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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 186 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



स इदाणिं कत्ता सं सगपरिणामस्स दव्वजादस्स । (186)

आदीयदे कदाइं विमुच्चदे कम्मधूलीहिं ॥198॥

अर्थ: 

[सः] वह [इदानीं] अभी (संसारावस्था में) [द्रव्यजातस्य] द्रव्य से (आत्मद्रव्य से) उत्‍पन्‍न होने वाले [स्वकपरिणामस्य] (अशुद्ध) स्वपरिणाम का [कर्ता सन्] कर्ता होता हुआ [कर्मशुलभि:] कर्मरज से [आदीयते] ग्रहण किया जाता है और [कदाचित् विमुच्‍यते] कदाचित् छोड़ा जाता है । =

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ यद्ययमात्मा पुद्गलकर्म न करोति न च मुञ्चति तर्हि बन्धः कथं,तर्हि मोक्षोऽपि कथमिति प्रश्ने प्रत्युत्तरं ददाति --

स इदाणिं कत्ता सं स इदानीं कर्ता सन् । स पूर्वोक्तलक्षणआत्मा, इदानीं कोऽर्थः एवं पूर्वोक्त नयविभागेन, कर्ता सन् । कस्य । सगपरिणामस्स निर्विकारनित्या-नन्दैकलक्षणपरमसुखामृतव्यक्तिरूपकार्यसमयसारसाधकनिश्चयरत्नत्रयात्मककारणसमयसारविलक्षणस्यमिथ्यात्वरागादिविभावरूपस्य स्वकीयपरिणामस्य । पुनरपि किंविशिष्टस्य । दव्वजादस्स स्वकीयात्म-द्रव्योपादानकारणजातस्य । आदीयदे कदाई कम्मधूलीहिं आदीयते बध्यते । काभिः । कर्मधूलीभिः कर्तृ-भूताभिः कदाचित्पूर्वोक्तविभावपरिणामकाले । न केवलमादीयते, विमुच्चदे विशेषेण मुच्यते त्यज्यतेताभिः कर्मधूलीभिः कदाचित्पूर्वोक्तकारणसमयसारपरिणतिकाले । एतावता किमुक्तं भवति । अशुद्ध-परिणामेन बध्यते शुद्धपरिणामेन मुच्यत इति ॥१९८॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

तब (यदि आत्मा पुद्‌गलों को कर्मरूप परिणमित नहीं करता तो फिर) आत्मा किस प्रकार पुद्‌गल कर्मों के द्वारा ग्रहण किया जाता है और छोड़ा जाता है? इसका अब निरूपण करते हैं -

[स इदाणिं कत्त्ता सं] वह अब कर्ता होता हुआ । वह पहले कहे गये लक्षण-वाला आत्मा , 'इदानीं अर्थात् अब' का क्या अर्थ है ? इसप्रकार पहले (१९६ वीं गाथा मे) कहे गये नय-विभाग से कर्ता होता हुआ यह 'अब' का अर्थ है । किसका कर्ता होता हुआ ? [सगपरिणामस्स] विकार रहित हमेशा आनन्द एक लक्षण परमसुखरूपी अमृत की प्रगटतारूप कार्य-समयसार को साधनेवाले निश्चय रत्नत्रय स्वरूप कारण समयसार से विलक्षण, मिथ्यात्व-रागादि विभावरूप अपने परिणामों का कर्ता होता हुआ । और भी किस विशेषता वाला है? [दव्वजादस्स] अपने आत्मद्रव्य के उपादान-कारण से उत्पन्न परिणामों का कर्ता होता हुआ । [आदीयदे कदाई कम्मधूलीहिं] बँधता है । किनसे बँधता है ? कर्ताभूत (कर्म-वाच्य की अपेक्षा कर्ता-कारक में प्रयुक्त) कर्म-रजों से बंधता है, कदाचित्- पहले कहे गये विभाव परिणामों के समय बंधता है । न केवल बंधता है, [विमुच्चदे] विशेषरूप से छूटता है, उन कर्म-रजों से कदाचित् पहले कहे गये कारण समयसार- रूप परिणति के समय छूटता है ।

इससे क्या कहा गया है? अथवा इस सब कथन का क्या प्रयोजन है? अशुद्ध परिणामों से जीव बँधता है, शुद्ध परिणाम से छूटता है -- यह ज्ञान कराना इस कथन का प्रयोजन है ॥१९८॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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