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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 154 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



तं सब्भावणिबद्धं दव्वसहावं तिहा समक्खादं । (154)

जाणदि जो सवियप्पं ण मुहदि सो अण्णदवियम्हि ॥166॥

अर्थ: 

[यः] जो जीव [तं] उस (पूर्वोक्त) [सद्‌भावनिबद्धं] अस्तित्व निष्पन्न, [त्रिधा समाख्यातं] तीन प्रकार से कथित, [सविकल्पं] भेदों वाले [द्रव्यस्वभावं] द्रव्यस्वभाव को [जानाति] जानता है, [सः] वह [अन्यद्रव्ये] अन्य द्रव्य में [न मुह्यति] मोह को प्राप्त नहीं होता ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथात्मनोऽन्यद्रव्यसंकीर्णत्वेऽप्यर्थनिश्चायकमस्तित्वं स्वपरविभावहेतुत्वेनोद्योतयति -

यत्खलु स्वलक्षणभूतं स्वरूपास्तित्वमर्थनिश्चायकमाख्यातं स खलु द्रव्यस्य स्वभाव एव, सद्भावनिबद्धत्वाद्‌द्रव्यस्वभावस्य । यथासौ द्रव्यस्वभावो द्रव्यगुणपर्यायत्वेन स्थित्यु-त्पादव्ययत्वेन च त्रितयीं विकल्पभूमिकामधिरूढ: परिज्ञायमान: परद्रव्ये मोहमपोह्य स्वपर-विभागहेतुर्भवति; तत: स्वरूपास्तित्वमेव स्वपरविभागसिद्धये प्रतिपदमवधार्यम्‌ ।

तथा हि - यच्चेतनत्वान्वयलक्षणं द्रव्यं, यश्चेतनाविशेषत्वलक्षणो गुणो, यश्चेतनत्व-व्यतिरेकलक्षण: पर्यायस्तत्त्रयात्मकं, या पूर्वोत्तरव्यतिरेकस्पर्शिना चेतनत्वेन स्थितिर्यावुत्तर पूर्वव्यतिरेकत्वेन चेतनस्योत्पादव्ययौ तत्त्रयात्मकं च स्वरूपास्तित्वं यस्य नु स्वभावोऽहं स खल्वयमन्य: । यच्चाचेतनत्वान्वयलक्षणं द्रव्यं, योऽचेतनाविशेषत्वलक्षणो गुणो, योऽचेतनत्वव्यतिरेकलक्षण: पर्यायस्तत्त्रयात्मकं, या पूर्वोत्तरव्यतिरेकस्पर्शिनाचेतनत्वेन स्थितिर्यावुत्तरपूर्वव्यतिरेकत्वेनाचेतनास्योत्पादव्ययौ तत्त्रयात्मकं च स्वरूपास्तित्वम्‌ यस्य तु स्वभाव: पुद्‌गलस्य स खल्वयमन्य: । नास्ति मे मोहोऽस्ति स्वपरविभाग: ॥१५४॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

जो, द्रव्य को निश्‍चित करने वाला, स्वलक्षणभूत स्वरूपअस्तित्व कहा गया है वह वास्तव में द्रव्य का स्वभाव ही है; क्योंकि द्रव्य का स्वभाव अस्तित्वनिष्‍पन्न (अस्तित्व का बना हुआ) है । द्रव्य-गुण-पर्यायरूप से तथा ध्रौव्य-उत्पाद-व्ययरूप से त्रयात्मक भेदभूमि‍का में आरुढ़ ऐसा यह द्रव्य-स्वभाव ज्ञात होता हुआ, पर-द्रव्य के प्रति मोह को दूर करके स्व-पर के विभाग का हेतु होता है, इसलिये स्वरूप-अस्तित्व ही स्व-पर के विभाग की सिद्धि के लिये पद-पद पर अवधारि‍त करना (लक्ष्य में लेना) चाहिये । वह इस प्रकार है --

  • चेतनत्व का अन्वय जिसका लक्षण है ऐसा जो द्रव्य,
  • चेतनाविशेषत्व (चेतन का विशेषपना) जिसका लक्षण है ऐसा जो गुण, और
  • चेतनत्व का व्यतिरेक जिसका लक्षण है ऐसी जो पर्याय
यह त्रयात्मक (ऐसा स्वरूप-अस्तित्व), तथा
  • पूर्व और उत्तर व्यतिरेक को स्पर्श करने वाले चेतनत्वरूप से जो ध्रौव्य और
  • चेतन के उत्तर तथा पूर्व व्यतिरेकरूप से जो उत्पाद और व्यय,
यह त्रयात्मक (ऐसा) स्वरूप-अस्तित्व जिसका स्वभाव है ऐसा मैं वास्तव में यह अन्य हूँ, (अर्थात् मैं पुद्‌गल से ये भिन्न रहा) । और
  • अचेतनत्व का अन्वय जिसका लक्षण है ऐसा जो द्रव्य,
  • अचेतना विशेषत्व जिसका लक्षण है ऐसा जो गुण और
  • अचेतनत्व का व्यतिरेक जिसका लक्षण है ऐसी जो पर्याय
यह त्रयात्मक (ऐसा स्वरूपअस्तित्व) तथा
  • पूर्व और उत्तर व्यतिरेक को स्पर्श करने वाले अचेतनत्वरूप से जो ध्रौव्य और
  • अचेतन के उत्तर तथा पूर्व व्यतिरेकरूप से जो उत्पाद और व्यय
यह त्रयात्मक स्वरूप-अस्तित्व जिस पुद्‌गल का स्वभाव है वह वास्तव में (मुझसे) अन्य है । (इसलिये) मुझे मोह नहीं है; स्व-पर का विभाग है ॥१५४॥

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