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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 104 - तात्पर्य-वृत्ति

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परिणमदि सयं दव्वं गुणदो य गुणंतरं सद्‌विसिट्ठं । (104)

तम्हा गुणपज्जाया भणिया पुण दव्वमेव त्ति ॥114॥

अर्थ: 

अपनी सत्ता से अभिन्न द्रव्य स्वयं गुण से गुणान्तर रूप परिणमित होता है, इसलिये गुणपर्यायें द्रव्य ही कही गई हैं ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथद्रव्यस्योत्पादव्ययध्रौव्याणि गुणपर्यायमुख्यत्वेन प्रतिपादयति --

परिणमदि सयं दव्वं परिणमति स्वयंस्वयमेवोपादानकारणभूतं जीवद्रव्यं कर्तृ । कं परिणमति । गुणदो य गुणंतरं निरुपरागस्वसंवेदनज्ञान-गुणात् केवलज्ञानोत्पत्तिबीजभूतात्सकाशात्सकलविमलकेवलज्ञानगुणान्तरम् । कथंभूतं सत्परिणमति । सदविसिट्ठं स्वकीयस्वरूपत्वाच्चिद्रूपास्तित्वादविशिष्टमभिन्नम् । तम्हा गुणपज्जाया भणिया पुण दव्वमेव त्ति तस्मात् कारणान्न केवलं पूर्वसूत्रोदिताः द्रव्यपर्यायाः द्रव्यं भवन्ति, गुणरूपपर्याया गुणपर्याया भण्यन्ते तेऽपि द्रव्यमेव भवन्ति । अथवा संसारिजीवद्रव्यं मतिस्मृत्यादिविभावगुणं त्यक्त्वा श्रुतज्ञानादि-विभावगुणान्तरं परिणमति, पुद्गलद्रव्यं वा पूर्वोक्तशुक्लवर्णादिगुणं त्यक्त्वा रक्तादिगुणान्तरं परिणमति, हरितगुणं त्यक्त्वा पाण्डुरगुणान्तरमाम्रफलमिवेति भावार्थः ॥११४॥

एवं स्वभावविभावरूपा द्रव्यपर्यायागुणपर्यायाश्च नयविभागेन द्रव्यलक्षणं भवन्ति इति कथनमुख्यतया गाथाद्वयेन चतुर्थस्थलं गतम् ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[परिणमदि सयं दव्वं] स्वयं ही उपादानकारणभूत जीवद्रव्यरूप कर्ता परिणमित होता है । जीवद्रव्य किसरूप परिणमित होता है? [गुणदो य गुणंतरं] केवलज्ञान की उत्पत्ति के बीजभूत उपराग रहित-वीतराग स्वसंवेदनज्ञान गुण से परिपूर्ण निर्मल केवलज्ञान गुण स्वरूप दूसरी पर्यायरूप परिणमित होता है । सत् कैसा होता हुआ परिणमित होता है? [सदविसिट्ठं] अपने स्वरूप चैतन्यरूप अस्तित्व से अविशिष्ट-अभिन्न होता हुआ परिणमित होता है । [तम्हा गुण पज्जाया भणिया पुण दव्वमेव त्ति] इस कारण न केवल पूर्व गाथा (गाथा नं. ११३) में कही हुई द्रव्यपर्यायें द्रव्य हैं वरन् गुणरूप पर्यायें-गुणपर्यायें कहलाती है, वे भी द्रव्य ही हैं ।

अथवा संसारी जीवद्रव्य मति-स्मृति आदि विभावगुणों को छोड्कर श्रुतज्ञानादि दूसरे विभावगुण रूप परिणमित होता है, अथवा पुद्गलद्रव्य हरे गुण को छोड़कर दूसरे पीले बदलने वाले आम्रफल (आम) के समान पूर्वोक्त सफेद रंग आदि गुणों को छोड़कर लाल आदि गुणरूप परिणमित होता है- यह गाथा का भाव है ॥११४॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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