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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 125 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



अप्पा परिणामप्पा परिणामो णाणकम्मफलभावी । (125)

तम्हा णाणं कम्मं फलं च आदा मुणेदव्वो ॥135॥

अर्थ: 

आत्मा परिणामस्वभावी है, परिणाम ज्ञान-कर्म व कर्मफल रूप हैं; इसलिये ज्ञान, कर्म व कर्मफल आत्मा ही जानना चाहिये ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ ज्ञानकर्मकर्मफलान्यात्मत्वेन निश्चिनोति -

आत्मा हि तावत्परिणामात्मैव, परिणाम: स्वयमात्मेति स्वयमुक्तत्वात्‌ । परिणामस्तु

चेतनात्मकत्वेन ज्ञानं कर्म कर्मफलं वा भावितुं शील:, तन्मयत्वाच्चेतनाया: । ततो ज्ञानं कर्म कर्मफलं चात्मैव । एवं हि शुद्धद्रव्यनिरूपणायां परद्रव्यसंपर्कासंभवात्पर्यायाणां द्रव्यान्त:-प्रलयाच्च शुद्धद्रव्य एवात्मावतिष्ठते ॥१२५॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

प्रथम तो आत्मा वास्तव में परिणाम-स्वरूप ही है, क्योंकि परिणाम स्वयं आत्मा है ऐसा (११२वीं गाथा में भगवत्‌कुन्दकुन्दाचार्यदेव ने) स्वयं कहा है; तथा परिणाम चेतना-स्वरूप होने से ज्ञान, कर्म और कर्मफलरूप होने के स्वभाव वाला है, क्योंकि चेतना तन्मय (ज्ञानमय, कर्ममय अथवा कर्मफलमय) होती है । इसलिये ज्ञान, कर्म, कर्मफल आत्मा ही है ।

इस प्रकार वास्तव में शुद्धद्रव्य के निरूपण में परद्रव्य के संपर्क का (सम्बन्ध; संग) असंभव होने से और पर्यायें द्रव्य के भीतर प्रलीन हो जाने से आत्मा शुद्धद्रव्य ही रहता है ॥१२५॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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