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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 103 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



पाडुब्भवदि य अण्णो पज्जाओ पज्जओ वयदि अण्णो । (103)

दव्वस्स तं पि दव्वं णेव पणट्ठं ण उप्पण्णं ॥113॥

अर्थ: 

द्रव्य की अन्य पर्याय उत्पन्न होती है और कोई अन्य पर्याय नष्ट होती है, फिर भी द्रव्य न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न होता है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ द्रव्यस्योत्पादव्ययध्रौव्याण्यनेकद्रव्यपर्यायद्वारेण चिन्तयति -

इह हि यथा किलैकस्त्र्य्युणक: समानजातीयोऽनेकद्रव्यपर्यायोविनश्यत्यन्यश्चतुरणुक: प्रजायते, ते तु त्रयश्चत्वारो वा पुद्‌गला अविष्टानुत्पन्ना एवावतिष्ठन्ते ।

तथा सर्वेऽपि समानजातीया द्रव्यपर्याया विनश्यन्ति प्रजायन्ते च समानजातीनि द्रव्याणि त्वविनष्टानुत्पन्नान्येवावतिष्ठन्ते ।

यथा चैको मनुष्यत्वलक्षणोऽसमानजातीयो द्रव्यपर्यायो विनश्यत्यन्यस्त्रिदशत्व-लक्षण: प्रजायते तौ च जीवपुद्‌गलौ अविनष्टानुत्पन्नावेवावतिष्ठेते ।

तथा सर्वऽप्यसमानजातीया द्रव्यपर्याया विनश्यन्ति प्रजायन्ते च असमानजातीनि द्रव्याणि त्वविनष्टानुत्पन्नान्यवावतिष्ठन्ते ।

एवमात्मना ध्रुवाणि द्रव्यपर्यायद्वारेणोत्पादव्ययीभूतन्युत्पादव्ययध्रौव्याणि द्रव्याणि भवन्ति ॥१०३॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

यहाँ (विश्व में) जैसे एक त्रि-अणुक समान-जातीय अनेक द्रव्य-पर्याय विनष्ट होती है और दूसरी १चतुरणुक (समान-जातीय अनेक द्रव्य-पर्याय) उत्‍पन्‍न होती है; परन्तु वे तीन या चार पुद्‌गल (परमाणु) तो अविनष्ट और अनुत्पन्न ही रहते हैं (ध्रुव हैं); इसी प्रकार सभी समान-जातीय द्रव्य-पर्यायें विनष्ट होती हैं और उत्पन्न होती हैं, किन्तु समान-जातीय द्रव्य तो अविनष्ट और अनुत्पन्न ही रहते हैं (ध्रुव हैं) ।

और, जैसे एक मनुष्यत्व-स्वरूप असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय विनष्ट होती है और दूसरी देवत्व-स्वरूप (असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय) उत्‍पन्‍न होती है, परन्तु वह जीव और पुद्‌गल तो अविनष्ट और अनुत्पन्‍न ही रहते हैं, इसी प्रकार सभी असमान-जातीय द्रव्य-पर्यायें विनष्ट हो जाती हैं और उत्पन्न होती हैं, परन्तु असमान-जातीय द्रव्य तो अविनष्ट और अनुत्पन्न ही रहते हैं ।

इस प्रकार अपने से (१द्रव्य-रूप से) ध्रुव और द्रव्य-पर्यायों द्वारा उत्पाद-व्ययरूप ऐसे द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य हैं ॥१०३॥

१चतुरणुक = चार अणुओं का (परमाणुओं का) बना हुआ स्कंध ।

२ 'द्रव्य' शब्द मुख्यतया दो अर्थों में प्रयुक्त होता है : (१) एक तो सामान्य-विशेष के पिण्ड को अर्थात् वस्तु को द्रव्य कहा जाता है; जैसे- 'द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यस्वरूप है'; (२) दूसरे - वस्तु के सामान्य अंश को भी द्रव्य कहा जाता है; जैसे- 'द्रव्यार्थिक नय' अर्थात् सामान्यांशग्राही नय । जहाँ जो अर्थ घटित होता हो वहाँ वह अर्थ समझना चाहिये ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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