• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 137 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जध ते णभप्पदेसा तधप्पदेसा हवंति सेसाणं । (137)

अपदेसो परमाणू तेण पदेसुब्भवो भणिदो ॥148॥

अर्थ: 

जैसे वे आकाश के प्रदेश हैं,वैसे ही शेष द्रव्यों के प्रदेश हैं । परमाणु अप्रदेशी है, उसके द्वारा प्रदेशों (को मापने सम्बन्धी) की उत्पत्ति कही गई है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ यदेवाकाशस्य परमाणुव्याप्तक्षेत्रं प्रदेश-लक्षणमुक्तं शेषद्रव्यप्रदेशानां तदेवेति सूचयति --

जध ते णभप्पदेसा यथा ते प्रसिद्धाः परमाणु-व्याप्तक्षेत्रप्रमाणाकाशप्रदेशाः तधप्पदेसा हवंति सेसाणं तेनैवाकाशप्रदेशप्रमाणेन प्रदेशा भवन्ति । केषाम् । शुद्धबुद्धैकस्वभावं यत्परमात्मद्रव्यं तत्प्रभृतिशेषद्रव्याणाम् । अपदेसो परमाणू अप्रदेशो द्वितीयादि-प्रदेशरहितो योऽसौ पुद्गलपरमाणुः तेण पदेसुब्भवो भणिदो तेन परमाणुना प्रदेशस्योद्भव उत्पत्तिर्भणिता । परमाणुव्याप्तक्षेत्रं प्रदेशो भवति । तदग्रे विस्तरेण कथयति इह तु सूचितमेव ॥१४८॥

एवं पञ्चमस्थले स्वतन्त्रगाथाद्वयं गतम् ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जध ते णभप्पदेसा] जैसे वे प्रसिद्ध परमाणु से व्याप्त क्षेत्र के बराबर आकाश के प्रदेश हैं [तधप्पदेसा हवंति सेसाणं] उसी आकाश के प्रदेश के प्रमाण से प्रदेश हैं । आकाश प्रदेश के प्रमाण से किनके प्रदेश हैं? शुद्ध-बुद्ध एक स्वभाव जो परमात्मद्रव्य तत्प्रभृति शेष द्रव्यों के प्रदेश हैं । [अपदेसो परमाणु] अप्रदेश-दूसरे आदि प्रदेशों से रहित जो वह पुद्गल परमाणु है, [तेण पदेसुब्भवो भणिदो] उस परमाणु द्वारा प्रदेशों की उत्पत्ति कही गई है । परमाणु से व्याप्त क्षेत्र प्रदेश है । वह आगे (१५१वीं गाथा में) विस्तार से कहा जायेगा, यहाँ तो सूचना मात्र दी है ॥१४८॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:प्रवचनसार_-_गाथा_137_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=134393"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 23 April 2024, at 13:55.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki