• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 185 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



गेण्हदि णेव ण मुंचदि करेदि ण हि पोग्गलाणि कम्माणि । (185)

जीवो पोग्गलमज्झे वट्टण्णवि सव्वकालेसु ॥197॥

अर्थ: 

[जीव:] जीव [सर्वकालेषु] सभी कालों में [पुद्गलमध्ये वर्तमान: अपि] पुद्‌गल के मध्य में रहता हुआ भी [पुद्गलानि कर्माणि] पौद्‌गलिक कर्मों को [हि] वास्तव में [गृहाति न एव] न तो ग्रहण करता है, [न मुंचति] न छोड़ता है, और [न करोति] न करता है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथात्मनः कथं द्रव्यकर्मरूपपरिणामः कर्म न स्यादिति प्रश्ने समाधानंददाति --

गेण्हदि णेव ण मुंचदि क रेदि ण हि पोग्गलाणि कम्माणि जीवो यथा निर्विकल्पसमाधिरतः परममुनिः परभावं न गृह्णाति न मुञ्चति न च करोत्युपादानरूपेण लोहपिण्डो वाग्निं तथायमात्मा न च गृह्णातिन च मुञ्चति न च करोत्युपादानरूपेण पुद्गलकर्माणीति । किं कुर्वन्नपि । पोग्गलमज्झे वट्टण्णवि सव्वकालेसु क्षीरनीरन्यायेन पुद्गलमध्ये वर्त्तमानोऽपि सर्वकालेषु । अनेन कि मुक्तं भवति । यथा सिद्धो भगवान्पुद्गलमध्ये वर्त्तमानोऽपि परद्रव्यग्रहणमोचनकरणरहितस्तथा शुद्धनिश्चयेन शक्तिरूपेण संसारी जीवोऽपीति भावार्थः ॥१८५॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[गेण्हदि णेव ण मुंचदि करेदि ण हि पोग्गलाणि कम्माणि जीवो] जैसे विकल्प रहित समाधि में लीन परम-मुनि, परभाव को ग्रहण नहीं करते हैं, छोड़ते नहीं हैं और उपादान-रूप से करते नहीं है अथवा जैसे लोहपिण्ड अग्नि को ग्रहण नहीं करता, छोड़ता नहीं है और उपादानरूप से करता नहीं है; उसीप्रकार यह आत्मा पुद्गल कर्मों को न ग्रहण करता है, न छोड़ता है और न उपादानरूप से करता है । क्या करता हुआ भी आत्मा, यह सब नहीं करता है ? [पोग्गलमज्झे वट्टण्णवि सव्वकालेसु] दूध और पानी के हमेशा एक साथ रहने-रूप न्याय से सभी कालों में -- हमेशा पुद्गलों के बीच रहने पर भी, पुद्गल कर्मों का ग्रहण आदि नहीं करता है ।

इससे क्या कहा गया है ? अथवा इस सब कथन का क्या प्रयोजन है ? जैसे सिद्ध भगवान, पुद्गलों के बीच रहते हुये भी पर-द्रव्य को ग्रहण करने, छोड़ने और करने से रहित हैं, उसीप्रकार शुद्ध-निश्चय-नय की अपेक्षा, शक्ति-रूप से संसारी जीव भी इन सबसे रहित हैं -- ऐसा प्रयोजन है ॥१९७॥

अब, यदि यह आत्मा पुद्गल कर्म को नहीं करता है और न छोड़ता है, तो बन्ध कैसे होता है और मोक्ष भी कैसे होता है ? ऐसा प्रश्न होने पर उसके प्रति उत्तर देते हैं--

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:प्रवचनसार_-_गाथा_185_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=134501"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 23 April 2024, at 13:55.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki