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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 100 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



ण भवो भंगविहीणो भंगो वा णत्थि संभवविहीणो । (100)

उप्पादो वि य भंगो ण विणा धोव्वेण अत्थेण ॥110॥

अर्थ: 

उत्पाद व्यय रहित नही होता, व्यय उत्पाद रहित नही होता है तथा उत्पाद और व्यय धौव्य रूप पदार्थ के बिना नहीं होते हैं ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथोत्पादव्ययध्रौव्याणां परस्परसापेक्षत्वं दर्शयति --

ण भवो भंगविहीणो निर्दोषपरमात्मरुचिरूपसम्यक्त्वपर्यायस्य भव उत्पादः तद्विपरीतमिथ्यात्वपर्यायस्यभङ्गं विना न भवति । कस्मात् । उपादानकारणाभावात्, मृत्पिण्डभङ्गाभावे घटोत्पाद इव । द्वितीयं चकारणं मिथ्यात्वपर्यायभङ्गस्य सम्यक्त्वपर्यायरूपेण प्रतिभासनात् । तदपि कस्मात् । 'भावान्तर-स्वभावरूपो भवत्यभाव' इति वचनात् । घटोत्पादरूपेण मृत्पिण्डभङ्ग इव । यदि पुनर्मिथ्यात्वपर्याय-भङ्गस्य सम्यक्त्वोपादानकारणभूतस्याभावेऽपि शुद्धात्मानुभूतिरुचिरूपसम्यक्त्वस्योत्पादो भवति, तर्ह्युपादानकारणरहितानां खपुष्पादीनामप्युत्पादो भवतु । न च तथा । भंगो वा णत्थि संभवविहीणो परद्रव्योपादेयरुचिरूपमिथ्यात्वस्य भङ्गो नास्ति । कथंभूतः । पूर्वोक्तसम्यक्त्वपर्यायसंभवरहितः ।कस्मादिति चेत् । भङ्गकारणाभावात्, घटोत्पादाभावे मृत्पिण्डस्येव । द्वितीयं च कारणंसम्यक्त्वपर्यायोत्पादस्य मिथ्यात्वपर्यायाभावरूपेण दर्शनात् । तदपि कस्मात् । पर्यायस्यपर्यायान्तराभावरूपत्वात्, घटपर्यायस्य मृत्पिण्डाभावरूपेणेव । यदि पुनः सम्यक्त्वोत्पादनिरपेक्षो भवतिमिथ्यात्वपर्यायाभावस्तर्ह्यभाव एव न स्यात् । कस्मात् । अभावकारणाभावादिति, घटोत्पादाभावे मृत्पिण्डाभावस्य इव । उप्पादो वि य भंगो ण विणा दव्वेण अत्थेण परमात्मरुचिरूपसम्यक्त्व-स्योत्पादस्तद्विपरीतमिथ्यात्वस्य भङ्गो वा नास्ति । कं विना । तदुभयाधारभूतपरमात्मरूपद्रव्यपदार्थंविना । कस्मात् । द्रव्याभावे व्ययोत्पादाभावान्मृत्तिकाद्रव्याभावे घटोत्पादमृत्पिण्डभङ्गाभाववदिति मित्यर्थंः ॥११०॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[ण भवो भंगविहीणो] निर्दोष परमात्मा की रुचिरूप सम्यक्त्व-पर्याय का उत्पाद, वह उससे विपरीत मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना नहीं होता । मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना सम्यक्त्व-पर्याय का उत्पाद क्यों नहीं होता? उपादानकारण का अभाव होने से जैसे मिट्टी के पिण्ड के विनाश बिना घड़े की उत्पत्ति नहीं होती उसीप्रकार मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना सम्यक्त्व-पर्याय की उत्पत्ति नहीं होती है । और दूसरा भी कारण है - मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश का सम्यक्त्व-पर्यायरूप से प्रतिभासन होने से उसके विनाश बिना सम्यक्त्व-पर्याय उत्पन्न नहीं होती है । उसके विनाश का सम्यक्त्व-पर्यायरूप से प्रतिभासन कैसे होता है? 'अभाव अन्य पदार्थ के स्वभावरूप होता है'- ऐसा वचन होने से जैसे मिट्टी के पिण्ड का अभाव घड़े की उत्पत्तिरूप से प्रतिभासित होता है; उसीप्रकार मिथ्यात्व-पर्याय का अभाव सम्यक्त्व-पर्याय की उत्पत्तिरूप से प्रतिभासित होता है ।

यदि सम्यक्त्व के उपादान-कारणभूत मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना ही शुद्धात्मा की अनुभूति-रुचि रूप सम्यक्त्व का उत्पाद होता है, तो उपादान-कारण से रहित आकाशफूल आदि का भी उत्पाद हो । परन्तु वैसा तो नहीं होता है । [भंगो वा णत्थि संभवविहीणो] परद्रव्य उपादेय है ऐसी रुचिरूप मिथ्यात्व का विनाश नही होता है । कैसे मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है? पहले कहे हुये सम्यक्त्व-पर्याय के उत्पाद से रहित मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है । सम्यक्त्व-पर्याय की उत्पत्ति के बिना मिथ्यात्व-पर्याय का विनाश क्यों नहीं होता है? विनाश के कारण का अभाव होने से, घड़े की उत्पत्ति के अभाव में मिट्टी के पिण्ड का विनाश नहीं होने के समान, सम्यक्त्व की उत्पत्ति के अभाव में मिथ्यात्व का विनाश नही होता है । और दूसरा भी कारण है - सम्यक्त्व पर्याय के उत्पाद का मिथ्यात्व-पर्याय के अभावरूप दर्शन होने के कारण, उसकी उत्पत्ति के बिना मिथ्यात्व-पर्याय नष्ट नहीं होती है । उसका उत्पाद मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना क्यों दिखाई नहीं देता है? एक पर्याय के अन्य पर्याय की अभावरूपता होने से जैसे घटपर्याय का दर्शन मिट्टी के पिण्ड के अभावरूप से होता है; उसीप्रकार सम्यक्त्व-पर्याय का दिखाई देना मिथ्यात्व-पर्याय के विनाशरूप से होता है ।

यदि सम्यक्त्व की उत्पत्ति के बिना ही मिथ्यात्वपर्याय का अभाव होता है, तो उसका अभाव ही नहीं होगा । सम्यक्त्व की उत्पत्ति बिना मिथ्यात्व का अभाव क्यों नहीं होगा? अभाव के कारण का अभाव होने से (विनाश का कारण उत्पाद है, उसके नहीं होने से) घड़े की उत्पत्ति के अभाव में मिट्टी के पिण्ड का विनाश नहीं होने के समान सम्यक्त्व की उत्पत्ति के अभाव में मिथ्यात्व का विनाश नही होगा ।

[उप्पादो वि य भंगो ण विणा दव्वेण अत्थेण] परमात्मा की रुचिरूप सम्यक्त्व का उत्पाद तथा उससे विपरीत मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है । उन दोनों का उत्पाद-विनाश किसके बिना नहीं होता है? उन दोनों के आधारभूत परमात्मारूप द्रव्य-पदार्थ के बिना उन दोनों का उत्पाद-विनाश नहीं होता है । दोनों के आधारभूत परमात्म-पदार्थ के बिना दोनों का उत्पाद-विनाश क्यों नहीं होता है? द्रव्य के अभाव में विनाश और उत्पत्ति का अभाव होने से मिट्टी द्रव्य के अभाव में घड़े की उत्पत्ति तथा मिट्टी के पिण्ड का विनाश नहीं होने के समान परमात्म-द्रव्य के अभाव में सम्यक्त्व की उत्पत्ति और मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है ।

इसप्रकार जैसे सम्यक्त्व और मिथ्यात्व - इन दो पर्यायों में एक दूसरे की अपेक्षा सहित उत्पाद आदि तीनों दिखाये हैं, उसीप्रकार सभी द्रव्यों की पर्यायों में देख लेना चाहिये- समझ लेना चाहिये ॥११०॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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