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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 103 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



पाडुब्भवदि य अण्णो पज्जाओ पज्जओ वयदि अण्णो । (103)

दव्वस्स तं पि दव्वं णेव पणट्ठं ण उप्पण्णं ॥113॥

अर्थ: 

द्रव्य की अन्य पर्याय उत्पन्न होती है और कोई अन्य पर्याय नष्ट होती है, फिर भी द्रव्य न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न होता है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ द्रव्यपर्यायेणोत्पादव्ययध्रौव्याणि दर्शयति --

पाडुब्भवदि य प्रादुर्भवति चजायते । अण्णो अन्यः कश्चिदपूर्वानन्तज्ञानसुखादिगुणास्पदभूतः शाश्वतिकः । स कः । पज्जाओ परमात्मावाप्तिरूपः स्वभावद्रव्यपर्यायः । पज्जओ वयदि अण्णो पर्यायो व्येति विनश्यति । कथंभूतः । अन्यःपूर्वोक्तमोक्षपर्यायाद्भिन्नो निश्चयरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिरूपस्यैव मोक्षपर्यायस्योपादानकारणभूतः । कस्य संबन्धी पर्यायः । दव्वस्स परमात्मद्रव्यस्य । तं पि दव्वं तदपि परमात्मद्रव्यं णेव पणट्ठं ण उप्पण्णं शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन नैव नष्टं न चोत्पन्नम् । अथवा संसारिजीवापेक्षया देवादिरूपो विभावद्रव्यपर्यायोजायते मनुष्यादिरूपो विनश्यति तदेव जीवद्रव्यं निश्चयेन न चोत्पन्नं न च विनष्टं, पुद्गलद्रव्यं वा द्वयणुक ादिस्कन्धरूपस्वजातीयविभावद्रव्यपर्यायाणां विनाशोत्पादेऽपि निश्चयेन न चोत्पन्नं न च विनष्टमिति । ततः स्थितं यतः कारणादुत्पादव्ययध्रौव्यरूपेण द्रव्यपर्यायाणां विनाशोत्पादेऽपि द्रव्यस्य विनाशो नास्ति, ततः कारणाद्द्रव्यपर्याया अपि द्रव्यलक्षणं भवन्तीत्यभिप्रायः ॥११३॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[पाडुब्भवदि य] और उत्पन्न होती है । [अण्णो] शाश्वत रहनेवाली (वैसी की वैसी रहने वाली) कोई नवीन अनन्त ज्ञान-सुखादि गुणों की स्थानभूत दूसरी । वह दूसरी कौन है? [पज्जाओ] परमात्मा (दशा) की प्राप्तिरूप स्वभाव-द्रव्यपर्याय । [पज्जओ वयदि अण्णो] पर्याय नष्ट होती है । कैसी पर्याय नष्ट होती है? पूर्वोक्त मोक्षपर्याय से भिन्न निश्चय रत्नत्रय स्वरूप निर्विकल्प समाधिरूप मोक्षपर्याय की उपादान कारणभूत पर्याय नष्ट होती है । वह पर्याय किस सम्बन्धी - किसकी है? [दव्वस्स] परमात्म द्रव्य की वह पर्याय है | [तं पि दव्वं] तो भी परमात्मद्रव्य [णेव पणट्ठं ण उप्पण्णं] शुद्ध द्रव्यार्थिकनय से न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है ।

अथवा संसारी जीव की अपेक्षा देवादिरूप विभाव-द्रव्यपर्याय उत्पन्न होती है, मनुष्यादिरूप पर्याय नष्ट होती है और वह जीवद्रव्य निश्चय से न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है अथवा पुद्गलद्रव्य द्वयणुकादि स्कंधरूप स्वजातीय-विभाव-द्रव्यपर्यायों के नष्ट और उत्पन्न होने पर भी निश्चय से उत्पन्न और विनष्ट नहीं होता है ।

इससे यह फलित हुआ कि जिस कारण उत्पाद-व्यय-धौव्य रूप से द्रव्य पर्यायों का विनाश और उत्पाद होने पर भी द्रव्य का विनाश नहीं होता है, उस कारण द्रव्यपर्यायें भी द्रव्य का लक्षण होती हैं - यह अभिप्राय है ॥११३॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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