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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 197 - तत्त्व-प्रदीपिका

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णिहदघणघादिकम्मो पच्चक्खं सव्वभावतच्चण्हू । (197)

णेयंतगदो समणो झादि कमट्ठं असंदेहो ॥210॥

अर्थ: 

[निहतघनघातिकर्मा] जिनने घनघातिकर्म का नाश किया है, [प्रत्यक्षं सर्वभावतत्वज्ञ:] जो सर्व पदार्थों के स्वरूप को प्रत्यक्ष जानते हैं और [ज्ञेयान्तगतः] जो ज्ञेयों के पार को प्राप्त हैं, [असंदेह: श्रमण:] ऐसे संदेह रहित श्रमण [कम् अर्थं] किस पदार्थ को [ध्यायति] ध्याते हैं?

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथोपलब्धशुद्धात्मा सकलज्ञानी किं ध्यायतीति प्रश्नमासूत्रयति --

लोको हि मोहसद्भावे ज्ञानशक्तिप्रतिबन्धकसद्भावे च सतृष्णत्वादप्रत्यक्षार्थत्वा-नवच्छिन्नविषयत्वाभ्यां चाभिलषितं जिज्ञासितं सन्दिग्धं चार्थं ध्यायन् दृष्टः, भगवान् सर्वज्ञस्तु निहतघनघातिकर्मतया मोहाभावे ज्ञानशक्तिप्रतिबन्धकाभावे च निरस्ततृष्णत्वात्प्रत्यक्षसर्वभाव-तत्त्वज्ञेयान्तगतत्वाभ्यां च नाभिलषति, न जिज्ञासति, न सन्दिह्यति च; कुतोऽभिलषितो जिज्ञासितः सन्दिग्धश्चार्थः । एवं सति किं ध्यायति ॥१९७॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

लोक को

  • मोह का सद्‌भाव होने से तथा
  • ज्ञानशक्ति के प्रतिबन्धक का सद्‌भाव होने से
  • वह तृष्णा सहित है तथा
  • उसे पदार्थ प्रत्यक्ष नहीं है और वह विषय को १अवच्छेदपूर्वक नहीं जानता,
इसलिये वह (लोक) २अभिलषित, ३जिज्ञासित और ४संदिग्ध पदार्थ का ध्यान करता हुआ दिखाई देता है; परन्तु घनघातिकर्म का नाश किया जाने से
  • मोह का अभाव होने के कारण तथा
  • ज्ञानशक्ति के प्रतिबंधक का अभाव होने से,
  • तृष्णा नष्ट की गई है
तथा
  • समस्त पदार्थों का स्वरूप प्रत्यक्ष है तथा ज्ञेयों का पार पा लिया है
इसलिये भगवान सर्वज्ञदेव अभिलाषा नहीं करते, जिज्ञासा नहीं करते और संदेह नहीं करते; तब फिर (उनके) अभि‍लषित, जिज्ञासित और संदिग्ध पदार्थ कहाँ से हो सकता है ? ऐसा है तब फिर वे क्या ध्याते हैं ?

१अवच्छेदपूर्वक = पृथक्करण करके; सूक्ष्मतासे; विशेषतासे; स्पष्टतासे ।

२अभिलषित = जिसकी इच्छा / चाह हो वह ।

३जिज्ञासित = जिसकी जिज्ञासा / जानने की इच्छा हो वह ।

४संदिग्ध = जिनमें संदेह / संशय हो ।

अब, सूत्र द्वारा (उपरोक्त गाथा के प्रश्न का) उत्तर देते हैं कि -- जिसने शुद्धात्मा को उपलब्ध किया है वह सकलज्ञानी (सर्वज्ञ आत्मा) इस (परम सौख्य) का ध्यान करता है --

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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