• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 18.1 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



तं सव्वट्ठवरिट्ठं इट्ठं अमरासुरप्पहाणेहिं ।

ये सद्दहंति जीवा तेसिं दुक्खाणि खीयंति ॥19॥

अर्थ: 

जो जीव सर्व पदार्थों में श्रेष्ठ, देव-असुरों में प्रधान इन्द्रों के द्वारा स्वीकृत, उन सर्वज्ञ भगवान की श्रद्धा करते हैं, उनके सभी दु:ख नष्ट हो जाते हैं ॥१९॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ तं पूर्वोक्तसर्वज्ञं ये मन्यन्ते ते सम्यग्दृष्टयोभवन्ति, परम्परया मोक्षं च लभन्त इति प्रतिपादयति --

तं सव्वट्ठवरिट्ठं तं सर्वार्थवरिष्ठं इट्ठं इष्टमभिमतं । कैः । अमरासुरप्पहाणेहिं अमरासुरप्रधानैः । ये सद्दहंति ये श्रद्दधति रोचन्ते जीवा भव्यजीवाः । तेसिं तेषाम् । दुक्खाणि वीतरागपारमार्थिक-सुखविलक्षणानि दुःखानि । खीयंति विनाशं गच्छन्ति, इति सूत्रार्थः ॥१९॥

निर्दोषिपरमात्मश्रद्धानान्मोक्षो भवतीति कथनरूपेण तृतीयस्थले गाथा गता ॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[तं सव्व्ट्ठवरिट्ठं] वे सम्पूर्ण पदार्थों में श्रेष्ठ, [इट्ठं] स्वीकृत हैं । वे सर्वोत्कृष्ट (सर्वज्ञ) किनसे स्वीकृत है? [अमरासुरप्पहाणेहिं] देवों और असुरों में प्रधान इन्द्रों से स्वीकृत हैं । [ये सद्दहन्ति] जो श्रद्धा-रुचि करते हैं [जीवा] भव्य जीव; जो भव्य जीव उनकी श्रद्धा करते हैं [तेसिं] उन श्रद्धालु भव्य जीवों के [दुक्खाणि] वीतराग-पारमार्थिक-सुख से भिन्न लक्षणवाले दुःख [खीयंति] नष्ट हो जाते हैं- यह गाथा का अर्थ है ॥१९॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:प्रवचनसार_-_गाथा_18.1_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=134489"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 23 April 2024, at 13:55.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki