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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 198 - तत्त्व-प्रदीपिका

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सव्वाबाधविजुत्तो समंतसव्वक्खसोक्खणाणड्‌ढो । (198)

भूदो अक्खातीदो झादि अणक्खो परं सोक्खं ॥211॥

अर्थ: 

[अनक्षः अनिन्द्रिय] और [अक्षातीत: भूत:] इन्द्रियातीत हुआ आत्मा [सर्वाबाधवियुक्त:] सर्व बाधा रहित और [समंतसर्वाक्षसौख्यज्ञानाढ:] सम्पूर्ण आत्मा में समंत (सर्वप्रकार के, परिपूर्ण) सौख्य तथा ज्ञान से समृद्ध वर्तता हुआ [परं सौख्यं] परम सौख्य का [ध्यायति] ध्यान करता है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथैतदुपलब्धशुद्धात्मा सकलज्ञानी ध्यायतीत्युत्तरमासूत्रयति --

अयमात्मा यदैव सहजसौख्यज्ञानबाधायतनानामसार्वदिक्कासकलपुरुषसौख्यज्ञाना-यतनानां चाक्षाणामभावात्स्वयमनक्षत्वेन वर्तते तदैव परेषामक्षातीतो भवन् निराबाध-सहजसौख्यज्ञानत्वात् सर्वाबाधवियुक्तः, सार्वदिक्कसकलपुरुषसौख्यज्ञानपूर्णत्वात्समन्तसर्वाक्ष-सौख्यज्ञानाढयश्च भवति । एवंभूतश्च सर्वाभिलाषजिज्ञासासन्देहासम्भवेऽप्यपूर्वमनाकुलत्वलक्षणंपरमसौख्यं ध्यायति । अनाकुलत्वसंगतैकाग्रसंचेतनमात्रेणावतिष्ठत इति यावत् । ईदृश-मवस्थानं च सहजज्ञानानन्दस्वभावस्य सिद्धत्वस्य सिद्धिरेव ॥१९८॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

जब यह आत्मा, जो सहज सुख और ज्ञान की बाधा के आयतन हैं (ऐसी) तथा जो असकल आत्मा में असर्वप्रकार के सुख और ज्ञान के आयतन हैं ऐसी इन्द्रियों के अभाव के कारण स्वयं 'अतीन्द्रिय' रूप से वर्तता है, उसी समय वह दूसरों को 'इन्द्रियातीत' (इन्द्रियअगोचर) वर्तता हुआ, निराबाध सहजसुख और ज्ञानवाला होने से 'सर्वबाधा रहित' तथा सकल आत्मा में सर्वप्रकार के (परिपूर्ण) सुख और ज्ञान से परिपूर्ण होने से 'समस्त आत्मा में संमत सौख्य और ज्ञान से समृद्ध' होता है । इस प्रकार का वह आत्मा सर्व अभिलाषा, जिज्ञासा और संदेह का असंभव होने पर भी अपूर्व और अनाकुलत्वलक्षण परमसौख्य का ध्यान करता है; अर्थात् अनाकुलत्वसंगत एक 'अग्र' के संचेतनमात्ररूप से अवस्थित रहता है, (अर्थात् अनाकुलता के साथ रहने वाले एक आत्मारूपी विषय के अनुभवनरूप ही मात्र स्थित रहता है) और ऐसा अवस्थान सहजज्ञानानन्दस्वभाव सिद्धत्व की सिद्धि ही है (अर्थात् इस प्रकार स्थित रहना, सहजज्ञान और आनन्द जिसका स्वभाव है ऐसे सिद्धत्व की प्राप्ति ही है । )

अब, यह निश्‍चित करते हैं कि -- 'यही (पूर्वोक्त ही) शुद्ध आत्मा की उपलब्धि जिसका लक्षण है, ऐसा मोक्ष का मार्ग है'

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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