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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 101

From जैनकोष



इत्थम्भूतं तत्किं कदाचित्परिचेतव्यमन्यथा वेत्यत्राह --


सामयिकं प्रतिदिवसं यथावदप्यनलसेन चेतव्यम्
व्रतपञ्चकपरिपूरणकारणमवधानयुक्तेन ॥101॥


टीका: 

चेतव्यं वृद्धिं नेतव्यम् । किं ? सामायिकम् । कदा ? प्रतिदिवसमपि न पुन: कदाचित् पर्वदिवस एव । कथम् ? यथावदपि प्रतिपादितस्वरूपानतिक्रमेणैव । कथम्भूतेन ? अनलसेनाऽऽलस्यरहितेन उद्यतेनेत्यर्थ: । तथाऽवधानयुक्तेनैकाग्रचेतसा । कुतस्तदित्थं परिचेतव्यम् ? व्रतपञ्चकपरिपूरणकारणं यत: व्रतानां हिंसाविरत्यादीनां पञ्चकं तस्य परिपूरणत्वं महाव्रतरूपत्वं तस्य कारणम् । यथोक्तसामायिकानुष्ठानकाले हि अणुव्रतान्यपि महाव्रतत्वं प्रतिपद्यन्तेऽतस्तत्कारणम् ॥




प्रतिदिन सामायिक का उपदेश




सामयिकं प्रतिदिवसं यथावदप्यनलसेन चेतव्यम्

व्रतपञ्चकपरिपूरणकारणमवधानयुक्तेन ॥101॥


टीकार्थ:

यहाँ पर बतला रहे हैं कि कोई यह न समझ ले कि उपवास अथवा एकाशन के दिन ही सामायिक करनी चाहिए, अन्य दिनों में नहीं । इसी का निराकरण करते हुए कहते हैं कि शास्त्रोक्त विधि का अतिक्रमण नहीं करते हुए प्रतिदिन सामायिक करनी चाहिए । सामायिक करने वाला पुरुष आलस्य रहित तथा चित्त की एकाग्रता से युक्त होना चाहिए । क्योंकि सामायिक में हिंसादि पंच पापों की निवृत्ति हो जाती है, इसलिए पाँचों व्रतों की परिपूर्णता स्वरूप सामायिक के काल में अणुव्रत भी महाव्रतरूपता के कारण हैं ।



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