देव उस सौधर्मेंद्र को सब ओर से घेरे हुए थे इसलिए वह नक्षत्रों से आवृत चंद्रमा के समान जान पड़ता था ॥12॥ इंद्र तथा देवों के लिए जो चंद्रमा और नक्षत्रों का सादृश्य कहा है वह मनुष्य की अपेक्षा है क्योंकि स्वर्ग के देव और ज्योतिषी देवों में बड़ा अंतर है। भावार्थ― मनुष्य लोक में चंद्रमा और नक्षत्र उज्ज्वल दिखते हैं इसलिए इंद्र तथा देवों को उनका दृष्टांत दिया है यथार्थ में चंद्रमा नक्षत्र रूप ज्योतिषी देवों से स्वर्गवासी देवों की ज्योति अधिक है और देवों की ज्योति से इंद्रों की ज्योति अधिक है।।13।। वह इंद्र स्वयं महाप्रभाव से संपन्न था और अपने तेज से दशों दिशाओं को प्रकाशमान कर रहा था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो जिनेंद्र संबंधी अत्यंत ऊँचा अशोक वृक्ष ही हो ॥14॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि यदि सब लोग मिल कर हजारों जिह्वाओं के द्वारा निरंतर उसका वर्णन करें तो सैकड़ों वर्षों में भी वर्णन पूरा नहीं हो सकता ॥15॥

तदनंतर उस इंद्र ने, यथायोग्य आसनों पर बैठे लोकपाल आदि शुद्ध हृदय के धारक देवों के समक्ष इस पुराण का वर्णन किया ।।16।। पुराण का वर्णन करते हुए उसने कहा कि अहो देवो ! जिन्होंने अत्यंत दुःसाध्य, सुख को नष्ट करने वाले तथा महाशत्रु स्वरूप इस संसाररूपी महाअसुर को ज्ञानरूपी चक्र के द्वारा नष्ट कर दिया है और जो समस्त दोष रूपी अटवी को जलाने के लिए अग्नि के समान हैं उन परमोत्कृष्ट अर्हंत भगवान् की तुम निरंतर भक्तिपूर्वक भाव रूपी फूलों से अर्चा करो ॥17-18॥ कषायरूपी उन्नत तरंगों से युक्त तथा कामरूपी मगर-मच्छों से व्याप्त संसार रूपी सागर से जो भव्य जीवों को पार लगाने में समर्थ हैं, उत्पन्न होते ही जिनका इंद्र लोग सुमेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से उत्कृष्ट अभिषेक करते हैं। तथा भक्ति से युक्त, मोक्ष पुरुषार्थ में चित्त को लगाने वाले एवं अपने-अपने परिजनों से सहित इंद्र लोग तदेकाग्र चित्त होकर जिनकी पूजा करते हैं ॥19-211॥ विंध्य और कैलाश पर्वत जिसके स्तन हैं तथा समुद्र की लहरें जिसकी मेखला हैं ऐसी पृथिवी रूपी स्त्री का त्यागकर तथा मुक्ति रूपी स्त्री को लेकर जो विद्यमान हैं ॥22॥ महामोह रूपी अंधकार से आच्छादित, धर्महीन तथा स्वामीहीन इस संसार को जिन्होंने स्वर्ग के अग्रभाग से आकर उत्तम प्रकाश प्राप्त कराया था ॥23॥ और जिस प्रकार सिंह हाथियों को नष्ट कर देता है उसी प्रकार अत्यंत अद्भुत पराक्रम को धारण करने वाले जिन्होंने आठ कर्म रूपी शत्रुओं को क्षणभर में नष्ट कर दिया है ॥24॥ जिनेंद्र-भगवान्, अर्हंत, स्वयंभू, शंभु, ऊर्जित, स्वयंप्रभ, महादेव, स्थाणु, कालंजर, शिव, महाहिरण्यगर्भ, देवदेव, महेश्वर, सद्धर्म चक्रवर्ती, विभु, तीर्थकर, कृति, संसारसूदन, सूरि, ज्ञानचक्षु और भवांतक इत्यादि यथार्थ नामों से विद्वज्जन जिनकी स्तुति करते हैं ।।25-27॥ उत्तम भक्ति से युक्त नरेंद्र और देवेंद्र गूढ़ तथा अगूढ़ अर्थ को धारण करने वाले अत्यंत निर्मल शब्दों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं ॥28॥ जिनके प्रसाद से जीव कर्मरहित हो तीन लोक के अग्रभाग में स्वस्वभाव में स्थित रहते हुए विद्यमान रहते हैं ॥29॥ जिनका इस प्रकार का माहात्म्य स्मृति में आने पर भी पाप का नाश करने वाला है और जिनका परम दिव्य पुराण हर्ष की उत्पत्ति का कारण है ॥30॥ हे आत्मकल्याण के इच्छुक देवजनो ! उन महा कल्याण के मूल देवाधिदेव जिनेंद्र भगवान् के तुम सदा भक्त होओ ॥31॥

इस अनादि-निधन संसार में अपने कर्मों से प्रेरित हुआ कोई विरला मनुष्य ही दुर्लभ मनुष्य पर्याय को प्राप्त करता है परंतु धिक्कार है कि वह भी मोह में फंस जाता है ॥32॥ जो 'अर्हंत' इस अक्षर से द्वेष करते हैं उन्हें चतुर्गति रूप बड़ी-बड़ी आवर्तों से सहित इस संसाररूपी महासागर में रत्नत्रय की प्राप्ति पुनः कैसे हो सकती है ? ॥33॥ जो बड़ी कठिनाई से मनुष्यभव पाकर रत्नत्रय से वर्जित रहता है, वह पापी रथ के चक्र के समान स्वयं भ्रमण करता रहता है ॥34॥ अहो धिक्कार है कि इस मनुष्य-लोक में कितने ही गतानुगतिक लोगों में संसार-शत्रु को नष्ट करने वाले जिनेंद्र भगवान का आदर नहीं किया ।।35।। यह जीव मिथ्या तप कर अल्प ऋद्धि का धारक देव होता है और वहाँ से च्युत होकर मनुष्य पर्याय पाता है फिर भी खेद है कि द्रोह करता है ॥36।। महामोह के वशीभूत हुआ यह जीव, मिथ्याधर्म में आसक्त हो बड़े-बड़े इंद्रों के इंद्र जो जिनेंद्र भगवान हैं उन्हें प्राप्त नहीं होता ॥37॥ विषय रूपी मांस में जिसकी आत्मा लुभा रही है ऐसा यह प्राणी मनुष्य पर्याय कर्म को पाकर मोहनीय के द्वारा मोहित हो रहा है, यह बड़े कष्ट की बात है ॥38॥ मिथ्यातप करने वाला प्राणी दुर्दैव के योग से यदि स्वर्ग भी प्राप्त कर लेता है तो वहाँ अपनी हीनता का अनुभव करता हुआ चिंतातुर हो जलता रहता है ।।39॥ वहाँ वह सोचता है कि अहो ! रत्नद्वीप के समान सुंदर जिन-शासन में पहुँचकर भी मुझ मंदबुद्धि ने आत्मा का हित नहीं किया अतः मुझे धिक्कार है ॥40॥ हाय हाय धिक्कार है कि मैं उन मिथ्या शास्त्रों के समूह तथा वचन-रचना में चतुर, पापी, मानी तथा स्वयं पतित दुष्ट मनुष्यों के द्वारा कुमार्ग में कैसे गिरा दिया गया ? ॥41॥ इस प्रकार मनुष्य-भव पाकर भी अधन्य तथा निरंतर दुःख उठाने वाले मनुष्यों के लिए यह उत्तम जिन-शासन दुर्ज्ञेय ही बना रहता है ॥42॥ स्वर्ग से च्युत हुए महर्द्धिक देव के लिए भी जिनेंद्र प्रतिपादित रत्नत्रय का पाना दुर्लभ है फिर अन्य प्राणी की तो बात ही क्या है ? ॥43॥ सब पर्यायों में उत्तम मनुष्य-पर्याय में निष्ठापूर्ण रत्नत्रय पाकर जो आत्मा का कल्याण करता है वही धन्य है तथा वही अनुगृहीत― उपकृत है ॥44॥

उसी सभा में बैठा हुआ इंद्ररूपी सूर्य, मन-ही-मन कहता है कि यहाँ की आयु पूर्ण होने पर मैं मनुष्य-पर्याय को कब प्राप्त करूँगा ? ॥45॥ कब विषयरूपी शत्रु को छोड़कर मन को अपने वश कर, तथा कर्म को नष्ट कर तप के द्वारा मैं जिनेंद्र संबंधी गति अर्थात् मोक्ष प्राप्त करूँगा ॥46।। यह सुन देवों में से एक देव बोला कि जब तक यह जीव स्वर्ग में रहता है तभी तक उसके ऐसा विचार होता है, जब हम सब लोग भी मनुष्य-पर्याय को पा लेते हैं तब यह सब विचार भूल जाता है ॥47॥ यदि इस बात का विश्वास नहीं है तो ब्रह्मलोक से च्युत तथा मनुष्यों के ऐश्वर्य से युक्त राम-बलभद्र को जाकर क्यों नहीं देख लेते ? ॥48॥

इसके उत्तर में महातेजस्वी इंद्र ने स्वयं कहा कि सब बंधनों में स्नेह का बंधन अत्यंत दृढ़ है ॥49॥ जो हाथ-पैर आदि अवयवों से बँधा है ऐसे प्राणी को मोक्ष हो सकता है परंतु स्नेहरूपी बंधन से बंधे प्राणी को मोक्ष कैसे हो सकता है ? ॥50॥ बेड़ियों से बँधा मनुष्य हजारों योजन भी जा सकता है परंतु स्नेह से बंधा मनुष्य एक अंगुल भी जाने के लिए समर्थ नहीं है ॥51।। लक्ष्मण, राम में सदा अनुरक्त रहता है वह इसके दर्शन करते-करते कभी तृप्त ही नहीं होता और अपने प्राण देकर भी उसका कार्य करना चाहता है ॥52॥ पलभर के लिए भी जिसके दूर होनेपर राम का मन बेचैन हो उठता है वह उस उपकारी लक्ष्मण को छोड़ने के लिए कैसे समर्थ हो सकता है ? ॥53॥ कर्म की यह ऐसी ही अद्भुत चेष्टा है कि बुद्धिमान मनुष्य भी विमोह को प्राप्त हो जाता है अन्यथा जिसने अपना समस्त भविष्य सुन रक्खा है ऐसा कौन सचेतन प्राणी आत्महित नहीं करता ॥54।। इस प्रकार अहो देवो ! प्राणियों के विषय में यहाँ और क्या कहा जाय? इतना ही निश्चित हुआ कि उत्तम प्रयत्न कर अच्छे हृदय से संसार रूपी शत्रु का नाश करना चाहिए ।।55॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि इस प्रकार यथार्थ मार्ग से अनुरक्त एवं जिनेंद्र भगवान् के गुणों के संग से अत्यंत पवित्र, सुरपति के द्वारा प्रदर्शित मनोहर मार्ग को पाकर जिनके चित्त विशुद्ध हो गये थे तथा जो मनुष्य-पर्याय प्राप्त करने की आकांक्षा रखते थे ऐसे सूर्य, चंद्र तथा कल्पवासी आदि देव संसार से भय को प्राप्त हुए ॥56॥

इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा प्रणीत पद्मपुराण में इंद्र और देवों के बीच हुई कथा का वर्णन करने वाला एक सौ चौदहवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥114॥


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