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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 100

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इत्थम्भूतेषु स्थानेषु कथं तत्परिचेतव्यमित्याह --


व्यापारवैमनस्याद्विनिवृत्त्यामन्तरात्मविनिवृत्त्या
सामायिकं बध्नीयादुपवासे चैकभुक्ते वा ॥100॥


टीका: 

बध्रीयादनुतिष्ठेत् । किं तत् ? सामायिकम् । कस्यां सत्याम् ? विनिवृत्त्याम् । कस्मात् ? व्यापारवैमनस्यात् व्यापार: कायादिचेष्टा वैमनस्यं मनोव्यग्रता चित्तकालुष्यं वा तस्माद्विनिवृत्यामपि सत्याम् अन्तरात्मविनिवृत्या कृत्वा तद्बध्नीयात् अन्तरात्मनो मनोविकल्पस्य विशेषेण निवृत्या । कस्मिन् सति तस्यां तया तद्बध्रीयात् ? उपवासे चैकभुक्ते वा ॥




व्रत के दिन सामायिक का उपदेश




व्यापारवैमनस्याद्विनिवृत्त्यामन्तरात्मविनिवृत्त्या

सामायिकं बध्नीयादुपवासे चैकभुक्ते वा ॥100॥


टीकार्थ:

सामायिक की वृद्धि किन भावों से करे ? इसके उत्तर स्वरूप में बतलाते हैं कि व्यापार-शरीर की चेष्टा और वैमनस्य- मन की व्यग्रता अथवा चित्त की कलुषता से रहित होकर मानसिक विकल्पों को विशेषरूप से हटाते हुए उपवास अथवा एकाशन के दिन विशेषरूप से सामायिक को बढ़ाना चाहिए । यहाँ पर चकार से उससे अन्य समय का भी ग्रहण होता है अर्थात् उपवास और एकाशन के सिवाय अन्य दिनों में भी सामायिक को बढ़ानी चाहिए ।



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