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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 99 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



सदवट्ठिदं सहावे दव्वं दव्वस्स जो हि परिणामो । (99)

अत्थेसु सो सहावो ठिदिसंभवणाससंबद्धो ॥109॥

अर्थ: 

स्व भाव में स्थित द्रव्य सत् है, वास्तव में द्रव्य का जो उत्पाद-व्यय-धौव्य सहित परिणाम है-वह पदार्थों का स्वभाव है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथोत्पादव्ययध्रौव्यत्वे सति सत्तैव द्रव्यं भवतीति प्रज्ञापयति --

सदवट्ठिदं सहावे दव्वं द्रव्यं मुक्तात्मद्रव्यं भवति । किं कर्तृ । सदिति शुद्धचेतनान्वयरूपमस्तित्वम् । किंविशिष्टम् । अवस्थितम् । क्व । स्वभावे । स्वभावं कथयति -- दव्वस्स जो हि परिणामो तस्य परमात्मद्रव्यस्य संबन्धी हि स्फुटं यः परिणामः । केषु विषयेषु । अत्थेसु परमात्मपदार्थस्य धर्मत्वादभेदनयेनार्था भण्यन्ते । के ते । केवलज्ञानादिगुणाः सिद्धत्वादिपर्यायाश्च,तेष्वर्थेषु विषयेषु योऽसौ परिणामः । सो सहावो केवलज्ञानादिगुणसिद्धत्वादिपर्यायरूपस्तस्यपरमात्मद्रव्यस्य स्वभावो भवति । स च कथंभूतः । ठिदिसंभवणाससंबद्धो स्वात्मप्राप्तिरूपमोक्षपर्यायस्यसंभवस्तस्मिन्नेव क्षणे परमागमभाषयैकत्ववितर्कावीचारद्वितीयशुक्लध्यानसंज्ञस्य शुद्धोपादानभूतस्य समस्तरागादिविकल्पोपाधिरहितस्वसंवेदनज्ञानपर्यायस्य नाशस्तस्मिन्नेव समये तदुभयाधारभूतपरमात्म-द्रव्यस्य स्थितिरित्युक्तलक्षणोत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेण संबन्धो भवतीति । एवमुत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेणैकसमये यद्यपि पर्यायार्थिकनयेन परमात्मद्रव्यं परिणतं, तथापि द्रव्यार्थिकनयेन सत्तालक्षणमेव भवति ।त्रिलक्षणमपि सत्सत्तालक्षणं कथं भण्यत इति चेत् 'उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत्' इति वचनात् । यथेदंपरमात्मद्रव्यमेकसमयेनोत्पादव्ययध्रौव्यैः परिणतमेव सत्तालक्षणं भण्यते तता सर्वद्रव्याणीत्यर्थः ॥१०९॥

एवं स्वरूपसत्तारूपेण प्रथमगाथा, महासत्तारूपेण द्वितीया, यथा द्रव्यं स्वतःसिद्धं तथा सत्तागुणोऽपीति कथनेन तृतीया, उत्पादव्ययध्रौव्यत्वेऽपि सत्तैव द्रव्यं भण्यत इति कथनेन चतुर्थीति गाथाचतुष्टयेन सत्तालक्षणविवरणमुख्यतया द्वितीयस्थलं गतम् ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[सदवटि्ठदं सहावे दव्वं] द्रव्य-मुक्तात्मा द्रव्य है । वह द्रव्य क्या है? इस वाक्य में कर्ता क्या है? 'सत्' - ऐसा शुद्ध-चेतना का अन्वय (वही-वही) रूप अस्तित्व द्रव्य है । वह अस्तित्व किस विशेषता वाला है? वह अच्छी तरह से स्थित है । अच्छी तरह से कहाँ स्थित है? वह स्वभाव में अच्छी तरह स्थित है । (उस) स्वभाव (को) कहते है- [दव्वस्स जो हि परिणामो] उस परमात्म-द्रव्य सम्बन्धी स्पष्ट जो परिणाम है । किन विषयों में वह परिणाम है? [अत्थेसु] परमात्म-पदार्थ का धर्म-स्वभाव होने से अभेदनय से उन्हें अर्थ कहते हैं । वे अर्थ कौन है? केवलज्ञानादि गुण और सिद्धत्वादि पर्यायें अर्थ हैं । उन अर्थों-विषयों में जो वह परिणाम है । [सो सहावो] केवलज्ञानादि गुण और सिद्धत्वादि पर्यायरूप परिणमन उन परमात्म-द्रव्य का स्वभाव है । और वह स्वभाव कैसा है? [ठिदिसंभवणाससंबद्धो] निजात्मा की प्राप्तिरूप मोक्ष-पर्याय की उत्पत्ति, उसी समय परमागम की भाषा से एकत्ववितर्क-अवीचार रूप द्वितीय शुक्लध्यान नामक शुद्ध उपादानभूत समस्त रागादि विकल्पों की उपाधि (संयोग) रहित स्वसंवेदन-ज्ञान-पर्याय का नाश और उसी समय उन दोनों के आधारभूत परमात्म-द्रव्य की स्थिति-ध्रुवता -- इसप्रकार कहे गये लक्षणवाले उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य -- इन तीनों से सहित वह स्वभाव है ।

इस प्रकार यद्यपि पर्यायार्थिक-नय से एक समय में उत्पाद-व्यय-धौव्य -- इन तीनरूप परमात्मद्रव्य परिणत है, तथापि द्रव्यार्थिकनय से सत्ता लक्षण ही है । तीन लक्षण वाला होने पर भी सत् का सत्ता लक्षण कैसे कहा जाता है? यदि यह प्रश्न हो तो उत्तर देते हैं - 'सत् उत्पाद-व्यय और धौव्य सहित है' - ऐसा वचन होने से सत्ता लक्षण वाला कहा जाता है ।

जैसे यह परमात्म-द्रव्य, एक समय में उत्पाद-व्यय-धौव्य रूप से परिणमता हुआ ही सत्ता लक्षण वाला कहा गया है, उसीप्रकार सभी द्रव्य, एक ही समय में उत्पादादि रूप से परिणमित होते हुये सत्ता लक्षणवाले है - यह अर्थ है ॥१०९॥

इसप्रकार

  • स्वरूप-सत्तारूप से पहली गाथा,
  • महा-सत्तारूप से दूसरी गाथा,
  • जैसे द्रव्य स्वत-सिद्ध है वैसे सत्तागुण भी, इस कथनरूप तीसरी गाथा और
  • उत्पाद-व्यय-धौव्य सहित होने पर भी सत्ता ही द्रव्य कही गयी है - इस कथनरूप चौथी गाथा--
इसप्रकार चार गाथाओं द्वारा सत्तालक्षण विवरण की मुख्यता से दूसरा स्थल पूर्ण हुआ ।

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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